• मुहम्मद बिन सलमान के सामने कठिन विकल्प

सऊदी अरब के अधिकारियों को आलोचना कदापि पसंद नहीं है चाहे वह बड़ी आदरपूर्वक ही क्यों न की गई हो।

सऊदी अधिकारी इसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप मानते हैं। नतीजे में सऊदी अरब के शुभचिंतकों की संख्या कम होती चली गई है और विरोधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। मगर इसके बावजूद यदि कोई अरब मीडिया का जायज़ा ले तो उसे नज़र आएगा कि सऊदी अरब के बारे में लेखों और आलोचनाओं की भरमार है। क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान की राजनीति, सुरक्षा, सामरिक व आर्थिक नीतियों की भर्त्सना खूब जम कर हो रही है।

अमरीका के राष्ट्रपति तो सऊदी अरब का ज़रा ख़याल करते हैं लेकिन अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन सऊदी अरब की नीतियों पर टिप्पणी करने से परहेज़ नहीं करते। टिलरसन ने क़तर के साथ सऊदी अरब के विवाद के समाधान में रुकावटें डालने की सऊदी सरकार की नीतियों की आलोचना की और साथ ही क़तर को आतंकी गतिविधियों से पूरी तरह बरी क़रार दिया। हालांकि राष्ट्रपति ट्रम्प ने एसा नहीं किया था।

शुक्रवार को एक बार फिर टिलरसन ने अपने फ़्रांसीसी समकक्ष जान एफ़ लोर्दियान के साथ पेरिस में संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में अपना स्वर कठोर करते हुए कहा कि सऊदी अरब की आंतरिक और विदेश नीति में साज़िश और बड़बोलापन है। टिलरसन ने कहा कि सऊदी अरब को चाहिए कि सोच विचार के बाद कोई नीति अपनाए तथा क्षेत्रीय मामलों में अपनी नीतियों की गहन समीक्षा करे। उन्होंने कहा कि यमन युद्ध में सऊदी अरब की संलिप्तता तथा लेबनान और क़तर के बारे में उसकी नीतियों को लेकर अमरीकी संस्थाओं में चिंता बढ़ती जा रही है।

कुछ दिन पहले ट्रम्प ने भी सऊदी अरब को आंख दिखाई और कहा कि वह यमन की नाकाबंदी तत्काल समाप्त करे और सहायता सामग्री बिना किसी रुकावट के यमन जाने दे।

मुहम्मद बिन सलमान का यह अनुमान था कि यदि अली अब्दुल्लाह सालेह अंसारुल्लाह आंदोलन से अलग हो जाएंगे तो सऊदी अरब को यमन में मज़बूत घटक मिल जाएगा जिसकी मदद से सऊदी अरब और इमारात मिलकर यमन का युद्ध जीत लेंगे। क्योंकि अली अब्दुल्लाह सालेह के पास उनके विचार में मज़बूत सैनिक और क़बायली ताक़त है। मगर गठबंधन तोड़ने के तीसरे दिन अंसारुल्लाह के हाथों अली अब्दुल्लाह सालेह की मौत से मुहम्मद बिन सलमान की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। इमारात और सऊदी अरब ने सालेह की चार शर्तें मानी थीं जिसके बाद सालेह ने अंसारुल्लाह से अपना गठबंधन तोड़ लिया था। पहली शर्त थी कि उन पर लगे प्रतिबंध समाप्त हों, दूसरी शर्त थी कि उन्हें बाद में राष्ट्रपति पद दिया जाए, तीसरी शर्त यह थी कि उनकी तथा उनके परिवार की सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाए और चौथी शर्त यह थी कि भारी वित्तीय सहायता दी जाए।

इस समय सवाल यह है कि मुहम्मद बिन सलमान अमरीकी विदेश मंत्री की आलोचना पर ध्यान देंगे और अपनी रवैया बदलेंगे या नहीं?

हमें एसा नहीं लगता कि मुहम्मद बिन सलमान के रवैए में कोई बदलाव आएगा क्योंकि उनके क़रीबियों का कहना है कि उनमें आत्म विश्वास बहुत ज़्यादा है और जब वह फ़ैसला कर लेते हैं तो उस पर पुनरविचार करना अपनी बेइज़्ज़ती समझते हैं। हमें तो यह लगता है कि अमरीकी विदेश मंत्री के बयान पर मुहम्मद बिन सलमान को ग़ुस्सा आएगा क्योंकि वह टिलरसन को क़तर की क़रीबी मानते हैं। मुहम्मद बिन सलमान यह चाहेंगे कि टिलरसन अमरीका के विदेश मंत्री पद पर बाक़ी न रहें। वैसे भी अटकलें थीं कि उन्हें विदेश मंत्रालय से हटाकर सीआईए के प्रमुख का पद दिया जा सकता है।

अमरीका ने अपना दूतावास तेल अबीब से बैतुल मुक़द्दस स्थानान्तरित करने का फ़ैसला करके मुहम्मद बिन सलमान की मुशकिलें बढ़ा दी हैं क्योंकि एक तरफ़ मुस्लिम जनमत है जो अमरीकी फ़ैसले से आक्रोश में है तो दूसरी तरफ़ वाशिंग्टन के साथ सऊदी अरब का गठबंधन है और वैसे भी वह इस्राईल को नाराज़ नहीं करना चाहते क्योंकि ईरान के विरुद्ध लड़ाई में इस्राईल ही उनका सबसे बड़ा सहारा है।

मुहम्मद बिन सलमान के सामने जो विकल्प हैं वह बहुत ज़्यादा कठिन हैं।

साभार रायुल यौम

Dec ०९, २०१७ १५:५२ Asia/Kolkata
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