Feb ०३, २०१९ १८:४८ Asia/Kolkata
  • ईरान के सुप्रीम लीडर की वह भविष्यवाणियां जो हालात के रुख़ के विपरीत थीं मगर वही हुआ जो आयतुल्लाह ख़ामेनई ने कहा!

लेबनान की राजधानी बैरूत में कुछ साल पहले एक सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसका उद्घाटन भाषण वीडिया कान्फ़्रेन्सिंग से हिज़्बुल्लाह आंदोलन के महासचिव सैयद हसन नसरुल्लाह ने दिया।

इस भाषण में सैयद हसन नसरुल्लाह ने बताया कि इस बात के कई उदहारण हैं कि इस्लामी क्रान्ति वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने ज़ाहिरी हालात और अधिकतर लोगों की राय से हटकर विचार पेश किया और उनका पेश किया गया विचार बिलकुल सही साबित हुआ।

सैयद हसन नसरुल्लाह ने कहा कि मैं 1991 में होने वाली मैड्रिट कान्फ़्रेन्स से शुरुआत करता हूं। हम सब जानते हैं कि फ़ार्स खाड़ी के दूसरे युद्ध में अमरीका ने समीकरणों को बदल दिया और इलाक़े की सबसे बड़ी ताक़त बन गया। अमरीका ने उस योजना को लागू करना का मन बना लिया जिसे वह न्यायपूर्ण और व्यापक शांति का नाम देता है जबकि हम उसे थोपी जाने वाली सांठगांठ कहते हैं। हमारे इलाक़े में भी कहा जाने लगा था कि इस्राईल की संधि अब क़रीब है और हमारे पास इसे स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं है क्योंकि अमरीकी इसे सभी सरकारों पर थोप रहे थे। मगर उन हालात में आयतुल्लाह ख़ामेनई का विचार इसके विपरीत था। उन्होंने मैड्रिड कान्रफ़्रेन्स के बारे में कहा कि यह बेनतीजा रहेगी, अमरीका अपनी मर्ज़ी थोप नहीं पाएगा। आज हम मैड्रिड कान्फ़्रेन्स में शामिल रह चुके लोगों की ज़बान से सुनते हैं कि यह सम्मेलन समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं था।

1996 में सीरिया और इस्राईल के बीच होने वाली शांति वार्ता के बारे में लोगों को पता है। इसे राबिन का उपहार कहा जाता था। इसहाक़ राबिन तैयार हो गए थे कि वह इस्राईली सेनाओं को चार जून 1967 वाली पोज़ीशन पर पीछे बुला लेंगे। यानी सीरिया के गोलान हाइट्स के इलाक़े से अपना क़ब्ज़ा समाप्त करके अपनी सेना को पीछे बुला लेंगे। उस समय हमारे इलाक़े में बातें होने लगी थीं कि अब तो संधि हो जाएगी इसलिए कि 1993 में होने वाली ओस्लो संधि में स्वाशासित सरकारों  के बारे में एक टाइम टेबल तैयार कर लिया गया था और फ़िलिस्तीनी प्रशासन वार्ता में लगा हुआ था। मिस्र, जार्डन और फ़िलिस्तीनी प्रशासन का इस्राईल का समझौता हो चुका था केवल लेबनान और सीरिया बच गए थे और इस्राईल 1967 की पोज़ीशन पर अपनी सेना वापस बुलाने पर तैयार हो गया  था, सब कुछ तय हो गया था। छोटी चीज़ें बची थीं जो कुछ महीनों की बातचीत से हल हो जाने वाली थीं। उस ज़माने में हमसे आकर सब कहते थे कि अब ख़ुद को थकाने और ख़ून देने की ज़रूरत नहीं है अब तक संधि होने जा रही हैं। यानी अब प्रतिरोध आंदोलन को आगे बढ़ाने की ज़रूरत नहीं रह गई है। हमारे लिए यह निर्णायक घड़ी थी और हर ग़लत अनुमान के विनाशकारी परिणाम निकलते। ख़ुद हमारे लोगों के बीच यहां तक कि ईरान में भी अधिकारियों के स्तर पर यह विचार था कि अब संधि होने वाली है। मैं अपने लोगों के साथ तेहरान गया और आयतुल्लाह ख़ामेनई से मुलाक़ात की और मैंने ने कहा कि लोग यह सोच रहे हैं। आयतुल्लाह ख़ामेनई ने कहा कि मैं यह समझता हूं कि एसा नहीं होगा। सीरिया और लेबनान के साथ इस्राईल की संधि नहीं हो पाएगी। आपके के लिए मेरा परामर्श यही है कि आप प्रतिरोध आंदोलन की गतिविधियों को जारी रखिए। जो बातें की जा रही हैं उन पर ध्यान मत दीजिए।

मुझे याद है कि इस मुलाक़ात को दो या तीन हफ़्ते ही गुज़रे थे कि इसहाक़ राबिन तेल अबीब में स्पीच दे रहे थे कि एक चरमपंथी ज़ायोनी ने उठकर गोली चला दी और इसहाक़ राबिन का काम तमाम कर दिया। इसहाक़ राबिन की जगह शेमून पेरिज़ ने ली।

इस बीच फ़िलिस्तीनी संगठनों हमास और जेहादे इस्लामी से इस्राईल की झड़पें शुरु हो गईं। फ़िलिस्तीनियों ने शहादत प्रेमी हमले किए। शेमून पेरिज़ के बाद नेतनयाहू को सत्ता मिली और हालात वही हो गए जो इसहाक़ा राबिन की पहल से पूर्व थे।

वर्ष 1999 के आख़िरी हफ़्तों की बात हैं इस्राईल में चुनाव हुए। मुक़ाबला एहूद बाराक और नेतनयाहू के बीच था। दोनों ने वादा किया  था कि यदि वह चुनाव जीते तथ लेबनान से इस्रईली सेना को वापस बुला लेंगे। एहूद बाराक ने तो इसके लिए 7 जुलाई 2000 की तारीख़ का एलान भी कर दिया था। वह चाहते थे कि इसी वादे के आधार पर लेबनान और सीरिया से समझौता हो जाए और जब वह तारीख़ आए तो वह अपने वादे से मुकर जाएं। सीरिया और लेबनान में आम सोच यही थी कि इस्राईली अपनी सेना पीछे नहीं हटाएगा।

इसी दौरान मैं ईरान की यात्रा पर गया  और वहां मेरी मुलाक़ात आयतुल्लाह ख़ामेनई से हुआ। मैंने हालात के बारे में उन्हें बताया। उनकी सोच बिल्कुल अलग थी। आयतुल्लाह ख़ामेनई ने कहा कि विजय बहुत क़रीब है, आपकी अपेक्षा से भी ज़्यादा क़रीब है और आप इसे अपनी आंख से देखेंगे।

आयतुल्लाह ख़ामेनई की यह बात उस समय की सारी समीक्षाओं और आम धारणा के बिल्कुल विपरीत थी। उस समय दक्षिणी लेबनान से इस्राईल के पीछे हटने का कोई लक्षण नज़र नहीं आता था। आयतुल्लाह खामेनई ने कहा कि आप लेबनान वापस जाकर इस विजय के ख़ुद को तैयार कीजिए कि उस समय आपको क्या भाषण देना है जब इस्राईल यहां से पीछे हटेगा?

हमारी सोच बदल गई थी। यही वजह है कि जब 25 मई को इस्राईली सेना पीछे हटी तो हम पहले से ही इसके लिए तैयार थे।

2006 का 33 दिवसीय युद्ध हुआ तो योजना और फ़ैसलों के स्तर पर देखा जाए तो यह अंतर्राष्ट्रीय युद्ध था, सपोर्ट की दृष्टि से देखा जाए तो यह अरब सरकारों का युद्ध था और योजनाओं पर अमल करने की दृष्टि से देखा जाए तो यह इस्राईली युद्ध  था। यह सब इस युद्ध में शामिल थे। इसका लक्ष्य प्रतिरोध आंदोलन को मिटा देना था। भीषण हमलों के बीच मुझे आयतुल्लाह ख़ामेनई का एक संदेश मिला जिसमें उन्होंने कहा था कि यह युद्ध इस्लाम के आरंभिक दौर के ख़ंदक़ नामक युद्ध की भांति है जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम और उनके साथियों के ख़िलाफ़ क़ुरैश क़बीले के लोग, मदीने के यहूदी और क़बीले सब एकजुट हो गए थे और उन्होंने मुसलमानों की घेराबंदी कर ली थी। मगर आप अल्लाह पर भरोसा कीजिए मैं आपको बताना चाहता हूं कि विजय निश्चित रूप से आप ही की होगी। यह संदेश शुरुआती दिनों का था। उन्होंने संदेश में कहा कि जब आप को यह विजय मिलेगी तब आप एसी ताक़त बन जाएंगे जिसके सामने कोई भी टिक नहीं पाएगा।

कौन है जो इस प्रकार का भविष्यवाणी कर सकता है? वह भी युद्ध के आंरभिक दिनों में?

11 सितम्बर की घटना के बाद जब अमरीका अफ़ग़ानिस्तान पर हमले की तैयारी कर रहा था और इराक़ पर भी हमला होने की बातें कही जा रही थीं। उस समय लोग कहने लगे थे कि अमरीका ने लंबे समय के लिए इस इलाक़े पर क़ब्ज़ा करने की योजना बना ली है। उस समय मैं ईरान गया और आयतुल्लाह ख़ामेनई से मुलाक़ात में उनका विचार पूछा। उन्होंने हमसे जो बात कही वह उस समय आम तौर पर की जाने वाली बातों से बिल्कुल भिन्न थी। हालांकि उस समय इलाक़े के देशों की सरकारें अमरीकियों से बातचीत में लग गई थीं कि किस तरह उससे समझौता करके अपने मामले ठीक कर लें। आयतुल्लाह ख़ामेनई ने मुझे जवाब दिया कि इस समय इलाक़े में चिंता पायी जाती है जो स्वाभाविक भी है। मगर आप हमारे भाइयों से कहिए कि परेशान न हों। अमरीका चोटी पर पहुंच चुका है और अब उसके पतन की शुरुआत हो गई है। उन्होंने कहा कि वह अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ में आकर वास्तव में कुएं में खुद को गिरा रहे हैं। यह इलाक़े में अमरीका और उसकी योजना के पतन की शुरूआत है। हमें इस विचारधारा के आधार पर काम करना चाहिए। निश्चित रूप से आयतुल्लाह ख़ामेनई की यह बात उनके गहरे अध्ययन पर आधारित थी। उन्होंने कहा कि अमरीका इस इलाक़े में अपने पिट्ठुओं की मदद से अपने हित नहीं साध पा रहा है तो अब उसने सारी दुनिया से सेनाएं जमा करके इस इलाक़े में तैनात करने का इरादा किया है जो उसकी कमज़ोरी का चिन्ह है। दूसरी बात यह है कि इससे यह पता चलता है कि अमरीकी अधिकारियों को इलाक़े के राष्ट्रों के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। इस इलाक़े के राष्ट्र विदेशी क़ब्ज़े को स्वीकार नहीं करेंगे। अमरीकी यहां आकर दलदल में फंस जाएंगे। न उनके पास आगे बढ़ने का रास्ता होगा और न पीछे जाने की कोई सूरत दिखाई देगी।

इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता ने सैयद हसन नसरुल्लाह के इस भाषण के बाद भी वर्ष 2015 में एक बात की कि भविष्य के 25 साल इस्राईल नहीं देखेगा। 25 साल बाद इस्राईल नाम की कोई चीज़ बाक़ी नहीं रहेगी। 

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