• तो क्या भारत में लोकतंत्र ख़तरे में हैं? किसकी दोस्ती से पनप रहा है यह ख़तरा?

भारत जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए जाना जाता है, लेकिन यह पहचान अब कितने और दिनों तक बाक़ी रहती है यह कह पाना मुश्किल लग रहा है।

भारत से आए दिन प्राप्त होने वाली मॉब लिंचिंग से लेकर सांप्रदायिक दंगों और बलात्कार जैसी ख़बरें तो कभी कम तो कभी ज़्यादा हमेशा से आती ही रहती थीं लेकिन इधर कुछ समय से जो ख़बरें आ रही हैं वह इस देश के लोकतंत्र के लिए सबसे ज़्यादा ख़तरा उत्पन्न कर रही हैं। हो सकता है कि इन घटनाओं को आप बहुत ही अधिक गंभीरता से न लें पर अगर आप इन घटनाओं की बारीक़ी और पास से देखें और समझने का प्रयास करेंगे तो विश्वास कीजिए आपकी चिंता बहुत बढ़ जाएगी।

भारत के राज्य बिहार के पटना हाइकोर्ट के मुख्य न्यायधीश नियुक्त किए जाने के बाद जस्टिस मुकेश रासिक भाई शाह ने एक हिन्दी न्यूज़ वेबसाइट को इंटरव्यू देते हुए कुछ ऐसा कहा कि जिसके बाद इस देश के बुद्धिजीवियों से लेकर वरिष्ठ राजनितिज्ञों में हलचल सी मच गई है और वे भारत के लोकतंत्र को लेकर चिंतित हो गए हैं। पटना हाइकोर्ट के नवनियुक्त मुख्य न्यायधीश ने भारतीय प्रधानमंत्री की शान में कुछ इस तरह से क़सीदे पढ़े कि, भारत के इतिहास में आज तक किसी जज ने किसी राजनेता के लिए इन शब्दों का प्रयोग नहीं किया था। जस्टिस मुकेश रासिक भाई शाह ने कहा कि, “नरेंद्र मोदी एक मॉडल हैं वो एक हीरो हैं”

पटना हाइकोर्ट के मुख्य न्यायधीश जस्टिस मुकेश रासिक भाई शाह, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

अभी जस्टिस मुकेश रासिक की क़सीदा ख़्वानी ख़त्म नहीं हुई थी कि दूसरी ओर छत्तीसगढ़, जहां इस राज्य के जनसंपर्क विभाग ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की तस्वीरों वाली बड़ी-बड़ी होर्डिंगों को पूरे रायपूर शहर में लगा दिया गया। यह घटना भी ऐसी ही थी कि जिसमें देश के किसी मुख्य न्यायाधीश का किसी पार्टी और सरकार की ओर से होर्डिंगें लगाकर पहली बार स्वागत किया जा रहा था। हलांकि जब राज्य सरकार को यह समझ में आया कि शायद उनसे कुछ चूक हो गई है तब उन्होंने तमाम होर्डिंगों को उतरवा दिया। हो सकता है कि आपको मेरी इन बातों में कुछ ख़ास नज़र न आ रहा हो और बहुत ही मामूली सी बात लग रही हो लेकिन जब इनकी गहराईयों में जाएंगे तो आप भी चिंतित हो जाएंगे। इसके कुछ कारण हैं जिनको हम आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

पहली बात, यह सही है कि भारतयी संविधान के अनुसार किसी के जज होने के कारण उनका जनतांत्रिक अधिकार कम नहीं होता। लेकिन जब कोई जज न्याय की कुर्सी पर बैठा होता है तो कई बार उसे नागरिक के तौर पर अपनी पसंद के नेता, राजनीतिक पार्टी यहां तक कि सरकार के ख़िलाफ़ भी फ़ैसला करना पड़ सकता है। इसीलिए हमारी शासकीय प्रणाली में न्यायपालिका को सरकारों से आज़ाद रखा गया है। न्यायपालिका को सरकार का अंग इसीलिए भी नहीं माना जाता क्योंकि वह सरकार और उसके मुखिया के ख़िलाफ़ भी फ़ैसले करती है। जनता की नज़रों में न्याय करने वाला सत्ता से ऊपर भले ही न हो पर आज़ाद ज़रूर होना चाहिए, तभी न्याय की व्यवस्था में जनता का भरोसा बना रह सकता है।

दूसरी बात यह है कि जब तक जनता का भरोसा न्यायपालिका पर बना रहता है तब तक जनता न्याय की तलाश में पुलिस-प्रशासन और नौकरशाही के ज़रिए अदालत तक जाती है। जहां यह भरोसा दरकने लगता है लोग अपने अपने तरीक़े और नज़रिए से ख़ुद ही "न्याय" करने लग जाते हैं। जिसका उदाहरण भारत में अब आप मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं के तौर पर देख रहे हैं। दुनिया के कई देशों में इसी तरह से अराजकता फैली है और वहां अदालतें नहीं बल्कि विजिलांती संगठन, मिलिशिया और अपराधियों के गिरोह फ़ैसला करते हैं। ज़्यादातर मामलों में ऐसे फ़ैसले सड़कों पर ही कर दिए जाते हैं।

अब यहां पर यह प्रश्न उठता है कि यह बात जस्टिस मुकेश रसिक भाई शाह ही बेहतर जानते हैं कि जब वह भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को "हीरो और मॉडल" बता रहे थे तो क्या यह उन्होंने एक आम नागरिक की हैसियत से राय दी थी या पटना हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस के तौर पर और क्या उनकी राय में मोदी उनके अपने मॉडल और हीरो हैं तो क्या वह यह बात पूरे देश के लोगों की ओर से कह रहे थे।

तीसरी बात यह है कि, सरकारें क्यों नहीं चाहेंगी कि न्यायाधीश उनकी तरफ़दारी करें? सरकारें और सत्तारूढ़ पार्टियां क्यों नहीं चाहेंगी कि क़ानून के हाथ जब उनके किसी बड़े नेता तक पहुंचने वाले हों तभी कोई अदृश्य शक्ति इस हाथ को पीछे खींच ले? सरकारें क्यों नहीं चाहेंगी कि उनके हर काले-सफ़ेद करतूतों पर अदालतें अपनी मुहर लगाएं ताकि उनको सबकुछ करने की छूट मिल जाए?

सरकारें क्यों नहीं चाहेंगी कि देश के हर नागरिक की आँखों की पुतलियों की तस्वीरें, अँगुलियों के निशान, फ़ोन नंबर, बैंक खाते, मकान-दुकान, पत्नी-बच्चे, माता-पिता, चाचा-ताऊ-बिरादर और रिश्तेदारों की सब जानकारियाँ उसकी मुट्ठी में हो? सरकारें ज़रूर जानना चाहेंगी कि आप क्या खाते हैं, कहाँ जाते हैं, किससे मिलते हैं, कौन से कपड़े पहनना पसंद करते हैं, इंटरनेट पर कितना समय और क्या देखने में बिताते हैं, किस पार्टी को अच्छा और किसे बुरा समझते हैं, ट्रेड यूनियन को नेतागिरी मानकर ख़ारिज करते हैं या इसे कामगारों का बुनियादी अधिकार मानते हैं।

सरकारों की ऐसी ही कई असंवैधानिक मनमानियों पर अंकुश लगाने का काम लोकतांत्रिक देशों में न्यायपालिका करती आईं हैं और न्यायाधीशों ने कई देशों में इस तरह की मनमानी सरकारों को सत्ता से भी उतार फेका है। लेकिन अगर किसी देश की न्याय व्यवस्था, न्यायपालिका और  न्यायाधीश उस देश की सरकार चलाने वालों को "हीरो और मॉडल" कहने लगे तो यह कोई शुभ संदेश नहीं हैं और न ही अच्छे दिन, बल्कि आप यह समझने लगें कि अब उस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था समाप्ति को ओर आग्रसर है और आने वाले दिनों में उस देश में नेता के स्थान पर कोई नरेश या तानाशाह दिखाई देने वाला है।  (RZ)

 

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Aug २७, २०१८ १८:४१ Asia/Kolkata
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