• अलहलबूसी के संसद सभापति चुने जाने के बाद यह क्यों लगता है कि इराक़ में ईरान का प्रभाव बहुत गहरा है? इस हार पर ट्रम्प प्रशासन की प्रतिक्रिया क्या होगी?

यह बाद ध्यान योग्य है कि मुहम्मद अलहलबूसी के इराक़ का संसद सभापति चुने जाने के बाद बधाई का सबसे पहला संदेश उनके ईरानी समकक्ष डाक्टर अली लारीजानी की टेलीफ़ोनी वार्ता में मिला।

यह बात भी विचार योग्य है कि संसद सभपति चुने जाने के बाद अलहलबूसी सबसे पहले जिस आवास पर गए वह अलफ़त्ह गठबंधन तथा हश्दुशअबी के प्रमुख हादी अलआमेरी का आवास है। उनके साथ एक प्रतिनिधिमंडल था जिसमें उनके डिप्टी हसन अलकअबी तथा कुछ सांसद थे।

हलबूसी ने इन दोनों चीज़ों से यह संदेश देना चाहा है कि वह एक सुन्नी नेता होने की हैसियत से ईरान के साथ गहरे संबंध रखते हैं तथा अलफ़त्ह गठबंधन और हादी अलआमेरी ने चुनाव जीतने में उनकी मदद की तो वह इस सहयोग को कभी भूल नहीं सकते।

यह इराक़ में ईरान की एक और बड़ी विजय है जबकि अमरीका की इतनी ही बड़ी पराजय है जिसने इराक़ पर युद्ध थोप कर अपने दो ट्रिलियन डालर गवां दिए। अमरीका इस युद्ध के माध्यम से इराक़ पर हमेशा के लिए अपना वर्चस्व स्थापित करने की योजना बना रहा था।

जब हलबूसी यह कहते हैं कि इराक़ की संसद तथा जनता ईरान की ओर से इराक़ को अतीत में और वर्तमान समय में मिलने वाली खुली मदद और समर्थन की क़द्र करती है तथा इस्लामी गणतंत्र ईरान के लिए पैदा किए जाने वाले हर ख़तरे और हर दबाव का खुलकर विरोध करती है और इसे खुला हुआ अत्याचार मानती है चाहे यह काम अमरीका कर रहा हो और यही नहीं इराक़ इस प्रकार के हर प्रयास का विरोध करेगा तो इसका मतलब साफ़ है कि नया इराक़ अमरीका तथा क्षेत्र की अन्य शक्तियों के मुक़ाबले में इस्लामी गणतंत्र ईरान के मोर्चे का सक्रिय सदस्य बन गया है।

अलहलबूसी का इराक़ का संसद सभापति चुना जाना ईरानी कूटनीति और ईरान के पासदाराने इंक़ेलाब फ़ोर्स की अलक़ुद्स ब्रिगेड के प्रमुख जनरल क़ासिम सुलैमानी की बहुत बड़ी विजय है और शायद यहीं पर अमरीका द्वारा समर्थित इराक़ी प्रधानमंत्री हैदर अलएबादी की दूसरे टर्म की आकांक्षाओं पर विराम लग गया है।

ईरान ने अपने प्रतिद्वंद्वी अर्थात अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के मुक़ाबले में यह सफलता प्राप्त की है जो अगली सफलता अर्थात ईरान के क़रीबी उम्मीदवार के प्रधानमंत्री चुने जाने की भूमिका बनेगी। इस तरह इराक़ की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में ईरान की पैठ मज़बूत होगी तथा राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और संसद सभापति तीनों ही पदों पर वह लोग विराजमान होंगे जो ईरान के मित्र समझे जाते हैं।

सवाल यह है कि सऊदी अरब तथा दूसरे क्षेत्रीय देश इस समय कहां हैं जो क्षेत्र में और विशेष रूप से यमन में ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहते हैं?

साभार रायुल यौम

Sep १७, २०१८ २०:२८ Asia/Kolkata
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