• सऊदी युवराज ने लंदन यात्रा से पहले यमन युद्ध में स्वीकार की हार, ईरान को बताया काग़ज़ का शेर

सऊदी अरब के युवराज एवं रक्षा मंत्री मोहम्मद बिन सलमान ने बुधवार को अपनी लंदन यात्रा से ठीक पहले यमन युद्ध में अप्रत्यक्ष रूप से अपनी हार स्वीकार कर ली है।

यमनी बच्चों और नागरिकों के हत्यारे के रूप में ब्रिटेन में विपक्षी दल और मानवाधिकार संगठन मोहम्मद बिन सलमान की लंदन यात्रा का कड़ा विरोध करते रहे हैं।

हालांकि बिन सलमान ने कहा है कि यमन युद्ध अपने अंतिम चरण में है और सऊदी अरब ने यमन की वैध सरकार के समर्थन का अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है।

सऊदी अरब ने 26 मार्च 2015 को यमन के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने से पहले दावा किया था कि रियाज़ यमन के पूर्व भगोड़े राष्ट्रपति मंसूर हादी को सनआ में फिर से सत्ता में लौटाकर ही दम लेगा।

हालांकि यमन युद्ध को 3 वर्ष बीत रहे हैं और बच्चों एवं महिलाओं समेत क़रीब 14,000 आम नागरिक इस युद्ध की भेंट चढ़ चुके हैं, लेकिन इस युद्ध से सऊदी अरब अपना कोई भी लक्ष्य हासिल करने में पूर्ण रूप से नाकाम रहा है।

3 वर्षों तक यमन पर सऊदी अरब की भीषण बमबारी के बावजूद, लगभग 70 प्रतिशत यमन पर अंसारुल्लाह आंदोलन या अल-हौसियों का नियंत्रण है।

यमन युद्ध शुरू होने के कुछ महीनों नहीं बल्कि कुछ हफ़्तों बाद ही, सऊदी अरब को साफ़ दिखाई देने लगा था कि इस युद्ध में सफलता आसान नहीं है। लेकिन आले सऊद शासन के अनाड़ी शासक, क्षेत्र में अपनी सैन्य शक्ति की धाक जमाने का सपना चकनाचूर होते हुए देखते का साहस नहीं जुटा पा रहे थे और इसी अहं के कारण तेल की दौलत से मालामाल यह देश युद्ध की दलदल में धंसता चला गया।

अब हालत यह है कि यमन युद्ध का मुख्य आर्किटेक्ट सऊदी युवराज बिन सलमान अपनी हार को छुपाने के लिए निराधार दावों का सहारा ले रहे हैं।

सीरिया, इराक़ और यमन में ईरान के सामने अपनी मुंह की खाने के बाद, मोहम्मद बिन सलमान ने ईरान को काग़ज़ का शेर बताया है।

हालांकि ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए सऊदी अरब ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया और अमरीका और इस्राईल के लिए अपने ख़ज़ाने के दहाने खोल दिए। इसके बावजूद, ईरान का प्रभाव बढ़ता जा रहा है और आले सऊद शासन अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा है।

दुनिया भर में मानवाधिकारों की स्थिति के लिए आलोचना झेलने वाले सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने एक यह भी निराधार दावा किया कि शिया मुसमलानों के साथ इस देश में किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होता है और शिया मुसलमान अहम पदों पर आसीन हैं।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट के मुताबिक़, सऊदी अरब की जेलों में सबसे अधिक राजनीतिक क़ैदी शिया मुसलमान हैं और उन्हें सामान्य न्यायिक प्रक्रिया से गुज़ारे बिना ही वर्षों तक बिना किसी आरोप के जेलों में क़ैद रखा जाता है। शिया मुसलमानों को जो सऊदी अरब में अल्पसंख्यक हैं, किसी तरह की धार्मिक आज़ादी हासिल नहीं है। msm

 

Mar ०७, २०१८ १९:०३ Asia/Kolkata
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