• क्यों टल गई मुहम्मद बिन सलमान की ताजपोशी?

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान जिस तेज़ी से बदलाव कर रहे हैं उसे देखकर बहुत से गलियारों में गहरी चिंता है।

क्योंकि यह परिवर्तन उन मापदंडों से बिल्कुल अलग हैं जो इससे पहले तक सऊदी अरब में अपनाए जाते रहे हैं। चिंता इस बात की है कि मुहम्मद बिन सलमान ने जो नई शैली अपनाई है कहीं उससे सऊ अरब शांति और स्थिरता ही दांव पर न लग जाए।

तीन मूल स्तंभ थे जिनके कारण सऊदी अरब में स्थिरता और शांति थी। एक तो शाही परिवार के भीतर संतुलन था, दूसरे वहाबी धार्मिक संस्थाओं का भरपूर सहयोग था और तीसरे सऊदी नागरिकों को सुविधाएं देकर उन्हें नरेश की आज्ञापालन के लिए बाध्य करना।

यह तीनों ही स्तंभ इस समय हिल रहे हैं। शाही परिवार के भीतर जो संतुलन और समन्वय था वह अस्त व्यस्त हो चुका है, क्योंकि बग़ावत के डर से क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान ने कम से कम 11 प्रभावशाली राजकुमारों और सैकड़ों वरिष्ठ अधिकारियों को हिरासत में ले लिया है। गिरफ़तार किए गए राजकुमारों में पूर्व क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन नाएफ़, अरबपती व्यापारी वलीद बिन तलाल, नेशनल गार्ड्स के प्रमुख मुतइब बिन अब्दुल्लाह भी शमिल हैं जो सऊदी अरब के भीतर ही नहीं बाहर भी बहुत प्रभावशाली माने जाते हैं

कोई भी मुक़द्दमा चलाए बग़ैर इन्हें गिरफत़ार कर लिया गया है और उनकी 400 अरब डालर की संपत्ति भी सील कर दी गई है। गिरफतार किए गए राजकुमारों और अधिकारों की निगरानी के विदेशी विदेशी सुरक्षाकर्मी बुलाए गए हैं जो सऊदी कमांडरों के नेतृत्व में काम कर रहे हैं और इस बात पर विशेष रूप से पकड़े गए लोगों के परिवारों में गहरा आक्रोश है।

मुहम्मद बिन सलमान के पास अब पर्यवेक्षकों को चौंकाने के लिए केवल एक ही क़दम बचा है और वह है औपचारिक रूप से सऊदी अरब के नरेश की गद्दी पर विराजमान हो जाना। व्यवहारिक रूप से तो उन्होंने सभी अधिकार अपने हाथ में ले लिए हैं।

इन परिस्थितियों के बारे में दो विचार पेश किए जा रहे हैं। एक विचार तो यह है कि मुहम्मद बिन सलमान के लिए नरेश की गद्दी का रास्ता साफ़ हो चुका है और कुछ ही दिनों के भीतर शाही फ़रमान जारी होगी जिसमें सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ कुर्सी छोड़ने और मुहम्मद बिन सलमान को अपनी जगह बिठाने की घोषणा कर देंगे। यहां तक कि मुहम्मद बिन सलमान के क़रीबी माने जाने वाले टीवी चैनल अलअरबिया ने एक उनके नरेश बनने की ख़बर भी दे दी थी लेकिन बाद में इस ख़बर को हटा लिया गया। कुछ सूत्र तो यहां तक कहने लगे थे कि कुछ ही घंटों में मुहम्मद बिन सलमान को सऊदी अरब का नरेश घोषित किया जाने वाला है। मगर एसा नहीं हुआ कुछ घंटे ही नहीं कई दिन गुज़र गए और यह घोषणा नहीं हुई। इस देरी का कारण अब तक नहीं मालूम हो सका है।

दूसरा विचार यह है कि सऊदी अरब के शाही ख़ानदान में पद छोड़ने की परम्परा नहीं रही है। केवल एक बार ही एसा हुआ था जब शाह सऊद को जो सऊदी शासन के संस्थापक के बड़े बेटे थे हटाकर उनक छोटे भाई और क्राउन प्रिंसा फ़ैसल बिन अब्दुल अज़ीज़ को नरेश बनाया गया था। यह परिवर्तन वहाबी संस्थाओं के समर्थन से किया गया था और शाही परिवार की ओर से भी इसका भरपूर समर्थन किया गया था। उस समय शाही परिवार के सदस्यों की संख्या भी बहुत ज़्यादा नहीं थी।

इस विचार के समर्थक एक उदाहरण यह देते हैं कि शाह फ़हद बीमारी के कारण वर्ष 1995 से 2005 तक बिस्तर पर रहे लेकिन फिर भी उन्हें पद से नहीं हटाया गया बल्कि क्राउन प्रिस अब्दुल्लाह ने इस पद पर रहते हुए देश का संचालन किया और शाह फ़हद बिस्तर पर पड़े होने के बावजूद नरेश ही रहे।

यह स्थिति दोबारा न पेश आए इसके लिए शाह अब्दुल्लाह ने बैअत परिषद बना दी थी मगर बाद में ख़ुद उन्होंने ही इस परिषद की गतिविधियों को रोक दिया।

दोनों विचारों में से कौन सा सही है कुछ  नहीं कहा जा सकता क्योंकि सऊदी अरब अब बहुत बदल गया है। जो कुछ 1960 और 1970 के दशक में हुआ उसे अब मापदंड नहीं बनाया जा सकता। दूसरी बात यह है कि मुहम्मद बिन सलमान को ताजपोशी की बहुत जल्दी है।

सऊदी अरब एतिहासिक दोराहे पर खड़ा है, उसके सामने जो विकल्प हैं वह ख़तरों से भरे हुए हैं। क्या होने वाला है इसके लिए आने वाले दिनों की प्रतीक्षा करनी होगी।

साभार रायुल यौम

Nov १४, २०१७ १६:३० Asia/Kolkata
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