इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई ने विशेषज्ञ परिषद के सदस्यों के साथ भेंट में बल दिया कि विभिन्न साज़िशों और दुश्मनियों के बावजूद इस्लामी व्यवस्था, मज़बूत जड़ों वाले पवित्र वृक्ष की भांति फल-फूल रहा है और फल दे रहा है।

सन 1979 में इस्लामी क्रांति की सफलता के साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नयी व्यवस्था का परिचय हुआ जो किसी भी पूर्वी या पश्चिमी ब्लॅाक पर निर्भर नहीं थी और वर्चस्ववादी शक्तियों से अलग रह कर स्वाधीनता के साथ फैसला करती थी। इस प्रकार की व्यवस्था को अब चालीस वर्ष बीत गये हैं और इन चालीस वर्षों में ईरान की इ्सलामी व्यवस्था ,  अपनी उपयोगिगता और अपना प्रभाव सिद्ध करने के अलावा, एक मज़बूत वृक्ष में बदल चुकी है और इस दौरान उसके विकास को रोकने के लिए दुश्मनों की हर तरह की कोशिश नाकाम हो चुकी है। एक समय था जब दुश्मनों ने इस्लामी क्रांति के विकास को रोकने के लिए युद्ध व आतंकवाद का सहारा लिया था अब उसके साथ आर्थिक युद्ध  को साधन बना कर वह अपना यह मक़सद पूरा करना चाहते हैं ताकि इस प्रकार से ईरान की जनता में असंतोष फैला कर, इस्लामी व्यवस्था के लिए चुनौतियां खड़ी करे ताकि शायद इस प्रकार से ईरान की प्रभावशाली क्षेत्रीय भूमिका को कम कर सकें। 

वरिष्ठ नेता ने यह भी कहा है कि अमरीका के नेतृत्व में ईरान के खिलाफ प्रचारिक युद्ध छेड़ दिया गया है और समाज में वैचारिक भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है। वास्तव में यह ईरान के खिलाफ अमरीका की शत्रुता की चरमसीमा है वैसे यह भी हक़ीक़त है कि ईरान की इस्लामी क्रांति के चालीस वर्षीय इतिहास में अमरीका की कई सरकारों ने अपनी पूरी शक्ति झोंक कर इस्लामी व्यवस्था के खिलाफ षडयंत्र रचे मगर हम बार उन्हें नाकामी का ही मुंह देखना पड़ा। इसी लिए वरिष्ठ नेता ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अगर हम दुश्मन के सामने डट जाएंगे तो वह पीछे हटने पर मजबूर हो जाएंगे और हम ईश्वर की कृपा से सामाज्यवादियों को घुटने टेकने पर विवश कर देंगे।

Sep ०६, २०१८ १७:४८ Asia/Kolkata
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