Sep ११, २०१९ ०७:४२ Asia/Kolkata
  • बोल्टन को बर्ख़ास्त करवाने में तालेबान मुल्लाओं की क्या रही भूमिका? उनके जाने पर मध्यपूर्व में सबसे अधिक दुखी कौन होगा? क्या अब ट्रम्प और रूहानी की मुलाक़ात की तैयारी शुरू होने जा रही है? अरब पत्रकार अब्दुल बारी अतवान का जायज़ा

जान बोल्टन तेहरान में इस्लामी गणतंत्र शासन को बदलने का अपना ख़्वाब पूरा किए बग़ैर ही अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पद छोड़कर चले गए हैं।

उन्होंने पेरिस में एक साल पहले पेरिस में कहा था कि अगले साल का क्रिसमस वह तेहरान में मनाएंगे। बोल्टन वेनेज़ोएला में निकोलस मादोरो को हटाने और उनके स्थान पर ख़्वान ग्वाइडो को राष्ट्रपति नियुक्त करवाने का सपना भी पूरा नहीं कर पाए, बोल्टन उत्तरी कोरिया की  राजधानी प्यूंगयांग पर बमबारी भी नहीं करवा पाए। इस तरह के अधूरे सपनों की सूचि बहुत लंबी है।

बोल्टन के पद से हटने की ख़बर मिलते ही कई नेताओं पर शोक छा जाएगा। सबसे अधिक दुखी तो बिनयामिन नेतनयाहू होंगे। इसी तरह फ़ार्स खाड़ी के कुछ अरब शासकों विशेष रूप से सऊदी अरब और इमारात के नेताओं पर भी दुख का पहाड़ टूट पड़ेगा जो इस आस में बैठे थे बोल्टन अपने पद का लाभ उठाते हुए ईरान पर बड़ा हमला करवाएंगे और ईरान की शासन व्यवस्था बदल देंगे और इस प्रकार की सरकार बनवाएंगे जो इलाक़े में अमरीका की योजनाओं पर अमल करे और तेहरान में इस्राईल का दूतावास खोले।

जान बोल्टन अरबों और मुसलमानों के बारे में अपने कठोर विचारों के कारण एनएसए पद पर आए थे और अफ़ग़ानिस्तान, इराक़ तथा सीरिया से अमरीकी सैनिकों को वापस बुलाने के कट्टर विरोधी थे। वह इन तीनों देशों को तबाह कर देने के लिए ट्रम्प को उकसाते रहते थे यहां तक कि उन्हें परमाणु हमला करने में भी किसी प्रकार की हिचकिचाहट नहीं थी।

सबसे रोचक बात तो ट्रम्प का यह दावा है कि कई मुद्दों पर बोल्टन से गहरे मतभेद के कारण उनको हटाया गया है। यह दावा हास्यास्पद है क्योंकि ट्रम्प ने बोल्टन को एनएसए के महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त ही इसलिए किया था कि वह अधिकतर मामलों में बेहट कठोर और कट्टरवादी विचार रखते थे, विशेष रूप से ईरान, उत्तरी कोरिया और वेनेज़ोएला के बारे में तो वह जलता हुआ शोला थे। ट्रम्प के इस विरोधाभासी बयान के बारे में यही कहा जा सकता है कि उन्होंने बोल्टन को इन देशों को डराने के लिए हथकंडे के रूप में प्रयोग किया लेकिन ट्रम्प की यह चाल कारगर नहीं रही। क्योंकि ईरान, उत्तरी कोरिया या वेनेज़ोएला किसी ने भी डर कर हथियार नहीं डाले और बोल्टन को बड़े अपमानजनक रूप में उठाकर कूड़ेदान में फेंक दिया गया।

ट्रम्प युद्ध की धमकियां तो देते हैं लेकिन वह बुज़दिल आदमी हैं युद्ध शुरू करने की उनमें हिम्मत नहीं है। ट्रम्प की सोच यह है कि वह अपने विरोधियों से बातचीत के माध्यम से वह सब कुछ हासिल कर लेंगे जो उन्हें हासिल करना है क्योंकि उनके निकट महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों और संपत्ति के सौदों के बीच कोई अंतर नहीं है। यही कारण है कि उन्होंने उत्तरी कोरिया के शासक से मुलाक़ातें कीं और दोनों मुलाक़ातें नाकाम रहीं जबकि ईरान के राष्ट्रपति से मुलाक़ात की उनकी तमन्ना अब तक दिल में ही मचल रही है, वैसे हो सकता है कि ट्रम्प संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा अधिवेशन के अवसर पर ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी से मुलाक़ात की तैयारी कर रहे हैं और इसके लिए उन्होंने बोल्टन को बलि का बकरा बना दिया हो।

तालेबान मुल्लाओं ने जिन्होंने आठ महीने ट्रम्प प्रशासन और उनके दूत ज़लमै ख़लीलज़ाद से वार्ता की और कोई भी रिआयत दिए बिना बहुत अधिक रिआयतें हासिल करने में कामयाब रहे, शायद बोल्टन को हटवाने में प्रभावी भूमिका निभाई। बोल्टन तालेबान से किसी भी प्रकार की वार्ता और अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सैनिकों को वापस बुलाने के विरोधी थे। बोल्टन को यह बात कदापि पसंद नहीं थी कि कैंम्प डेविड में डोनल्ड ट्रम्प की मुलाक़ात तालेबान नेताओं से हो।

बोल्टन के एनएसए पद से हटने के बाद ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध की संभावना बहुत दूर चली गई है। हमें यह भी लगता है कि फ़ार्स खाड़ी की अरब सरकारों में बहुत से लोगों पर शोक टूट पड़ा होगा और वह सांत्वनाएं स्वीकार करने के लिए तहख़ानों में जा बैठे होंगे। बहरहाल हम तो उन्हें सांत्वना नहीं देंगे, वजह जगज़ाहिर है।

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