सऊदी अरब में राजनैतिक कार्यकर्ताओं को धड़ा-धड़ा फांसी पर पश्चिमी हल्क़ों की प्रतिक्रिया

सऊदी अरब में राजनैतिक कार्यकर्ताओं को इतनी तेज़ी से फांसी दी जा रही है कि इस पर न सिर्फ़ क़ानूनी हल्क़ों व जनमत की ओर से व्यापक चिंता जतायी जा रही है बल्कि इन प्रतिक्रियाओं का दायरा अब पश्चिमी क़ानूनी हल्क़ों तक फैल गया है। अब पश्चिम के क़ानूनी हल्क़े भी सऊदी अरब में राजनैतिक कार्यकर्ताओं को धड़ा-धड़ दी जा रही फांसी पर ख़ामोश नहीं हैं हालांकि इनमें ज़्यादातर हल्क़े पश्चिमी सरकारों का साथ देते हुए सऊदी अरब के अपराध के संबंध में ख़ामोश रहते हैं। 
इस संदर्भ में ह्यूमन राइट्स वॉच के प्रमुख ने एक संदेश में कहा कि सऊदी अरब में जिन लोगों को फांसी दी गयी उनमें 41 फ़ीसद लोगों को राजनैतिक गतिविधियों में शामिल होने के कारण फांसी दी गयी। इस बारे में ह्यूमन राइट्स वॉच के प्रमुख केनेथ रॉथ ने ट्वीटर पर प्रकाशित अपने संदेश में लिखा कि सऊदी अरब में 2017 में फांसी पाने वाले लगभग 50 फ़ीसद लोगों को राजनैतिक प्रदर्शन में शामिल होने जैसे अपराध के कारण मौत की सज़ा दी गयी जबकि आम तौर पर किसी भी देश में किसी व्यक्ति को आलोचना करने या राजनैतिक प्रदर्शन में शामिल होने से जैसे अपने नागरिक व राजनैतिक अधिकार के इस्तेमाल के कारण मौत की सज़ा नहीं दी जाती। 
सऊदी अरब में 2017 में राजनैतिक कार्यकर्ताओं को फांसी देने की प्रक्रिया में आयी तेज़ी यह दर्शाती है कि आले सऊद शासन ने अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ दमनकारी नीति अपनायी है। आले सऊद शासन राजनैतिक कार्यकर्ताओं के जनसंहार के ज़रिए हर विरोधी स्वर को दबाने की कोशिश में है और कुल मिलाकर यह शासन भय व आतंक का माहौल पैदा करके अपने अत्याचारी शासन को जारी रखना चाहता है। 
इससे बड़ा अन्याय क्या होगा कि एक ओर सऊदी अरब में राजनैतिक कार्यकर्ताओं को धड़ा धड़ फांसी दी जा रही है और दूसरी ओर यह देश संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद का सदस्य भी बना हुआ है। (MAQ/N)
 
 

Jul १७, २०१७ १८:०८ Asia/Kolkata
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