Dec १७, २०१८ २०:५६ Asia/Kolkata
  • सऊदी अरब फिर दिखा रहा है 1973 वाला तेवर, क्या अमरीकी घटक को झटका देना चाहता है रियाज़? क्या बिन सलमान के पास मौजूद हैं शाह फ़ैसल वाले विकल्प?

एसा लगता है कि इस समय एक बार फिर 1973 में जो कुछ हुआ था उसे याद किया जा रहा है जब फ़िलिस्तीनी इलाक़ों से इस्राईल को बाहर निकलने पर मजबूर करने के लिए सऊदी अरब ने अमरीका को तेल की सप्लाई रोक दी थी। यह फ़ैसला तत्कालीन सऊदी नरेश शाह फ़ैसल ने किया था।

1973 की उस घटना की याद ताज़ा करने पर सऊदी अरब के मीडिया और विशेष रूप से सोशल मीडिया का बड़ा ज़ोर है। उस समय सऊदी अरब ने एक साथ अमरीका, जापान और यूरोप के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था। इस पर अमरीका ने अपनी समुद्री बेड़ा लाल सागर और फ़ार्स खाड़ी की ओर से रवाना करने का एलान किया था जिसके बाद सऊदी अरब के एक अधिकारी ने कहा था कि पश्चिमी देशों की सेनाएं पहुंचने से पहले ही हम तेल के कंओं में आग लगा देंगे और तेल के कुओं पर नियंत्रण करने का अमरीका का सपना चकनाचूर हो जाएगा और पूरी दुनिया की अर्थ व्यवस्था ढह जाएगी।

इस समय 1973 को याद करने की बात इसलिए की जा रही है कि अमरीकी सेनेट ने वरिष्ठ सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या के लिए सऊदी क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान को ज़िम्मेदार ठहराया है। साथ ही एक अन्य प्रस्ताव में यमन युद्ध में सऊदी अरब को अमरीका की ओर से मिलने वाला समर्थन रोकने की मांग भी कर दी है।

सेनेट के प्रस्तावों के जवाब में सऊदी अरब ने कहा है कि यह हमारे आंतरिक मामले में खुला हस्तक्षेप है और प्रस्ताव एसे दावों पर आधारित है जिनका कोई आधार नहीं है। सऊदी सरकार के इस कठोर बयान के कारण 1973 की परिस्थितियां याद आ रही हैं।

टीकाकार कहते हैं कि इस समय हालात अगल हैं। 1973 मे सऊदी अरब ने जब कठोर स्टैंड लिया था तो वह किसी हत्या का आरोपी नहीं था। इस समय सऊदी क्राउन प्रिंस बिन सलमान पर जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या का आरोप है। उस समय सऊदी अरब ने अपने किसी अधिकारी नहीं बल्कि फ़िलिस्तीन के समर्थन में अपना रुख़ कड़ा कर  लिया था। इस समय तो सऊदी अरब फ़िलिस्तीन के बजाए इस्राईल से पेंग बढ़ा रहा है।

एक और बात यह भी है कि यदि सऊदी अरब ने इस समय तेल की सप्लाई रोकी तो विश्व अर्थ व्यवस्थ को नुक़सान तो पहुंचेगा लेकिन यह ढहने वाली नहीं है क्योंकि दूसरे विकल्प खोजे जा चुके हैं जिनमें शेल आयल का एक बड़ा विकल्प है।

एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी है कि इस समय सऊदी नेतृत्व पूरी तरह अमरीका पर निर्भर है तेल की सप्लाई रोकना तो दूर वह अमरीका से किए गए रक्षा सौदे निरस्त या कम करने की स्थिति में भी नहीं है।

सऊदी अरब इतना क्यों बदल गया है यह सवाल सऊदी अरब के अधिकारियों को अपने आप से पूछना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उनसे कहां ग़लती हुई है कि साहसी निर्णय लेने की उनकी क्षमता समाप्त हो चुकी है।

नोटः फ़िलिस्तीनी पत्रकार ख़ालिद जयूसी के लेख पर आधारित

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