Feb २१, २०१९ १५:४७ Asia/Kolkata
  • पैदा होने से पहले ही मौत के क़रीब पहुंच गया

हमें अमरीकी अख़बार वाल स्ट्रीट जनरल की इस रिपोर्ट से पहले भी असली स्थिति मालूम थी कि सुन्नी अरब देशों सऊदी अरब, इमारात, क़तर, बहरैन, ओमान, कुवैत, जार्डन और मिस्र को शामिल करके "अरब नैटो" की स्थापना करने का अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प का एजेंडा आईसीयू में पहुंच चुका है क्योंकि पिछले सप्ताह वार्सा में होने वाले सम्मेलन में इस एजेंडे को ज़ोरदार झटका लगा जहां अरब इस्राईल दोस्ती को मज़बूत करने की कोशिश की जा रही थी ताकि ज़ायोनी प्रधानमंत्री नेतनयाहू इस एलायंस का नेतृत्व संभालें।

वार्सा सम्मेलन के बाद हालत यह है कि इसमें भाग लेने वाले अरब विदेश मंत्री अपने अपने देशों में भारी जनाक्रोश का सामना कर रहे हैं  और इन देशों की ताक़तवर मीडिया भी इस हक़ीक़त पर पर्दा डालने में पूरी तरह नाकाम है। अरब जनता में अरब इस्राईल दोस्ती को लेकर भारी ग़ुस्सा है।

इस संदर्भ में कई तर्क पेश किए जा सकते हैं,

  1. ओमान के विदेश मंत्री युसुफ़ बिन अलवी इस्राईल से संबंध बढ़ाने के अपने देश के स्टैंड से पीछे हट गए। उन्होंने मास्को यात्रा में कहा कि नेतनयाहू से मुलाक़ात का यह मतलब नहीं है कि इस्राईल से ओमान के संबंध हो गए हैं। पहले स्वतंत्र फ़िलिस्तीन देश की स्थापना होगी उसके बाद ही इस्राईल से किसी प्रकार के संबंध के बारे में सोचा जा सकता है। मगर बिन अलवी के बयान से हमें संतुष्टि नहीं है। उन्हें चाहिए कि इस्राईली अधिकारियों से हर प्रकार की ज़ाहिरी और ख़ुफ़िया मुलाक़ातों का सिलसिला बंद करें। कम से कम इस रोडमैप का ही पालन करें जो अरबों की ओर से पेश किया गया है। इसी तरह उन्हें चाहिए कि इस्राईल को पूरे इस्लामी जगत का सबसे बड़ा दुशमन मानें।
  2. यमन के तथाकथित विदेश मंत्री ख़ालिद अलयमानी जिन्होंने वार्सा सम्मेलन में नेतनयाहू के साथ बैठकर उनसे ख़ूब हंसी मज़ाक़ किया अब अपने देश के हर क्षेत्र में घोर निंदा का सामना कर रहे हैं और उन्होंने सारा दोष प्रोटोकोल अधिकारियों पर डाल दिया कि उन्होंने उनकी सीट इस्राईली प्रधानमंत्री के पास रखवाई थी। मगर उनकी इस सफ़ाई से यमन की जनता और अरब जगत के लोग संतुष्ट नहीं हैं।
  3. सम्मेलन में भाग लेने वाले सभी अरब विदेश मंत्रियों विशेष रूप से इमारात, सऊदी अरब और बहरैन के विदेश मंत्रियों की हालत काफ़ी ख़राब थी वह मीडिया से मुंह छिपा रहे थे। जब सम्मेलन में शामिल नेताओं ने ग्रुप फ़ोटो खिंचवाई तो कुछ विदेश मंत्री वहां जाने की हिम्मत नहीं कर पाए। अगर उन्हें अपने किए पर शर्मिंदगी नहीं थी तो पत्रकारों से भाग क्यों रहे थे?
  4. यमन के शहरों में लाखों लोगों ने सड़कों पर निकल कर वार्सा सम्मेलन के आयोजन तथा इस सम्मेलन में ज़ायोनी प्रधानमंत्री के पास ख़ालिद अलयमानी के बैठने और अपना माइक्रोफ़ोन नेतनयाहू को देने की अलयमानी की हरकत के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किए। सच्ची बात तो यह है कि सड़कों पर उतरने वाले यही यमनी ही असली अरब हैं।
  5. मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फ़त्ताह अस्सीसी ने म्युनिख़ सुरक्षा सम्मेलन में जो भाषण दिया उसमें उन्होंने कहा कि मध्यपूर्व में शांति व स्थिरता की स्थापना की शर्त यह है कि फ़िलिस्तीन का विवाद हल कर लिया जाए। यह प्रतीत हो रहा था कि जैसे अस्सीसी अपने विदेश मंत्री को वार्सा सम्मेलन में भेजने पर माफ़ी मांग रहे हों। उन्होंने इशारों में यह भी कह दिया कि वार्सा सम्मेलन में सऊदी अरब, इमारात और बहरैन के विदेश मंत्रियों ने इलाक़े के लिए ईरान को सबसे बड़ा ख़तरा कहा लेकिन मिस्र उनके इस विचार से सहमत नहीं है।

इस्राईल से दोस्ती के लिए कुछ अरब देशों ने जो रूचि दिखाई है उसका पूरे अरब जगत में भारी विरोध किया गया, दूसरी ओर इलाक़े में ईरान के नेतृत्व वाले इस्लामी प्रतिरोध मोर्चे का लगातार मज़बूत होना यह सारी चीज़ें वह हैं जिन्होंने समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है और इन्हीं चीज़ों ने अरब नेताओं को अपने रवैए पर पुनरविचार करने पर मजबूर कर दिया।

यह कितनी घटिया बात है कि ब्रिटेन को छोड़कर यूरोपीय संघ के सभी देशों के विदेश मंत्रियों ने इसी तरह यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रभारी फ़ेडरीका मोग्रीनी ने वार्सा सम्मेलन से ख़ुद को दूर रखा, चीन, रूस, तुर्की और भारत ने भी अपने विदेश मंत्री इस सम्मेलन में नहीं भेजे मगर अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो और ट्रम्प के दामाद जेर्ड कुशनर की एक आवाज़ पर 12 अबर देशों के विदेश मंत्री वार्सा पहुंच गए।

इससे भी बुरी बात यह है कि मलेशिया के राष्ट्रपति महातीर मुहम्मद ने अपने देश की धरती पर होने वाली खेल प्रतियोगितया में इस्राईली खिलाड़ियों को आने से रोक दिया मगर फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों की राजधानियों में इस्राईली ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद की देखरेख में इस्राईली खिलाड़ियों और अधिकारियों की आवाजाही का सिलसिला जारी है!

अरब जगत में जनता अब इस मामले में हरकत में आ चुकी है और उसने इस्राईल से दोस्ती के लिए छटपटा रही अरब सरकारों पर अंकुश लगाना शुरू कर दिया है साथ ही जनता ने अरब सरकारों के ताक़तवर मीडिया को भी नाकाम कर दिया है जो अपने नेताओं की ग़लतियों पर पर्दा डालने की कोशिश में था।

जिसने भी जनता की भावनाओं को अनदेखी की और इस्राईल को अपना मित्र समझा वह एक दिन ज़रूर पछताएगा बल्कि उसे निश्चित रूप से भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

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