Dec १५, २०१८ २०:११ Asia/Kolkata
  • अरब लीग में सीरिया की सदस्यता बहाल करने की क्यों होने लगी है चर्चा, क्या साज़िशकर्ताओं ने स्वीकार कर लिया कि सीरिया में उन्हें हुई है करारी हार?

अरब संसद का नाम कम ही लोगों ने सुना होगा अतः उसकी भूमिका और उसके दायित्व के बारे में भी शायद कम ही लोग जानते होंगे। कारण यह है कि यह संसद इन देशों की सांसदों का सदन है जिनमें अधिकतर के यहां कोई चुनाव ही नहीं होते बल्कि वहां के प्रतिनिधि डिक्टेटरशिप का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इस तरह देखा जाए तो यह संस्था आराम से बैठ कर बातचीत करने का एक पटल है और सदस्यों को अच्छी तनख़्वाहें भी मिलती हैं और सदस्य वही लोग बनते हैं जो अपनी सरकारों के क़रीबी होते हैं। इसकी हालत भी अरब लीग वाली हालत है।

अरब संसद के बारे में लिखने का विचार इसलिए आया कि इस संस्था ने शुक्रवार को एक बयान जारी किया है जिसमें अरब लीग तथा उसके महासचिव से मांग की गई है कि सीरिया की सदस्यता का तत्काल बहाल किया जाए और अरब जगत संयुक्त एजेंडे पर काम शुरू करे। सीरिया की सदस्यता सात साल पहले स्थगित कर दी गई थी और इस तरह अरब लीग अपने इस सामान्य से दायित्व से भी दूर हो गया था जो वह कभी कभी अदा कर देता था और उन मुट्ठी भर देशों के हाथ की कठपुतली बन गया था जो सीरिया के ख़िलाफ़ पश्चिमी देशों की साज़िश का हिस्सा थे।

सात साल की नींद के बाद अचानक इस संस्था को जो होश आया है तो यह कोई संयोग नहीं है और न ही इसका कारण यह है कि अरब संसद और उसके स्पीकर की अंतरात्मा जाग गई है। इस संस्था को पता चल चुका है कि दमिश्क़ सरकार को गिराने और सीरिया को टुकड़े टुकड़े करने की उसकी साज़िश विफल हो चुकी है और अब जो नया सीरिया सामने है वह पहले से अधिक शक्तिशाली हो चुका है तथा पूरे गौरव के साथ उभर रहा है जबकि अरब संसद की छवि पूरे अरब जगत में ध्वस्त हो चुकी है।

यहां कई सवाल पैदा होते हैः

एक सवाल तो यह है कि यह वापसी किस तरह होगी क्या दो मीठी मीठी बातें करके और एक क़लम हिला कर सीरिया को वापस बुला  लिया जाएगा?

दूसरा सवाल यह है कि क्या सीरिया की जनता और सरकार उस अरब लीग और अरब संसद में लौटना पसंद करेगी जिसने सीरिया के ख़िलाफ़ भयानक अपराधों में हिस्सा लिया और यह सारा ड्रामा अमरीका की देखरेख में हुआ?

तीसरा सवाल यह है कि साज़िश में शामिल देश क्या अब अपनी ग़लती मानकर माफ़ी मांगेंगे और क्या सीरिया को हुए नुक़सान का हर्जाना देंगे?

चौथा सवाल यह है कि अरब लीग जो पूरी तरह हाशिए पर चली गई है क्या वह इस लायक़ है कि सीरिया उसमें वापस आए और अगर आएगा तो इससे उसे क्या फ़ायदा होगा?

इन सवालों के जवाब हमारे पास नहीं हैं और हम समझते हैं कि इन सवालों के जवाब अरब लीग के महासचिव अहमद अबुल ग़ैत के पास भी नहीं होंगे। दूसरी बात यह है कि एसा नहीं लगता कि अरब लीग में सदस्यता निलंबित होने पर सीरिया की जनता और सरकार को किसी बात की कोई चिंता होगी।

अरब लीग और अरब संसद में सीरिया की सदस्यता बहाल करने की मांग सीरिया की मुहब्बत में नहीं सामने आई है बल्कि अरब वर्ल्ड की भूमिका मज़बूत करने की इच्छा के तहत है जो पूरी तरह तबाह हो चुकी है। यही नहीं अमरीका और इस्राईल द्वारा समर्थित सारी योजनाएं भी विफल हो चुकी हैं।

यह दावत एसे समय दी गई है जब पश्चिमी देश दमिश्क़ में अपने दूतावास पुनः खोलने की कोशिश में लगे हुए हैं क्योंकि उन्हें भी यक़ीन हो चुका है कि सीरिया संकट से पूरी सफलता के साथ बाहर निकल चुका है। सीरिया अब अगर अरब लीग में वापस आता है तो ज़रूरी है कि पहले यह संस्था सीरिया से माफ़ी मांगे और उसे हर्जाना अदा करे।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

टैग्स

कमेंट्स