• ईरान को अलग थलग करने की कोशिश में ख़ुद अकेला पड़ गया अमरीका

इस्लामी गणतंत्र ईरान के राष्ट्रपति डाक्टर हसन रूहानी संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के अधिवेशन में भाग लेने के लिए न्यूयार्क के दौरे पर हैं।

इस यात्रा के पहले दिन सोमवार को डाक्टर रूहानी की मुलाक़ात क्यूबा और बोलीविया के राष्ट्रपतियों से हुई। डाक्टर रूहानी ने एनबीसी टीवी चैनल को साक्षात्कार दिया और प्रख्यात नेता नेलसन मंडेला को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए आयोजित सम्मेलन को संबोधित किया।

डाक्टर हसन रूहानी मंगलवार को फ़्रांस के राष्ट्रपति से मुलाक़ात करेंगे इसके अलावा सीएनएन और पीबीएस टीवी चैनलों को एक संयुक्त इंटरव्यू देंगे। राष्ट्रपति रूहानी की मुलाक़ात बेलजियम और ब्रिटैन के प्रधानमंत्रियों से होगी। अमरीका के मुसलिम समाज के अनेक नेताओं से मुलाक़ात का भी उनका कार्यक्रम है।

इस अवसर पर फ़्रांस, ब्रिटेन, रूस, चीन और जर्मनी के विदेश मंत्रियों के साथ ईरान के विदेश मंत्री की मुलाक़ात हुई जिसमें ईरान के परमाणु समझौते को बचाए करने की मार्गों की समीक्षा की गई।

इन सभी कार्यक्रमों पर नज़र डाली जाए तो यह बात बिल्कुल साफ़ हो जाती है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान क्षेत्र ही नहीं विश्व स्तर पर एक प्रभावी देश के रूप में अपनी छवि बनाने में सफल रहा है। इस्लामी गणतंत्र ईरान ने इस्लामी क्रान्ति सफल होने के बाद जो सैद्धांतिक नीतियां बनाईं और उन पर जिस तरह तनमयता से उसने अमल किया उसका नतीजा यह निकला कि ईरान अन्य देशों के लिए आदर्श बन गया है। ईरान ने पड़ोसी देशों और इस्लामी देशों संबंधों को प्राथमिकता दी। क्षेत्र के कई देशों इसी प्रकार चीन और रूस जैसे देशों से ईरान के स्ट्रैटैजिक संबंध हैं, वहीं भारत और जापान जैसे देशों के साथ भी ईरान का बड़े पैमाने पर व्यापार होता है।

इन तथ्यों को देखते हुए यही लगता है कि ईरान को विश्व स्तर पर अलग थलग करने की कोशिश में अमरीका ख़ुद अलग थलग पड़ गया है। अमरीका की ट्रम्प सरकार ईरान पर दबाव डलना चाहती है लेकिन उसकी नीतियां एसी हैं कि यूरोपीय देश भी जो अमरीका के पारम्परिक घटक समझे जाते हैं अमरीका की नीतियों से परेशानी महसूस कर रहे हैं और स्थिति यह हो गई है कि अलग अलग विषयों पर यूरोपीय संघ स्वतंत्र नीति बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

इस्लामी गणतंत्र ईरान ने की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उसने अपने पड़ोसी देशों से बहुत अच्छे संबंध स्थापित किए हैं। केवल वह देश जो अमरीका के पिट्ठू हैं और जिनके बारे में कहा जाता है कि वह अमरीका की अनुमति के बग़ैर अपनी विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं कर सकते, वही ईरान का विरोध कर रहे हैं हालांकि रोचक बिंदु यह है कि अमरीका के यह घटक देश ख़ुद भी अमरीका के रवैए को देखते हुए ख़ुद को अपमानित महसूस कर रहे हैं क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति कभी इन देशों को दुधारू गाय कहते हैं, कभी कहते हैं कि यह सरकारें अमरीका के सहारे से बाक़ी हैं और यह सहारा न रहे तो इन शासकों को इकानोमी क्लास की फ़्लाइट पकड़ कर अपने देशों से भागना पड़ेगा।

विश्व पटल पर अमरीका अपनी नीतियों की वजह से कहीं भी एसा सहयोगी नहीं समझा जा रहा है जिसके साथ लेनदेन और सहयोग आसान है।

बदलते हालात में जब अलग अलग इलाक़ों में अलग अलग ताक़तें उभर रही हैं इस्लामी गणतंत्र ईरान अपनी पैठ बनाने में सफल रहा है। अमरीका जैसी विश्व शक्ति को ईरान ने अपने सिद्धांतों और निष्ठापूर्ण क्षेत्रीय सहयोग से परास्त किया है।

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Sep २५, २०१८ १९:३१ Asia/Kolkata
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