युवावस्था जोश और उत्साह का काल है।

युवावस्था जोश और उत्साह का काल है। यह वह काल है जब युवा अपनी इच्छाओं व मांगों की पूर्ति के लिए आतुर रहता है और उसे धैर्य नहीं होता है और जीवन को वह नये स्वरूप में देखना चाहता है ताकि ताज़गी और तरुणायी का अनुभव कर सके। वह जीवन में सफल होना चाहता है। समाज में प्रचलित शैली उसे अधिक पसंद नहीं होती है वह पुरानी आदतों व शैलियों से विरक्त होता है। इस स्थिति के सकारात्मक परिणाम हो सकते हैं और रचनात्मकता व नूतनता अस्तित्व में आ सकती है। साथ ही उसके विनाशकारी परिणाम भी हो सकते हैं और युवा ऐसे जाल व षडयंत्रों में फंस सकते हैं जो वर्तमान समय में कम नहीं हैं।

जब हम इस्लामी इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो हमें बहुत से ऐसे युवा दिखाई पड़ते हैं जो स्वयं जागरुक हो गये और उन्होंने दूसरे व्यक्तियों एवं अपने राष्ट्रों को भी अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए प्रयास किये। हम ऐसे स्वाभिमानी युवाओं को देखते हैं जिन्होंने आज़ादी तक पहुंचने और ईश्वर की बंदगी की दिशा में क़दम उठाये हैं। हम जोश से भरे युवाओं को देखते हैं जिन्होंने सफलता के लिए रात- दिन प्रयास किये हैं।

   

                         

इतिहास इस बात का सूचक है कि सृष्टि व प्रवृत्ति के पवित्र होने, स्वतंत्राप्रेमी, ग़लत बात को स्वीकार न करने, साहस और सांसारिक चीज़ों से दूषित न होने के कारण युवा वे पहले गुट थे जो पैग़म्बरों और मानवता का भला चाहने वाले लोगों व हस्तियों से जा मिले। बहुत से युवाओं ने अत्याचारग्रस्त लोगों की रक्षा और अत्याचारियों से मुकाबले के लिए प्रतिरोध किया। पैग़म्बरे इस्लाम इस विशेषता के दृष्टिगत युवाओं पर विशेष ध्यान देते थे इस प्रकार से कि पैग़म्बरे इस्लाम के अधिकांश अनुयाई और उनसे निष्ठा रखने वाले युवा ही थे जो अपने पूरे अस्तित्व के साथ इस्लाम पर विश्वास रखते थे और उन्होंने अपने जीवन की अंतिम सांस तक इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम की रक्षा के लिए संघर्ष किया और उन्हें विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित किया गया परंतु वे इस्लाम पर आस्था से लेशमात्र भी पीछे नहीं हटे।

इस समय के युवाओं को जहां विभिन्न प्रकार की समस्याओं व संकटों का सामना है वहीं उनमें महान ईश्वर की उपासना, जानकारी, निर्भिकता और वास्तविकता को जानने की भावना में भी वृद्धि हुई है। साथ ही समस्त क्षेत्रों में युवा पीढ़ी की आवश्यकतायें विस्तृत हो गयी हैं और युवाओं की भागीदारी एवं उपस्थिति के बिना कोई महत्वपूर्ण कार्य अंजाम नहीं दिया जा सकता। जोश व उत्साह से भरे युवाओं ने आत्म निर्भरता की भावना और फौलादी इरादों से स्वतंत्रता एवं आज़ादी का नारा लगाया और दर्शा दिया कि हर देश में युवा गति व सक्रियता का केन्द्र होते हैं और युवाकाल ईश्वरीय सृष्टि की एक चमक है।

 

 

ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई हर देश का स्थान ऊपर उठाने में युवाओं की भूमिका को इस प्रकार बयान करते हैं” जब एक देश में युवा जागरुक हो गया तो उस देश में सार्वजनिक जागरुकता की आशा में वृद्धि हो जाती है। आज हमारे युवा पूरे इस्लामी जगत में जागरुक हो गये हैं। युवाओं के सामने बहुत सारे षडयंत्र रच दिये गये हैं परंतु उच्च साहस रखने वाले मुसलमान और स्वाभिमानी युवाओं ने स्वयं को इन षडयंत्रों से मुक्ति दिला ली है। आप देख रहे हैं कि ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, यमन और बहरैन में क्या हुआ। शेष इस्लामी देशों में क्या हुआ। यह सब शुभ सूचना है।“

जो यह कहा जाता है कि चाहना ही प्राप्ति है तो युवा इसका स्पष्ट उदाहरण है और वह अपने आस- पास के वातावरण और विश्व में बहुत गहरा प्रभाव डाल सकता है। वह अपनी शक्ति और रचनात्मकता से कठिन से कठिन माग को सरल बनाकर तय कर सकता है और वह न होने वाले कार्य को भी अंजाम दे सकता है यहां तक कि लोगों को उस पर विश्वास नहीं हो सकता।

जो युवा सफलता व कामयाबी चाहता है उसे चाहिये कि वह केवल अपने अंदर मौजूद क्षमता व शक्ति पर ध्यान दे। इस्लाम धर्म युवाओं को इस बात की शिक्षा देता है कि वे ऊंचाई पर पहुंचने और विकास व उन्नति करने के लिए अपने जीवन के समस्त क्षणों में महान ईश्वर के आदेशों का अनुसरण करें और उससे सहायता मांगे क्योंकि उससे बेहतर कोई सहायक नहीं है। अतः मुसलमान युवा की विशेषता उसकी वैचारिक स्वतंत्रता है। वह सदैव चिंतन- मनन करता है और तार्किक प्रमाण के बिना न कोई बात स्वीकार करता है और न ही उसमें किसी धर्म व विचारधारा की ओर रुझान पैदा होता है क्योंकि इस्लाम धर्म आया है ताकि स्वतंत्र ढंग से इंसान के सोचने के मार्ग की रुकावटों को समाप्त कर दे और उसकी सहायत करे ताकि वह अपने अस्तित्व की गहराइयों से बौद्धिक व तार्किक खज़ानों को बाहर निकाल सके।

 

 

दूसरी ओर मुसलमान और क्रांतिकारी युवा गति व सक्रियता का मार्ग तय करता है और वह इस मार्ग में रूढ़िवाद का शिकार नहीं होता है। अतः अगर आवश्यक होता है तो वह नास्तिकों और अनेकेश्वरवादियों से भी शिक्षा ग्रहण करता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” ईश्वर उस इंसान पर दया करे जो किसी व्यक्ति से तत्वदर्शी बात सुने तो उसे अच्छी तरह सीख ले और जब उसका मार्गदर्शन किया जाये तो उसे स्वीकार करे।“

महान ईश्वर के पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम एक आदर्श युवा थे। उनका प्रयास था कि लोगों को निर्जीव वस्तुओं व मूर्तियों की उपासना करने से मुक्ति दिलायें। उन्होंने वास्तविकता को समझने के लिए अपनी बुद्धि का प्रयोग किया और जब उन्होंने आज़ादी एवं उपासना की वास्तविकता समझ ली तो उन्होंने सबको महान ईश्वर की उपासना के लिए आमंत्रित किया और मूर्तियों की अक्षमता के बारे में लोगों से बात की। पवित्र क़ुरआन सूरे अंबिया की 60वीं आयत में कहता है” कुछ लोग बोले, हमने एक नवयुवक को , जिसे इब्राहीम कहते हैं, मूर्तियों के ख़िलाफ़ कुछ कहते सुना है।“

 

 

पवित्र क़ुरआन हज़रत इब्राहीम को एक होशियार और समझदार युवा के रूप में पेश करता है। वह ऐसे शूरवीर युवा थे जो समस्त मूर्तियों को तोड़ देते हैं और सबसे बड़ी मूर्ति को छोड़ देते हैं ताकि लोग उससे पूछें कि इन मूर्तियों को किसने तोड़ा है? जबकि वे इस बात को भलीभांति जानते थे कि मूर्ति बोल ही नहीं सकती है वे चाहते थे कि लोग मूर्तिपूजा के अपने क्रिया- कलाप के बारे में चिंतन- मनन करें और अज्ञानता को समझ जायें।

हज़रत इब्राहीम के कार्यों को देखने के बाद हमें यह ज्ञात हो जाता है कि हम ऐसे युवा को देख रहे हैं जो अतिवादी भावनाओं से दूर है और अकेश्वरवादियों से तर्कसंगत ढंग से बहस करता है और अंत में विजयी होता है।

पवित्र क़ुरआन, जागरुक, प्रतिरोध, धैर्य और संयम से काम लेने वाले दूसरे युवाओं को उदाहरण के रूप पेश करता है। पवित्र क़ुरआन के सूरे कहफ़ में हम पढ़ते हैं कि कुछ युवा समय के अत्याचारी शासक के अत्याचारों से थक कर गुफ़ा में शरण लेते हैं। महान ईश्वर कहता है” वे ऐसे युवा थे जो अपने पालनहार पर ईमान रखते थे और हमने उनके ईमान व मार्गदर्शन में वृद्धि कर दी।“

 

 

इन युवाओं की विशेषता मामलों का विश्लेषण व समीक्षा करने की शक्ति थी। जब उन्होंने अपने समय की घटनाओं की समीक्षा की और समय के शासक के अत्याचार व अनेकेश्वरवाद को समझ लिया तो कहा “यह मेरी क़ौम व जाति के लोग हैं जिन्होंने उससे हटकर पूज्य बना लिये हैं आखिर यह उनके हक़ में कोई स्पष्ट प्रमाण क्यों नहीं पेश करते? भला उससे बढ़कर कौन अत्याचारी होगा जो झूठ गढ़कर ईश्वर पर थोप दे।

गुफ़ा में शरण लेने वाले युवाओं ने महान ईश्वर की असीम शक्ति पर भरोसा करते हुए मांग की थी कि वह उन्हें सफलता प्रदान करे। इसी प्रकार उन्होंने महान ईश्वर से कहा! अपनी कृपा से हमें लाभान्वित कर और हमारे लिए मुक्ति का मार्ग उपलब्ध कर। महान ईश्वर ने भी उनकी दुआ सुन ली और उनके प्रयास को स्वीकार कर लिया और उन सबको मुक्ति प्रदान की। सूरे कहफ़ की 14वीं आयत में आयत में आया है” और हमने उनके दिलों को सुदृढ़ कर दिया जब वे उठे तो कहा हमारा पालनहार तो वही है जो आसमान और ज़मीन का पालनहार है हम उससे हटकर किसी अन्य को पूज्य नहीं पुकारेंगे। यदि हमने ऐसा किया तो हमारी बात हक़ से बहुत हटी होगी।“

 

 

आज क्रांतिकारी और सत्यप्रेमी युवा इस प्रकार के युवाओं का अनुसरण करके बड़े लक्ष्यों व आकांक्षाओं को प्राप्त करने के प्रयास में हैं और वे जानते हैं कि जागरुकता व जानकारी मूल्यवान वास्तविकता है और कार्यक्षेत्र और जेहाद के मैदान में उनकी उपस्थिति की निर्णायक भूमिका है। वर्तमान शताब्दी नये दौर का आरंभ है। ईश्वर और धर्म पर ध्यान, महान ईश्वर से सहायता मांगना, न्याय और स्वतंताप्रेम, मानवीय प्रतिष्ठा की रक्षा, ज़ोरज़बरदस्ती करने वाली शक्तियों के मुक़ाबले में प्रतिरोध इस शताब्दी की मूल विशेषता है। इस समय जारी आंदोलनों व क्रांतियों में युवाओं का आगे- आगे रहना समाजों के भविष्य निर्धारण में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका का सूचक है।

Feb १०, २०१६ १५:४१ Asia/Kolkata
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