• निवेशकों को डराने के बाद अब विश्वास जीतना चाहते हैं बिन सलमान, क्या कामयाबी मिलेगी?

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान के बारे में यह टिप्पणियां तेज़ हो गई हैं कि वह ख़ुद को लौह पुरुष ज़ाहिर करने के चक्कर में आनन फ़ानन फ़ैसले करते हैं और चूंकि इन फ़ैसलों में दूरदर्शिता की कमी होती है इसलिए इसके विनाशकारी परिणामों को वह रोक नहीं पाते।

मुहम्मद बिन सलमान ने क्राउन प्रिंस का ओहदा हथिया कर देश के भीतर और विशेष रूप से राजशाही परिवार के भीतर अपनी करिश्माती पहिचान बनाने की कोशिश की। उन्होंने जहां एक तरफ़ यमन पर युद्ध थोप दिया और अपनी संकल्प शक्ति का लोहा मनवाने की कोशिश की वहीं देश की अर्थ व्यवस्था की तेल पर निर्भरता ख़त्म करने का ख़्वाब दिखाया। मुहम्मद बिन सलमान ने इसके लिए विजन 2030 पेश किया। मगर 32 साल के बिन सलमान की अगुवाई में जो फ़ैसले किए गए और किए जा रहे हैं उससे तो यही लग रहा है कि सऊदी अरब की अर्थ व्यवस्था गर्त में जा रही है।

सऊदी अरब ने हाल ही में फ़ैसला किया है कि वर्ष 2019 तक देश की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको के शेयर बेचने की प्रक्रिया रोक दी जाए।

2030 विजन के आधार पर सऊदी अरब की कोशिश यह है कि तेल पर निर्भरता में 50 प्रतिशत तक कमी की जाए तथा अर्थ व्यवस्था को तेल पर निर्भर अर्थ व्यवस्था के बजाए बहुआयामी अर्थ व्यवस्था बनाया जाए। अरामको के 5 प्रतिशत शेयर बेचना भी इसी विजन का हिस्सा है। मगर शेयर बेचने का कार्यक्रम रोक दिए जाने से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि सऊदी अरब को इस कंपनी के शेयर की वह क़ीमत नहीं मिल रही है जिसकी उसे अपेक्षा थी।

रोयटर्ज़ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि इस प्रक्रिया के आर्थिक सलाहकारों को बाहर निकाल दिया गया है। सऊदी अरब यह समझ रहा था कि इस कंपनी के शेयर विदेशी बाज़ारों में बिक जाएंगे मगर सऊदी अरब के भीतर सुरक्षा मुद्दों को लेकर गहरी चिंता पैदा हो जाने के कारण विदेशी कंपनियों की रूचि बहुत कम हो गई है।

मध्यपूर्व के मामलों के विशेषज्ञ पेट्रिक काकबर्न का कहना है कि आर्थिक सुधार और तेल की आमदनी पर निर्भरता कम करने के संदर्भ में सऊदी अरब के अधिकारी जो कुछ कह रहे हैं वह सब खोखली बातें हैं, सऊदी अरब में यह इच्छाशक्ति ही नहीं है कि वह तेल की आमदनी पर अपनी निर्भरता में कोई कमी करे।

सऊदी अरब ने ख़ुद को यमन युद्ध में उलझा रखा है इसके नतीजे में यमन की सेना और स्वयंसेवी बलों के हमलों से सऊदी अरब के सैनिक और आर्थिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा ख़तरे में पड़ गई है। यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन के प्रमुख अब्दुल मलिक अलहौसी ने खुलकर कहा कि निवेशकों को चाहिए कि सऊदी अरब और इमारात में निवेश करने से बचें बल्कि अपना निवेश वहां से हटाकर ओमान जैसे देशों में ले जाएं क्योंकि यमन के बारे में इमारात और सऊदी अरब की जो नीतियां हैं उसके जवाब में यमन की सेना और स्वयंसेवी बल इन दोनों देशों के सैनिक और आर्थिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाएंगे।

दूसरी बात यह है कि सऊदी अरब की सरकार ने जिस तरह राजकुमारों और उद्यमियों को अचानक गिरफत़ार कर  लिया और महीनों उन्हें रियाज़ के होटल में बंद रखा तथा अरबों डालर की रक़म वसूल करने के बाद उन्हें छोड़ा उससे सऊदी निवेशक भी काफ़ी डरे हुए हैं और अपनी पूंजी कहीं और स्थानान्तरित करने की कोशिश में हैं। इन हालात में विदेशी निवेशकों की चिंता तो और भी बढ़ गई है।

इसी अविश्वास के वातावरण को देखते हुए मुहम्मद बिन सलमान ने देश के बड़े निवेशक वलीद बिन तलाल की मुलाक़ात अपने पिता और सऊदी नरेश सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ से करवाई। वलीद बिन तलाल की संपत्ति 17 अरब डालर या उससे कुछ ज़्यादा बताई जाती है। वह भी उन लोगों में शामिल हैं जिन्हें गिरफ़तार कर लिया गया था और बाद में भारी रक़म लेने के बाद छोड़ तो दिया गया है लेकिन उनके देश से बाहर जाने पर प्रतिबंध लगा हुआ है।

मुहम्मद बिन सलमान ने वलीद बिन तलाल की मुलाक़ात सऊदी नरेश से करवाई और फिर इस मुलाक़ात की तसवीरें सोशल मीडिया पर शेयर करवाईं ताकि निवेशकों की चिंता दूर हो मगर टीकाकार यह कहते हैं कि निवेशक विशेष रूप से विदेशी निवेशक कोई भी निवेश करते समय यह देखते हैं कि स्थानीय सरकार की नीतियां कैसी हैं यदि नीतियों में स्थिरता न हो तो वह एसी जगह कोई भी निवेश करने से बचते हैं। इसलिए एसा लगता है कि मुहम्मद बिन सलमान के लिए निवेशकों का विश्वास जीतना बहुत कठिन काम होगा।

टैग्स

Aug २३, २०१८ २०:१० Asia/Kolkata
कमेंट्स