• मध्यपूर्व में हिल गया अमरीकी रणनीति का आधार, यमन में संघर्ष विराम और क़तर के शासक को न्योता क्या सऊदी विदेश नीति में होगा बड़ा बदलाव?

सऊदी अरब के वरिष्ठ पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की निर्मम हत्या और फिर उनके शव को एसिड द्वारा गला देने की घटना के बाद की परिस्थितियों का सबसे अधिक लाभ तुर्की और ईरान को मिला जबकि सबसे बड़ा नुक़सान सऊदी अरब और अमरीकी सरकार को हुआ जिसने मुहम्मद बिन सलमान को केन्द्र में रखकर अपनी मध्यपूर्व रणनीति तैयार की थी क्योंकि इस जघन्य अपराध में शक की सुई बिन सलमान पर जाकर रुक गई है। 

अमरीका ने जो रणनीति बनाई थी उसका मुख्य निशाना ईरान था, ईरान ने इस पूरे प्रकरण में ख़ामोश रहने की नीति अपनाई यहां तक कि कुछ सऊदी लेखकों और टीकाकारों को भी ईरान की नीति बहुत अच्छी लगी।

जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या का प्रकरण एसे समय सामने आया जब ट्रम्प प्रशासन सुन्नी अरब सैनिक एलायंस बनाने की कोशिश कर रहा था जिसमें सऊदी अरब की केन्द्रीय भूमिका होती। इसमें फ़ार्स खाड़ी के छह अरब देशों के अलावा जार्डन और मिस्र भी शामिल होने वाले थे। मगर अब एसा लगता है कि यह योजना शुरू ही में दम तोड़ गई है।

सऊदी अरब इस समय क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर इतनी कमज़ोर स्थिति में पहुंच गया है कि इससे पहले कभी भी वह एसी स्थिति में नहीं रहा। सऊदी अरब ने यमन युद्ध रोकने की मांग तत्काल मान ली और यमन में राजनैतिक प्रक्रिया शुरू करवाने पर सहमति जता दी हालांकि ख़ाशुक़जी की हत्या से पहले वाली स्थिति में सऊदी अरब कभी भी इस तरह इस मांग को स्वीकार न करता।

यमन युद्ध रोकने के अलावा इस बात की भी संभावना है कि अमरीका के दबाव में सऊदी अरब मजबूर होकर क़तर की नाकाबंदी भी समाप्त कर दे जिसे सऊदी अरब अपने लिए ईरान से भी बड़ा दुशमन मानता है। हमें तो एसा लगता है कि ओमान ने संभावित रूप से अमरीका के कहने प फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद की बैठक की मेज़बानी से पांव पीछे खींचे और इस मेज़बानी का अवसर सऊदी अरब को दे दिया। दूसरी ओर क़तर के शासक शैख़ तमीम बिन हमद आले सानी को सऊदी अरब की ओर से न्योता मिल गया है और उन्होंने कहा है कि वह शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए जाएंगे। सूत्रों से यह जानकारी भी मिल रही है कि कुवैत की मध्यस्थता में फिर से नई जान पड़ गई है।

ख़ाशुक़जी हत्या कांड, यमन युद्ध, क़तर की नाकाबंदी और ईरान के बढ़ते प्रभाव पर अंकुश जैसे समस्त मामलों में सऊदी अरब बुरी तरह नाकाम होकर बहुत कमज़ोर हो गया है। इस स्थिति में वह सुन्नी अरब नैटो का नेतृत्व करने के लायक़ नहीं है और न ही इलाक़े में ईरान की बढ़ती पैठ को रोक पाना उसके बस की बात है।

दूसरी ओर ईरानियों ने अमरीका और इस्राईल की ओर से किए जाने वाले राजनैतिक और आर्थिक हमलों का बड़ी सूझबूझ के साथ सामना किया है। अब यह नज़र आ रहा है कि चीन, रूस, भारत, तुर्की, उत्तरी कोरिया और यूरोप इस समय ईरान के क़रीब हैं। ईरान ने अमरीकी प्रतिबंधों का मुक़ाबला करने के लिए देश के भीतर सभी धड़ों को एकजुट करने में भी सफलता हासिल कर ली।

चीन, भारत, तुर्की, जापान और यूरोप के बाज़ारों में ईरान का तेल पूरी आज़ादी के साथ पहुंच रहा है। ओपेक तेल की क़ीमत बढ़ाने के लिए उत्पादन में 5 लाख बैरल की कमी करने की योजना बना रहा है। यह अमरीका की योजना के बिल्कुल विपरीत है जो इस कोशिश में था कि तेल की क़ीमतें नीचे रहें ताकि अमरीका तथा अन्य पश्चिमी देशों की अर्थ व्यवस्थाओं के विकास में कोई रुकावट न आए।

एक और संकट भी सऊदी अरब के सामने है लेकिन इसके बारे में चर्चा नहीं हो रही है यह संकट यमन युद्ध में रियाज़ सरकार के स्ट्रैटेजिक सहयोगी इमारात के साथ है। विश्वस्त अरब सूत्रों ने हमें बताया है कि हालिया हफ़्तों में यह संकट बहुत बढ़ गया है। संयुक्त अरब इमारात को यह महसूस होने लगा है कि वह दो संकटों में बुरी तरह फंस गया है जिनसे उसकी अखंडता के लिए समस्या उत्पन्न हो गई है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसकी बदनामी हो रही है साथ ही उसे भारी आर्थिक नुक़सान उठाना पड़ रहा है। इन दो संकटों में एक यमन युद्ध है और दूसरा ख़ाशुक़जी हत्या कांड। ख़ाशुक़जी हत्या कांड में तो तुर्की ने इमारात के ख़िलाफ़ भी महत्वपूर्ण जानकारियां लीक करना शुरू कर दिया है। तुर्की ने यह जानकारी लीक की है कि अबू धाबी के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन ज़ाएद के सलाहकार मुहम्मद दहलान भी इस प्रकरण में लिप्त हैं जिन्होंने इस्तांबूल में सऊदी वाणिज्य दूतावास में साक्ष्यों को मिटाने के लिए अपने विशेषज्ञों को बैरूत के रास्ते तुर्की भेजा। यह जानकारियां तुर्की के यनी शफ़क़ अख़बार में छपी हैं जो तुर्क राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोग़ान के बहुत क़रीब माना जाता है। तुर्क सूत्रों ने अब तक जितनी भी जानकारियां इस मामले में लीक की हैं वह सब की सब सही साबित हुई हैं।

अमरीकी अख़बार न्यूयार्क टाइम्ज़ ने जो इतिहास में शायद पहली बार सऊदी अरब के ख़िलाफ़ अपने प्रतिद्वंद्वी वाशिंग्टन पोस्ट के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है अपने एक लेख में लिखा है कि सऊदी अरब अब अरब राष्ट्रों की नज़र में बेहद ख़तरनाक देश बन गया है। कुछ अरब देशों का मीडिया तो अब यहां तक मांग करने लगा है कि मुसलमान हज का बहिष्कार कर दें।

हमें यक़ीन है कि जमाल ख़ाशुक़जी हत्या कांड और उसके राजनैतिक और प्रचारिक परिणामों की ख़बरें मीडिया की सुर्खियों से दूर होने वाली नहीं हैं। हमें यह भी विश्वास है कि सऊदी अरब में सोशल मीडिया पर सरकारी ट्रोल की ओर से तुर्की के ख़िलाफ़ जो भीषण हमला किया जा रहा है और पर्यटकों को तुर्की जाने से रोका जा रहा है वह एक नाकाम कोशिश है। उचित ही होगा कि सऊदी अरब अपने समस्त नीतियों पर उच्च स्तर पर पुनरविचार करे जिनके चलते वह इस हालत तक पहुंच गया है। शुरुआत शताब्दी के सबसे भयानक अपराध अर्थात ख़ाशुक़जी की हत्या वाले मामले से करे और यमन युद्ध, डील आफ़ सेंचुरी, लेबनानी प्रधानमंत्री की नज़रबंदी, इस्राईल से ख़ुफ़िया दोस्ती हर मामले में आम अरब जनता के रुजहान और इच्छा पर ध्यान दे। सऊदी अरब में एसे विशेषज्ञों की कमी नहीं है जो पुनरविचार के संदर्भ में सार्थक मदद कर सकते हैं। इन हस्तियों को हाशिए पर डाल देना ही वर्तमान संकट के गंभीर रूप धारण कर लेने की मुख्य वजह है।

 

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के प्रख्यात लेखक व टीकाकार

Nov २०, २०१८ १६:३१ Asia/Kolkata
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