सीरिया के मामले में संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेष दूत स्टीफ़न दि मिस्तूरा ने जेनेवा में छह सितंबर को कहा था कि सीरिया सरकार के विरोधियों को चाहिए कि वह वास्तविकताओं को स्वीकार करें और समझें कि युद्ध का कोई फ़ायदा नहीं है और अब उन्हें राजनैतिक उपाय के बारे में सोचना चाहिए।

दि मिस्तूरा के बयान की कुछ आयामों से समीक्षा की जा सकती है। दि मिस्तूरा ने सीरिया सरकार के विरोधियों को संबोधित करते हुए कहा कि युद्ध से कुछ हासिल होने वाला नहीं है किन्तु सवाल यह है कि दुनिया के 80 देशों के नागरिकों की उपस्थिति में सीरिया में होने वाले युद्ध से अभी तक न तो सीरिया की सरकार के लिए कोई परिणाम निकल सका है और न ही इस देश जनता के लिए कोई परिणाम नहीं निकल सका है। दुनिया के 80 देशों से आए आतंकी किसी भी प्रकार की हिंसा से संकोच नहीं करते। 

सीरिया सरकार के कुछ शहरों को छोड़कर लगभग देश के सभी क्षेत्र छह वर्षीय युद्ध के परिणाम में तबाह व बर्बाद हो चुके हैं। सीरिया युद्ध में अब तक 300 अरब डाॅलर का नुक़सान हो चुका है और लगभग एक करोड़ बीस लाख लोग, सीरिया के भीतर और देश के बाहर विस्थापित हो चुके हैं। यहां पर यह बात कहना आवश्यक है कि सीरिया के विस्थापित, फ़िलिस्तीनी विस्थापितों के बाद दुनिया के सबसे बड़े विस्थापित समझे जाते हैं।

अभी तक यह पता नहीं चल सका है कि सीरिया युद्ध में कितने लोग मारे जा चुके हैं किन्तु एक अंदाज़े के अनुसार इस युद्ध में कम से कम तीन लाख लोग मारे गये हैं जबकि लाखों लोग घायल हुए हैं। सीरिया के बच्चों का भविष्य तबाह हो गया है और इस देश की पहचान और संस्कृति बर्बाद हो गयी है। सीरिया सरकार ने जो कुछ अंजाम दिया वह संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुच्छेद क्रमांक 51 के अनुसार क़ानूनी बचाव है किन्तु सीरिया के मामले में सुंयक्त राष्ट्र संघ के विशेष दूत ने सीरिया सरकार को भी विरोधियों के साथ खड़ा कर दिया और सीरिया सरकार को संबोधित करते हुए कहा कि सीरिया सरकार को जान लेना चाहिए कि युद्ध उनकी सरकार के हित में नहीं है।

बहरहाल सीरिया सरकार के साथ उसके घटक देशों ने संकट के आरंभ से ही संकट के राजनैतिक समाधान पर बल दिया है किन्तु अमरीका और उसके पश्चिमी और अरब घटकों ने विरोधियों को विध्वंसक हथियार देकर संकट को और भी जटिल बना दिया है। (AK)

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Sep ०७, २०१७ १४:४२ Asia/Kolkata
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