• सीरिया का दो टूक बयानः ईरानी सलाहकार और हिज़्बुल्लाह के सैनिक सीरिया में बने रहेंगे, उनकी उपस्थिति सरकार की अनुमति से और पूरी तरह क़ानूनी है

सीरिया के विदेश उपमंत्री फ़ैसल मेक़दाद ने रूस की स्पुटनिक न्यूज़ एजेंसी के साथ साक्षात्कार में कहा कि सीरिया की धरती पर किसी भी देश के सैनिकों का बाक़ी रहना या बाहर निकलना सीरिया का आंतरिक मामला है।

इस बयान से उन्होंने यह साफ़ कर दिया कि सीरिया की धरती पर ईरानी सैनिक सलाहकारों और हिज़्बुल्लाह के सैनिकों की उपस्थिति के बारे में रूस और सीरिया के बीच कोई मतभेद नहीं है। रूस यदि विदेशी सैनिकों को बाहर निकाले जाने की बात कर रहा है तो इसमें ईरान और हिज़्बुल्लाह के सैनिक शामिल नहीं हैं जो क़ानूनी रूप से सीरियाई सरकार के निमंत्रण पर सीरिया में तैनात हैं।

सीरिया के मामलों में रूस के विशेष दूत इलेग्ज़न्डर लावरिन्तेफ़ ने सबसे पहले इस विवादित मुद्दे को उठाया। उन्होंने एक सप्ताह पहले घोषणा कर दी कि सीरिया की धरती पर मौजूद सभी विदेशी सैनिकों के लिए ज़रूरी है कि वह बाहर निकल जाएं इनमें अमरीकी, तुर्क, ईरानी तथा हिज़्बुल्लाह के सैनिक सब शामिल हैं। इसी बात को रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतीन ने सीरियाई राष्ट्रपति बश्शार असद से सूची में अपनी मुलाक़ात के बाद दोहराया लेकिन साथ ही उन्होंने कहा कि सेनाएं तब निकलेंगी जब सीरिया में आतंकवाद के विरुद्ध जारी लड़ाई पूरी तरह सफल हो जाएगी और राजनैतिक प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

फ़ैसल मेक़दाद ने कहा कि सीरिया में जो सैनिक उपस्थित हैं उन्हें दो वर्गों में रखा जा सकता है। एक वर्ग में रूस, ईरान और हिज़्बुल्लाह के सैनिक हैं जो क़ानूनी रूप से सीरिया में मौजूद हैं क्योंकि सीरिया की सरकार ने इसकी मांग रखी थी। दूसरे वर्ग में अमरीकी और तुर्क सैनिक हैं जो ग़ैर क़ानूनी रूप से सीरिया की धरती में घुसे हैं और आतंकवाद का समर्थन कर रहे हैं।

इस समय दो प्रकार की विचारधाराएं हमारे सामने हैं। रूस चाहता है कि सीरिया से ईरानी सैनिक और उनके घटक सब बाहर निकल जाएं मगर सीरिया इसका विरोध कर रहा है। सीरिया का कहना है कि यह घटक सैनिक हैं जिन्होंने सीरिया की रक्षा और असद सरकार को गिरने से बचाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन सैनिकों का मौजूद रहना ज़रूरी है यहां तक कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई पूरी हो जाए और देश के हर भाग पर सीरियाई सरकार का नियंत्रण बहाल हो जाए।

चिंता का विषय यह है कि रूस सीरिया से ईरानी सैनिकों के बाहर निकलने की बात एसे समय कर रहा है जब इस्राईल और ईरान का तनाव बहुत बढ़ चुका है क्योंकि सीरिया में ईरान के सैनिक ठिकाने हैं जिन पर इस्राईल की एफ़-35 युद्धक विमानों ने हमले किए हैं। इसके जवाब में ईरान ने इस्राईली क़ब्ज़े वाले गोलान हाइट्स के इलाक़े में इस्राईली सैनिक ठिकानों पर 55 मिसाइल मारे।

सीरियाई सरकार से यह मांग करना कि वह ईरानी सैनिकों को बाहर निकाले तर्कहीन है विशेषकर इस समय जब तनाव बहुत बढ़ा हुआ है। सारी ख़राबी की जड़ तो इस्राईल है जो सीरिया के भीतर हमले कर रहा है और राष्ट्रपति असद की टारगेट किलिंग की धमकियां दे रहा है। दूसरी बात यह है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है। पश्चिमोत्तरी सीरिया में कुछ इलाक़े इसी तरह दक्षिण पश्चिमी सीरिया और पूर्वी सीरिया के कुछ इलाक़े अब भी आतंकियों के नियंत्रण में हैं। कुछ इलाक़ों पर तुर्क सेना ने क़ब्ज़ा कर रखा है और कुछ इलाक़ों पर अमरीकी सैनिक मौजूद हैं।

प्रमुख इलाक़ों से आतंकियों को खदेड़ देने के बाद हिज़्बुल्लाह के अधिकतर सैनिक लेबनान वापस जा चुके हैं और उन्होंने दक्षिणी लेबनान में अपनी पोज़ीशनें संभाल ली हैं। मगर ईरानी सलाहकारों की उपस्थिति बहुत ज़रूरी है और यह ज़रूरत इस समय बहुत ज़्यादा है क्योंकि हाल ही में अमरीका के विदेश मंत्री ने बहुत ख़तरनाक बयान दिया है। इस बयान में उन्होंने ईरान के सामने 12 शर्तें रखी हैं जो ईरान को परेशान करने वाली हैं। इन शर्तों में भी कहा गया है कि ईरानी सैनिक सीरिया से बाहर निकलें। इस समय सीरिया की राजनैतिक व्यवस्था तेहरान की राजनैतिक व्यवस्था से जुड़ी हुई है। दोनों ही देश मिलकर अमरीका और इस्राईल का मुक़ाबला कर रहे हैं।

सीरिया से ईरानी सैनिकों को आख़िरकार बाहर निकलना है लेकिन इसका फ़ैसला सीरिया करेगा, इस्राईल की मांग पर एसा कदापि नहीं होगा और न ही अमरीकी दबाव कारगर होगा। ईरानी सैनिक तब तक सीरिया में रहेंगे जब तक हर इलाक़े को पूरी तरह आज़ाद नहीं करा लिया जाता और ग़ैर क़ानूनी रूप से घुसे सैनिक सीरिया से हट नहीं जाते।

अमरीका सहित कुछ पश्चिमी देशों और फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों ने सीरियाई सरकार का तख़्ता उलटने के लिए आतंकी संगठनों की भरपूर मदद की तभी तो सीरियाई सरकार को ईरान, रूस और हिज़्बुल्लाह की मदद की ज़रूरत पड़ी यदि अमरीका, क़तर और सऊदी अरब की अगुवाई में सीरिया के ख़िलाफ़ यह साज़िश न रची गई होती तो सीरिया को ईरान रूस और हिज़्बुल्ला की मदद की ज़रूरत ही न पड़ती।

रूस एक बड़ी ताक़त है उसने सीरिया सहित कई देशों को ध्वस्त करने की अमरीकी योजना को नाकाम बनाया है उसे चाहिए कि इस्राईली धमकियों के आगे न झुके।

साभार रायुल यौम

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मई २४, २०१८ १६:३५ Asia/Kolkata
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