• सऊदी अरब के निशाने पर मध्य एशिया, ईरान के सामने नया मोर्चा खोलने की कोशिश

सऊदी अरब ने हालिया दिनों में विदेश नीति के स्तर पर कई विस्तारवादी कार्यवााहियां की हैं। विशेषकर यह कि मुहम्मद बिन सलमान के क्राउन प्रिंस बनने के बाद ही सऊदी अरब की क्षेत्रीय, आतंरिक व अंतर्रष्ट्रीय नीतियों में काफ़ी परिवर्तन देखने में आ रहा है।

इस अवधि में सऊदी अरब ने विभिन्न क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाने और उदारवादी पंरपरा से निकलने पर विशेष रूप से ध्यान दिया। सऊदी अरब ने इसके लिए पश्चिमी एशिया और उसके परिवर्तनों पर ध्यान दिया ताकि मध्य एशिया के परिवर्तनों ही लहर पर बैठक पर अपने लक्ष्य साध सके, लेकिन हालिया दिनों में यह देखने में आ रहा है कि मध्य एशिया पर भी सऊदी अरब और उसके अधिकारी विशेष रूप से ध्यान दे रहे हैं।  सऊदी अरब के रक्षामंत्री मुहम्मद बिन सलमान की आज़रबाइजान गणराज्य की हालिया यात्रा को इसी परिधि में देखा जा सकता है। 

मध्य एशिया पर सऊदी अरब के नियंत्रण का एक लक्ष्य, क्षेत्रीय संकटों और मुद्दों के समाधान के लिए ईरान से प्रतिस्पर्धा है। वास्तविकता यह है कि पश्चिमी एशिया के हालिया संकटों विशेषकर वर्ष 2011 के परिवर्तनों के बाद सऊदी अरब, कई क्षेत्रों में ईरान से मात खाता हुआ नज़र आया।

एक ओर सऊदी अरब मध्य एशिया में अपने प्रभाव को मज़बूत करते पश्चिमी एशिया में ईरान के मुक़ाबले में अपनी पराजय की भरपाई करना चाहता है जबकि मध्य एशिया और काकेशिया विशेषकर आज़रबाइजान गणराज्य में अपना प्रभाव बनाकर इस देश को ईरान के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास कर रहा है। यहां पर इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि रियाज़, यमन, इराक़, सीरिया और लेबनान में बुरी तरह मुंह की खा चुका है और इसीलिए वह अपनी पराजय का बदला लेने के लिए दूसरी ओर मुंह मारने की कोशिश कर रहा है।

मध्य एशिया में पैठ बनाने के पीछे सऊदी अरब के लक्ष्यों में से एक इन क्षेत्रों में वहाबी विचारधारा को फैलाना है। सऊदी अरब मध्य एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाकर क्षेत्र में ईरान के बढ़ते प्रभाव के लिए एक मज़बूत बांध खड़ा करना चाहता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि वर्तमान समय में वहाबी विचारधारा का सबसे बड़ा समर्थक सऊदी अरब है और उसने सीरिया और इराक़ में उपद्रव फैलाने के लिए वहाबी विचाराधारा का  ही सहारा लिया था।

बहरहाल क्षेत्र और क्षेत्र के बाहर सऊदी अरब, ईरान से कई मोर्चों पर मात खा चुका है और उसने अब ईरान के सामने कोई नया मोर्चा खोलने से बचना चाहिए क्योंकि यमन, सीरिया और इराक़ में उसने अरबों डाॅलर ख़र्च तो कर दिए पर उसके हाथ पराजय के अलावा कुछ भी नहीं लगा। (AK)

Dec ०७, २०१७ १७:५२ Asia/Kolkata
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