• हिज़्बुल्लाह को न छेड़ो नहीं तो सात पीढ़ियां....

सऊदी अरब में बैठकर लेबनान के प्रधानमंत्री साद हरीरी को त्यागपत्र दिए हुए लगभग एक सप्ताह का समय हो रहा है और अब इस मामले के अधिकतर आयाम खुलकर सामने आ गये हैं।

इस संबंध में इंडीपेंडेट ने मध्यपूर्व के मामले के अपने प्रसिद्ध टीकाकार और पत्रकार राबर्ट फ़िस्क के हवाले से लिखा कि जब तीन नवंबर को साद हरीरी का विमान रियाज़ में उतरा तो उनको सबसे पहले पुलिसकर्मी ही दिखाई दिए जिन्होंने विमान को अपने घेरे में ले लिया, विमान रुकते ही कुछ पुलिसकर्मी विमान पर चढ़े और हरीरी और उनके अंगरक्षकों के मोबइल फ़ोन ज़ब्त कर लिए और प्रधानमंत्री साद हरीरी केवल मुंह ताकते रहे।

यह कार्यवाही वास्तव में लेबनान के प्रधानमंत्री की सऊदी अरब में गिरफ़्तारी थी। इस कार्यवाही को कोई भी क़ानूनी स्वीकार नहीं करता और यदि देखा जाए तो यह कार्यवाही राजनीती में प्रचलित कामों के भी विपरीत है। यहां पर यह बात भी उल्लेखनीय है कि स्वयं सऊदी समाज ने भी लेबनान के प्रधानमंत्री को रियाज़ बुलाकर और उनके त्यागपत्र की घोषणा की सऊदी अरब की कार्यवाही का साथ नहीं दिया।

सऊदी अधिकारियों की कार्यवाही के समर्थन पर आधारित डोनल्ड ट्रम्प के आरंभिक दृष्टिकोण के बावजूद अमरीकी विदेशमंत्रालय ने भी देर से ही सही एक बयान जारी करके रियाज़ की इस कार्यवाही का सीधे समर्थन नहीं किया और कहा कि क्षेत्र एक नया युद्ध सहन करने की शक्ति नहीं रखता। वाशिंग्टन के इस बयान से यह समझा जा सकता है कि लेबनान के बारे में सऊदी अधिकारियों की कार्यवाही पर पहले कितना मंथन किया गया होगा?

अब देखते हैं कि यूरोप का इस बारे में क्या नज़रिया रहा है। फ़्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रां ने अपने अचानक सऊदी दौरे के दौरान लेबनान के बारे में हालिया स्थिति पर विचार विमर्श किया क्योंकि एलिज़ा पैलेस ने केवल यह घोषणा की थी कि राष्ट्रपति केवल संयुक्त अरब इमारात की ही यात्रा करेंगे। फ़्रांसीसी राष्ट्रपति ने रियाज़ अधिकारियों से अपनी कुछ घंटों की मुलाक़ात में कहा कि वह अपरोक्ष रूप से साद हरीरी से संपर्क करने में सफल रहे। यहां पर यह बात समझ में आ जाती है कि यूरोप को भी पता चल गया है कि साद हरीरी गिरफ़्तार हैं या सऊदी अरब के परिवेष्टन में हैं। इसके बावजूद फ़्रांस के राष्ट्रपति ने सऊदी अरब के समर्थन की बात तक नहीं की और इसके बावजूद उन्होंने लेबनान में स्थिरता की वापसी पर बल दिया।

बहुत से टीकाकारों का कहना है कि सऊदी अरब लेबनान के बारे में इस कार्यवाही से केवल सीरिया, इराक़ और यमन में होने वाली पराजय तथा सीरिया और इराक़ सरकार की तकफ़ीरी आतंकवादियों पर विजय के कारण क्षेत्र में अपनी घटती पोज़ीशन को बहाल करने के प्रयास में है किन्तु इसके लिए रियाज़ के अधिकारियों से सही हिसाब किताब नहीं किया जिसका भुगताने उसे उठाना पड़ रहा है। इन देशों में अपनी पराजय के ज़ख़्म पर मरहम लगाने के लिए उसने अपने अंतिम गढ़ लेबनान का रुख़ करने का प्रयास किया और लेबनान और हिज़्बुल्लाह के विरुद्ध नया मोर्चा खोलने का प्रयास किया। यहां पर टीकाकार सऊदी अधिकारियों को यह सलाह देते हैं कि वह हिज़्बुल्लाह को न छेड़े क्योंकि हिज़्बुल्लाह पहले से अधिक शक्तिशाली हो गया है और यदि सोते शेर को जगाने का प्रयास किया गया तो हिज़्बुल्लाह रियाज़ को ऐसा पाठ सीखाएगा कि उनकी सात पीढ़ियां याद रखेंगी। (AK)

Nov १३, २०१७ १७:२५ Asia/Kolkata
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