• भारत में आठवीं मुहर्रम के अवसर पर शोक सभाएं

पूरी दुनिया में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत से विशेष दिनों में शोक सभाओं का आयोजन जारी है और भारत में भी पारंपरिक ढंग से अज़ादारी की जा रही है।

भारत के लगभग सभी छोटे-बड़े शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में मुहर्रम की मजलिसों, जुलूस और मातम का सिलसिला जारी है। अज़ादारी का केंद्र समझे जाने वाले लखनऊ में भी हमेशा की तरह मुहर्रम के अवसर पर विभिन्न शोक सभाएं आयोजित हो रही हैं जिनमें वक्ता इमाम हुसैन के जीवन, उनके आंदोलन और उनके संदेश के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाल रहे हैं और लोगों को बता रहे हैं कि इमाम हुसैन के आंदोलन से हमें क्या क्या पाठ मिलते है।

 

लखनऊ के झाऊलाल इमामबाड़े में मजलिस पढ़ते हुए धर्मगुरू मौलाना अख़तर अब्बास जौन ने कहा कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को जैसे साथी मिले थे वैसे साथी इतिहास में किसी को नहीं मिले। उन्होंने कहा कि साथी हज़रत अली अलैहिस्सलाम को भी मिले थे लेकिन उन्होंने कहा था कि कुछ होशियार हैं लेकिन भरोसेमंद नहीं हैं बल्कि धर्म को अपने संसार के लिए इस्तेमाल करते हैं, इसी तरह कुछ हक़ परस्त हैं लेकिन उन्हें दूरदर्शिता नहीं है। मौलाना अख़तर अब्बास जौन ने कहा कि आज भी इस्लाम और शरीयत को इन दो तरह के लोगों के कारण शर्मिंदा होना पड़ रहा है।

 

उन्होंने अपनी मजलिस में कहा कि जो लोग ये नहीं समझ सकते कि कौन सा काम दिल से किया गया है और कौन सा काम वोटों के लिए किया गया है वे दूरदर्शी नहीं हैं। इस प्रकार के लोगों को हज़रत अली अपने साथियों के रूप में नहीं चाहते थे लेकिन जैसे साथी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को मिले वे दूरदर्शी भी थे, वफ़ादार भी थे, भरोसेमंद भी थे, साहसी भी थे, न्याय प्रेमी भी थे, सद्कर्मी भी थे और इज़्ज़तदार भी थे और उनका लक्ष्य सिर्फ़ और सिर्फ़ इमाम हुसैन की राह पर चल के अपने आपको इज़्ज़त की लड़ाई में क़ुर्बान करना था और यही कारण है कि वे स्वयं आज इज़्ज़त का मानदंड बन गए हैं।

 

मौलाना अख़तर अब्बास जौन ने कहा कि आज मुस्लिम नेताओं को इमाम हुसैन से इज़्ज़त का पाठ सीखना चाहिए ताकि वे क़ौम और धर्म को अत्याचारी और अवसरवादी लोगों के हाथों अपमानित होने से बचा सकें। उन्होंने कहा कि हमें इतना दूरदर्शी बनने की ज़रूरत है कि कुछ अवसरवादी लोग अपने फ़ायदे के लिए धर्म और क़ौम की इज़्ज़त बेच न सकें। (HN)

Sep १९, २०१८ २१:०३ Asia/Kolkata
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