Sep ११, २०१९ १९:५७ Asia/Kolkata
  • श्रीमान ट्रम्प ईरानी हुसैनी हैं और आपको आजका यज़ीद मानते हैं꞉ अमेरिकी पत्रिका नेशनल इंटरेस्ट

अमेरिका की एक प्रसिद्ध पत्रिका ने ईरानी राष्ट्र के भीतर मौजूद हुसैनी पाठ को नज़र में रखते हुए व्हाइट हाउस में बैठे अमेरिका अधिकारियों को होशियार किया है कि, ईरान की जनता ट्रम्प को नए ज़माने का यज़ीद मानती है। इसलिए ट्रम्प को चाहिए कि वह इराक़ के पूर्व तानाशाह सद्दाम, कि जिसने 40 वर्ष पहले ईरान पर हमला किया था उससे सबक़ लें।

अमेरिकी पत्रिका नेशनल इंटरेस्ट में लिखे एक लेख में आया है कि, “हुसैन, हुसैन की आवाज़ बहुत जल्द सब जगह सुनाई देगी, हमे युद्ध से न डराव, हम ज़िंदा हैं, हम तलवारों को अपने हाथों में लिए हुए हैं ताकि तुमको मुंहतोड़ जवाब दे सकें, ईश्वर के अलावा किसी और के आगे झुकना हमारी डिक्शनरी में नहीं है।” यह वह शब्द हैं जो एक शिया शायर पूरे जोश के साथ सितंबर 2018 में ईरान में पढ़ रहा था। पत्रिका नेशनल इंटरेस्ट में लिखे लेख में मोहर्रम और उसमें आयोजित होने वाले कार्यक्रमों एवं शोक मनाने के तरीक़े की ओर भी इशारा किया गया है। लेख में आया है कि मोहर्रम जहां पूरी दुनिया के शिया मुसलमानों इस महीने इमाम हुसैन का शोक मनाते हैं वहीं वह कर्बला की घटना से बहुत कुछ सीखते भी हैं और वह सीख उन्हें अत्याचार और अत्याचारियों के विरुद्ध डट जाने का साहस और ताक़त देती है।

अमेरिकी पत्रिका में लिखे लेख के मुताबिक़, एक ओर जहां ईरान के सामने आर्थिक संकट के साथ-साथ संभावित युद्ध का ख़तरा भी मंडरा रहा है, लेकिन इन सबके बावजूद ईरान की सरकार और वहां की जनता के चेहरे पर किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं दिखाई दे रही है बल्कि वह हमेशा की तरह इस बार भी मोहर्रम में फिर से वही शब्दों को दोहरा रहे हैं जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है। अमेरिकी पत्रिका के अनुसार, अगर अमेरिकी राजनेता चाहते हैं कि वह ईरान के बारे में सही नीति अपना सकें तो सबसे पहले उन्हें ईरानी राष्ट्र के उस हुसैनी जज़्बे और कर्बला वालों से लिए गए पाठ के बारे में जानना होगा जो हर ईरानी के ख़ून में बसा हुआ है।

अमेरिकी पत्रिका के मुताबिक़, दुनिया भर के शिया कर्बला में इमाम हुसैन (अ) और उनके 72 साथियों की शहादत से दो मुख्य बातें जो सीखते हैं वह यह है, पहली बात, इमाम हुसैन शहादत एवं अत्याचारियों के ख़िलाफ़ डट जाने वाले प्रतिरोध आंदोलनों के लिए एक पूर्ण आदर्श हैं। दूसरी बात, कूफ़े के लोगों द्वारा कर्बला की जंग में इमाम हुसैन का साथ न देना उनके ही लिए शर्म की बात साबित हुई, जिसके बाद उन लोगों ने वादा किया कि अब वे ऐसा कभी नहीं करेंगे। वर्ष 1979 में ईरान में इमाम ख़ुमैनी के नेतृतव में आई इस्लामी क्रांति के बाद, ईरान इस समय हुसैनी ध्वजवाहक है और दुनिया भर के अत्याचारग्रस्त लोगों के लिए उम्मीद की किरण और ईरान ही इस्लामी प्रतिरोध आंदोलनों को एकजुट करने का मुख्य कारण भी बना है।

इस बीच अमेरिका की ट्रम्प सरकार और वॉशिंग्टन में मौजूद ईरान दुश्मन लॉबी लगातार इस प्रयास में रहती है कि वह अमेरिकी जनता एवं दुनिया को यह दिखा सके कि ईरान के साथ युद्ध बहुत आसान और जल्द समाप्त हो जाने वाला है। अमेरिका के एक दिन पहले ही पूर्व हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने तो कहा था कि वह जल्द तेहरान में जश्न मनाएंगे, वैसे वह तेहरान में जश्न तो मना नहीं पाए लेकिन अब ट्रम्प द्वारा अपमानजनक तरीक़े से अपने हटाए जाने का मातम ज़रूर मना रहे होंगे। इसी तरह रिपब्लिकन के कट्टर ईरान विरोधी सीनेटर टॉम काटेन ने तो यहां तक कहा था कि अमेरिका दो हमलों में तेहरान से युद्ध में विजयी हो जाएगा और इन्हीं लोगों की बातों का ट्रम्प पर इतना प्रभाव पड़ा था कि स्वयं ट्रम्प ने कुछ दिनों पहले कहा था कि ईरान से युद्ध बहुत कम समय को होगा।

अमेरिकी पत्रिका ने अपने लेख के अंत में ट्रम्प से कहा है कि वह सुनी सुनाई बातों में न आएं और अपना ख़्याल रखें और सद्दाम जैसे अंजाम से बचें। अमेरिकी पत्रिका ने लिखा है कि कर्बला का आंदोलन अन्याय के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की विरासत है और कर्बला वाले कभी किसी के सामने नहीं झुकते हैं। कर्बला वालों की नज़र में वही विजेता होता है जो अत्याचार और अत्याचारियों के मुक़ाबले में डट जाता है। इमाम हुसैन की शहादत ने इन्हें जीवित क़ौम बना दिया है इसलिए ईरान के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की कार्यवाही से पहले कर्बला वालों के इतिहास का जानना और उससे पाठ लेना ज़रूरी है। (RZ)

 

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