Dec ०८, २०१८ १९:१० Asia/Kolkata
  • तेहरान में छह देशों के संसद सभापतियों की बैठक, नई दिशा में क्षेत्रीय देशों की प्रगति, क्या बड़ा बदलाव होने वाला है?

ईरान की राजधानी तेहरान में छह देशों के संसद सभापतियों की बैठक हुई जिसमें मुख्य रूप से इस बिंदु पर बल दिय गया कि क्षेत्र की शांति व स्थिरता के मामले में बाहरी शक्तियों को हस्तक्षेप का मौक़ा नहीं देना चाहिए।

बैठक में ईरान के अलावा चीन, रूस, तुर्की, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के संसद सभापतियों ने अपने विचार रखे। यह बात समस्त छह देशों के सभापतियों ने संयुक्त रूप से कही कि क्षेत्र की शांति व सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय देशों को आपस में मिलकर काम करना चाहिए बाहरी शक्तियों को इसमें हस्तक्षेप का मौक़ा नहीं देना चाहिए।

अफ़ग़ानिस्तान, इराक़, सीरिया और लीबिया सहित कई देशों का उदाहरण पेश किया जा सकता है जहां बाहरी शक्तियों विशेष रूप से अमरीका और उसके घटकों ने हस्तक्षेप किया और आतंकवाद को मिटाने के दावे के साथ हमला किया मगर आतंकवाद ख़त्म होने के बजाए बढ़ गया इसलिए आतंकवाद को समाप्त करना अमरीका और उसके घटकों का उद्देश्य ही नहीं था।

इस बीच बाहरी हस्तक्षेप के कारण इन देशों को भारी नुक़सान पहुंच गया और इसका असर पड़ोसी देशों पर भी पड़ा। वैसे अफ़ग़ानिस्तान, इराक़ और सीरिया में अमरीका और उसके घटक अपने निहित लक्ष्य भी पूरे नहीं कर पाए क्योंकि इन देशों के परिवर्तनों को देखकर यही लगता है कि वहां के हालात अमरीका की मर्ज़ी की दिशा में नहीं जा रहे हैं।

इन बातों को क्षेत्रीय देश भी भलीभांति महसूस कर रहे हैं। तेहरान में छह देशों के संसद सभापतियों की बैठक में यह बिंदु साफ़ तौर पर नज़र आया कि बाहरी हस्तक्षेप के नुक़सान की ओर से भी देशों का ध्यान केन्द्रित है।

पाकिस्तान के संसद सभापति असद क़ैसर ने अपने भाषण में कहा कि हम आतंकवाद से लड़ने के नाम पर क्षेत्र में बाहरी शक्तियों के आगमन के विरोधी हैं। उनका इशारा साफ़ तौर पर अमरीका की ओर है जिसने अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध छेड़ा और 17 साल बीत जाने के बाद भी वहां शांति स्थापित नहीं कर पाया।

ईरान के संसद सभापति डाक्टर लारीजान के भाषण पर नज़र डाली जाए तो अमरीका जैसी बाहरी शक्तियों और उसका साथ देने वाले क्षेत्रीय देशों की आतंकवाद के प्रसार में प्रमुख भूमिका का संकेत मिलता है। डाक्टर लारीजानी का कहना था कि अमरीका तथा क्षेत्र के कुछ देश आतंकवा के प्रसार के लिए ज़िम्मेदार हैं।

अफ़ग़ान संसद सभापति अब्दुर्रऊफ़ इब्राहीमी का कहना था कि आतंकवाद से लड़ने के लिए जो कोशिशें इस सम्मेलन में शामिल देशों की ओर से की जाएंगी काबुल सरकार उनका समर्थन करेगी। उन्होंने कहा कि आतंकवाद द्विपक्षीय सहोग के मार्ग में रुकावट पैदा करता है।

रूस के संसद सभापति व्यात्शीसलाफ़ वोलोदीन ने कहा कि आतंकवाद से लड़ाई में अमरीका को सीरिया में कोई भी सफलता नहीं मिली इसी वजह से हम अमरीका की वहां उपस्थिति और गतिविधियों पर आपत्ति करते हैं। पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया और अन्य देशों में आतंकवाद का मौजूद होना हमें यह इस बात की दावत देता है कि आतंकवाद से संघर्ष में अपने प्रयास तेज़ करें। उनका कहना था कि क्षेत्र के देशों ने आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष किया तो बहुत अच्छे परिणाम सामने आए।

तुर्की के संसद सभापति बिन अली येल्दरीम का कहना था कि भुखमरी युद्ध और आतंकवाद तथा विस्थापन जैसी समस्याएं देशों के आपसी संबंधों की मज़बूती में रुकावट हैं। यदि हम आपसी सहयोग करें तो आतंकवाद पर क़ाबू पा सकते हैं। कुछ देशों ने आतंकवाद की बहुत भारी क़ीमत चुकाई है।

चीन के संसद सभापति त्शीन ज़ो का कहना था कि हमारे देशों में आतंकवाद का ख़तरा बढ़ रहा है जिसे देखते हुए ज़रूरी हो गया है कि हम आपसी सहयोग में विस्तार करें।

एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि तेहरान बैठक में संसद सभापतियों ने भाग लिया जो जनता के प्रतिनिधि होते हैं अतः आतंकवाद के संबंध में जो बातें हुई हैं वह वास्तव में जनता की सोच को ज़ाहिर करती हैं। दूसरी बात यह है कि इस बैठक से यह भी इशारा मिलता है कि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की ओर से विश्व के देशों में किसी हद तक निराशा पैदा हुई है और अब बहुत से देश यह महसूस कर रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ तथा सुरक्षा परिषद जैसी संस्थाएं स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से अपने दायित्वों का निर्वाह नहीं कर सकतीं अतः क्षेत्रीय स्तर पर देशों का एकजुट होना और अपनी समस्याओं से निपटना ज़रूरी है।  

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