• ख़ाशुक़जी हत्याकांड, अमरीकी प्रतिबंधों की धमकी के जवाब में सऊदी अरब का पलटवार घातक होगा

जमाल ख़ाशुक़जी हत्याकांड को लेकर सऊदी अरब के ख़िलाफ़ अमरीका की प्रतिबंधों की धमकी एक गीदड़ भभकी से ज़्यादा कुछ नहीं है।

वह इसलिए कि तेल की दौलत से मालामाल सऊदी अरब ने धमकी दी है कि अगर उसे किसी तरह की कोई सज़ा दी गई तो वह इसका कड़ा उत्तर देगा।

ग़ौरतलब है कि वाशिंगटन ने धमकी दी थी कि अगर इस्तांबुल स्थित सऊदी कांसूलेट से लापता हुए पत्रकार ख़ाशुक़जी की हत्या का आदेश रियाज़ ने दिया होगा तो उसे कड़ी सज़ा दी जाएगी।

तुर्क सरकार का कहना है कि उसके पास इस बात के सुबूत हैं कि ख़ाशुक़जी को सऊदी कांसूलेट में पहले यातनाएं दी गईं, उसके बाद बहुत ही बेरहमी से उनके शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिए गए।

विश्व बैंक के पूर्व सलाहकार एवं तेल अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ डॉ. ममदूह जी. सलामेह का कहना है कि “किसी भी दंड के जवाब में अमरीका को सऊदी अरब की जवाबी कार्यवाही की योग्यता को कम करके नहीं आंकना चाहिए। 1973 में इतिहास के उस पाठ को नहीं भूलना चाहिए जब सऊदी अरब ने जवाबी कार्यवाही करने में किसी तरह की हिचकिचाहट से काम नहीं लिया था।“

वास्तव में 1973 में सऊदी अरब और इलाक़े की कुछ तेल कंपियों ने वाशिंगटन को तेल बेचने से इनकार कर दिया था, जिसके कारण अमरीका में तेल की कमी हो गई थी और क़ीमतें आसमान को छूने लगी थीं।

इसीलिए विशेषज्ञों का मानना है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की प्रतिबंध की धमकियां गीदड़ भभकी से ज़्यादा कुछ नहीं है।

डॉ. सलामेह ने आगे कहा, अगर ट्रम्प सऊदी अरब के ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगाते हैं तो रियाज़ आसानी से तेल के उत्पदान में कमी कर देगा या कम से कम ईरानी तेल पर अमरीकी प्रतिबंधों के कारण विश्व बाज़ार में होने वाली तेल की कमी की भरपाई करने से इनकार कर देगा।

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पत्रकार की मौत के कारण सऊदी अरब को दंडित किया जाए या नहीं, सऊदी अर्थव्यवस्था विघटन होने जा रहा है।

“सऊदी अरब, चीन को 10 लाख बैरल तेल सप्लाई करता है, चीन की मांग है कि अब वह सऊदी अरब को तेल का भुगतान युआन में करेगा। दूसरी ओर चीन, सऊदी अरब से तेल आयात करने वाला सबसे बड़ा देश है और रियाज़ अपने इस कस्टमर को हाथ से खोना नहीं चाहता। लेकिन अगर सऊदी अरब पैट्रो-युआन में भुगतान को स्वीकार करता है तो इससे अमरीका को परेशानी होगी। इसलिए सऊदी अरब को यहां समझौता करना होगा और चीन से युआन, यूरोपीय संघ से यूरो और अमरीका से डॉलर में ही तेल का भुगतान स्वीकार करना होगा।”  

“इस प्रकार जीत चीन की ही होगी, इसलिए कि सऊदी अरब 75 प्रतिशत तेल चीन को निर्यात करता है, भविष्य में इसमें वृद्धि भी हो सकती है।”

 

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Oct १८, २०१८ १६:५९ Asia/Kolkata
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