Dec १७, २०१८ १७:०८ Asia/Kolkata
  • सीरिया का तेल और गैस से मालामाल इलाक़ा बन गया है रणक्षेत्र, तुर्की का नया पैंतरा, अब क्या होगी तसवीर?

तुर्की के विदेश मंत्री मौलूद चाशुव ओग़लू ने जो दोहा फ़ोरम में भाग लेने के लिए क़तर की यात्रा पर गए हैं बड़ा विस्फोटक बयान दे दिया है।

उन्होंने कहा कि यदि सीरिया में संयुक्त राष्ट्र संघ की निगरानी में पारदर्शी चुनाव में राष्ट्रपति बश्शार असद जीत जाते हैं तो संभव है कि तुर्की सीरिया के साथ सहयोग शुरू कर दे। उन्होंने कहा कि पारदर्शी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर अमल होना चाहिए और चुनाव में सीरिया की जनता ही यह फ़ैसला करेगी कि इस देश पर कौन शासन करेगा।

बहुत सोच समझ कर दिए गए इस बयान के अलग अलग अर्थ निकाले जा रहे हैं। इसका कारण यह भी है कि यह बयान दोहा में दिया गया है और सीरिया के राष्ट्रपति बश्शार असद ने दो महीना पहले एक साक्षात्कार में बताया था कि क़तर ने सीरिया से कूटनैतिक संबंध बहाल करने के लिए संपर्क किया है जबकि इससे पहले क़तर ने लेबनान में हिज़्बुल्लाह से संबंध बहाल कर लिए हैं और ईरान के साथ उसके स्ट्रैटेजिक संबंध हैं।

एक विचार यह है कि तुर्क सरकार सीरिया के भीतर अमरीका द्वारा समर्थित कुर्द फ़ोर्स पर हमला करने की तैयारी में है जो सीरिया के पूर्वोत्तरी इलाक़े में मौजूद है। मगर इस हमले के नतीजे में अमरीका और तुर्की के बीच टकराव हो सकता है। इन हालात में तुर्की की कोशिश है कि सीरिया की बश्शार असद सरकार से उसके संबंध अच्छे हो जाएं और रूस के सुझाव के अनुसार दोनों देशों के बीच वार्ता का मार्ग खुल जाए।

दूसरा विचार यह है कि तुर्की सीरिया को प्रेशर टूल के रूप में प्रयोग करना चाहता है। सीरिया के मामले में जब भी तुर्की किसी संकट में पड़ा है और वाशिंग्टन से उसके टकराव की नौबत आ गई तो तुर्क सरकार ने इस प्रकार के संकेत दिए कि वह दमिश्क़ के क़रीब जाने का इरादा रखती है और जब भी संकट दूर हो गया तो वह फिर से सीरिया के राष्ट्रपति बश्शार असद के ख़िलाफ़ आग उलगना शुरू कर दिया। इसका एक उदाहरण यह दिया जाता है कि तुर्की के प्रधानमंत्री बिन अली येल्दरीम ने गत अगस्त महीने में बयान दिया कि राष्ट्रपति कुछ समय तक तो सीरिया के राष्ट्रपति बने रह सकते हैं लेकिन वह भविष्य में एक पक्ष के रूप मे बाक़ी नहीं रहेंगे। इस बयान के बाद अटकलें लगाई जाने लगीं कि तुर्की की सरकार सीरिया के साथ संबंधों पर जमी बर्फ़ को कम करने की कोशिश कर रही है। मगर इसके बाद तुर्क राष्ट्रपति अर्दोग़ान ने सीरियाई राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ बहुत कठोर बयान दिया और ज़हर उगला। इस तरह दोनों देशों में किसी भी प्रकार की निकटता की संभावना समाप्त हो गई।

दोनों विचार में से कौन सा विचार सही है यह कहना मुशकिल है लेकिन इतना कहा जा सकता है कि अंकारा और दमिश्क़ के बीच इन दिनों रूस की निगरानी में कुछ निकटता आ रही है। विशेषकर इसलिए भी कि सीरिया के मामले में तुर्की ने अपने कठोर स्टैंड में नर्मी पैद कर ली है क्योंकि सीरियाई सरकार की ताक़त तेज़ी से बढ़ी है और देश का अधिकतर भाग सीरियाई सरकार के नियंत्रण में आ चुका है जबकि सीरियाई विद्रोही पूरी तरह कमज़ोर हो चुके हैं।

यह बात भी रोचक है कि इन दिनों जहां तुर्की की सरकार सीरिया के क़रीब जाने की कोशिश कर रही है वहीं सीरियाई कुर्द फ़ोर्सेज़ भी खुद को दमिश्क़ सरकार के क़रीब करने का प्रयास कर रही हैं। कुर्द फ़ोर्सेज़ सीरिया में फ़ुरात नदी के पूर्वोत्तरी भाग में एक बड़े हिस्से में मौजूद हैं और जिन पर तुर्की हमला करना चाहता है। तुर्की इन फ़ोर्सेज़ पर इसलिए हमला करना चाहता है कि यदि यह फ़ोर्सेज़ मज़बूत हुईं तो तुर्की के भीतर मौजूद कुर्द भी मज़बूत होंगे जो तुर्की से अलग होने के लिए सशस्त्र संघर्ष कर रहे हैं।

तुर्की को अच्छी तरह पता है कि अमरीका दाइश से संघर्ष के नाम पर कुर्द फ़ोर्सेज़ को मज़बूत कर रहा है और यह तुर्की के लिए बहुत बड़ी चिंता का विषय है। इसलिए कि अमरीका की इस साज़िश में सऊदी अरब और इमारात भी साथ दे रहे हैं क्योंकि इन दोनों देशों को क़तर के साथ होने वाले संकट के दौरान तुर्की की भूमिका पर आपत्ति है। तुर्की ने क़तर का समर्थन करते हुए 35 हज़ार सैनिक क़तर भेज दिए थे। अमरीका द्वारा समर्थित कुर्द फ़ोर्सेज़ सीरिया के जिस इलाक़े में तैनात हैं सऊदी सरकार के मंत्री तामिर सबहान ने वहां का दौरा भी किया था और कुर्द फ़ोर्सेज़ के कमांडरों तथा क़बायली सरदारों से मुलाक़ात की थी।

तुर्की चाहता है कि कुर्द फ़ोर्सेज़ पर हमला कर दे ताकि वह कोई बड़ी ताक़त बनने से पहले ही क्षीण हो जाएं। तुर्की ने हमले की जो धमकी दी है उसकी गंभीरता तीन बातों से ज़ाहिर होती है।

पहली चीज़ तो यह है कि कुर्द फ़ोर्सेज़ ने दमिश्क़ सरकार को संदेश भेजा है कि यदि तुर्की ने हमला शुरू किया तो सीरिया की सारी फ़ोर्सेज़ तुर्की के मुक़ाबले में डट जाएं। क्योंकि तुर्की का हमला अंतर्राष्ट्रीय नियमों का खुला उल्लंघन है और इससे सीरिया में जारी राजनैतिक प्रक्रिया प्रभावित होगी।

दूसरी चीज़ यह है कि अमरीका ने सीरियाई विद्रोही संगठनों को धमकी दी है कि वह कुर्द फ़ोर्सज़ पर हमले की कोशिश न करें और अगर उन्होंने तुर्की के किसी हमले में मदद की तो उनका बुरा अंजाम हो सकता है।

तीसरी चीज़ यह है कि सीरिया, ईरान और रूस की सरकारें इस मामले में पूरी तरह ख़ामोश हैं और अमरीका तथा तुर्की के बीच बढ़ते तनाव पर नज़र रखे हुए हैं। क्या इस मौन का यह मतलब है कि वह तुर्की के साथ हैं या इसमें कोई खास लक्ष्य निहित है? यह सोचने का बिंदु है।

हमें नहीं मालूम कि तुर्की ने हमले की जो धमकी दी है उसमें गंभीरता है या अंकारा सरकार इस प्रकार वाशिंग्टन के साथ वार्ता का कोई मार्ग खोलना चाहती है ताकि कोई बीच का रास्ता निकल आए जैसा कि मन्बिज और इफ़्रीन में हुआ था। यदि इस धमकी में गंभीरता है तो क्या रूस से इस बारे में समन्वय हो गया है?

फ़ुरात नदी के पूर्वोत्तर का इलाक़ा भविष्य में स्थानीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों के टकराव का मैदान बन सकता है जहां सीरिया के तेल व गैस भंडारों का 70 प्रतिशत भाग मौजूद है और जहां बड़ी उपजाऊ भूमा है। इसी इलाक़े में बहुत उच्च कोटि की रूई भी पैदा होती है।

इस टकराव का नतीजा जो भी हो इसका फ़ायदा सीरिया की सरकार को ज़रूर मिलेगा जो अब तक इस मामले में हालात पर नज़र रखे हुए है और हमारे विचार में यह बड़ी समझदारी भरी नीति है।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

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