यमन की सेना और स्वयंसेवी बलों ने सऊदी अरब और इमारात की आर्थिक नब्ज़ पर हमले तेज़ कर दिए हैं। साढ़े तीन साल से सऊदी अरब और उसके घटक यमन पर हमले करते आ रहे हैं।

इन हमलों में यमन का इन्फ़्रास्ट्रक्चर ध्वस्त होकर रह गया है और हज़ारों की संख्या में आम नागरिक मारे गए हैं। आले सऊद शासन यह सोच रहा था कि यमन युद्ध बहुत कम समय में समाप्त हो जाएगा और हालात उसके नियंत्रण में आ जाएंगे लेकिन यमन की सेना और स्वयंसेवी बलों ने जिस प्रकार का प्रतिरोध किया है उसने सारे अनुमानों को ग़लत साबित कर दिया और यह युद्ध सऊद अरब और इमारात के लिए थका देने वाला युद्ध बन गया है। सम गुज़रने के साथ साथ यमन की सेना और स्वयंसेवी बलों ने अपनी मिसाइल ताक़त बढ़ा ली और जवाबी हमलों में सऊदी अरब और इमारात की आर्थिक नब्ज़ कहे जाने वाले प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है।

यमन की सेना ने सऊदी अरब के दक्षिणी प्रांत जीज़ान में इस देश की सबसे बड़ी तेल व पेट्रोकेमिकल कंपनी अरामको के प्रतिष्ठान पर मिसाइल हमला किया। इससे पहले यमनी सेना ने इमारात में दुबई एयरपोर्ट पर ड्रोन से हमला कर दिया था।

अब जब सऊदी अरब और इमारात की आर्थिक नब्ज़ पर हमले तेज़ हो गए हैं और दूसरी ओर यमन युद्ध का भारी ख़र्च दोनों हमलावर देशों की अर्थ व्यवस्था को कमज़ोर कर रहा है तो सऊदी अरब के आले सऊदी और इमारात के आले नहयान शासन की चिंता बढ़ गई हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि यमन युद्ध पर सऊदी अरब का रोज़ाना कम से कम 20 करोड़ डालर का बजट ख़र्च हो रहा है जो सालान 72 अरब डालर और तीन साल में 216 अरब डाल से अधिक हो चुका है।

इमारात की अर्थ व्यवस्था का मामला यह है कि उसके स्तंभ पर्यटन, होटल उद्योग, रियल स्टेट और अंतर्राष्ट्रीय वित्ती संस्थाओं का एकत्रित हो जाना है। इस प्रकार की अर्थ व्यवस्था सुरक्षा के मुद्दे पर निर्भर रहती है।

यमन की सेन और स्वयंसेवी बलों ने इमारात और सऊदी अरब की आर्थिक नब्ज़ कहे जाने वाले प्रतिष्ठानों को इसी लिए निशाना बनाना शुरू किया है कि चरमरा रही अर्थ व्यवस्थाओं पर यह वार कुठराघात  लगाए।

अरामको के प्रतिष्ठान पर किया जाने वाला मिसाइल हमला कोई पहला हमला नहीं था बल्कि इससे पहले भी कई बार अरामको के अलग अलग प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया है। यमन की सेना के प्रवक्ता अज़ीज़ राशिद ने दुबई एयरपोर्ट पर हमले के बारे में बताया कि यह हमने वार्निंग दी है इसी तरह अरामको पर हमला भी सऊदी अरब के लिए वार्निंग है कि यह प्रतिष्ठान हमारे मिसाइलों की पहुंच के भीतर हैं।

इमारात और सऊदी अरब दोनों को इस बात की चिंता है कि सुरक्षा के ख़तरे में पड़ जाने की स्थिति में विदेशी निवेश बहुत तीव्र गति से इन देशों से निकल जाएगा। इस तरह सऊदी अरब और इमारात के सामने अब बहुत कठिन घड़ी है। या तो वह यमन युद्ध को ख़ामोशी से बंद कर दें या फिर अपने आर्थिक व सामरिक प्रतिष्ठानों पर यमन के मिसाइल व ड्रोन हमलों के नुक़सान को सहन करें।

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Sep ०४, २०१८ १९:५५ Asia/Kolkata
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