सूरे ‘क़यामत’ मक्के में उतरा और इसमें 40 आयते हैं।

जैसा कि इस सूरे के नाम से स्पष्ट है कि इस सूरे की विषयवस्तु मुख्य रूप से प्रलय और हिसाब किताब के दिन के बारे में है। इस सूरे की सिर्फ़ कुछ आयतें पवित्र क़ुरआन की सत्यता और इसे झुठलाने वालों के बारे में हैं।

 

इस सूरे में प्रलय के दिन और जागरुक मन की क़सम खाकर बल दिया गया है कि प्रलय का दिन सत्य है और तुम सब सब उस दिन दोबारा उठाए जाओगे और अपने कर्म का बदला पाओगे। इन दो प्रकार की क़सम के बीच संबंध यह है कि हम अपनी अंतरात्मा के ज़रिए प्रलय के दिन की सच्चाई को समझ सकते हैं।

 जैसा कि हर इंसान का मन जब वह अच्छा काम करता है तो प्रसन्न होता है और उसका असर उसके वजूद पर छाया रहता है किन्तु जब कोई बुरा काम या अपराध करता है तो उसकी अंतरात्मा उसे दंडित करती है। कभी कभी अंतरात्मा की ओर से मिलने वाला दंड इतना सख़्त होता है कि इससे बचने के लिए इंसान ख़ुदकुशी कर लेता है क्योंकि अंतरात्मा उसे चैन से बैठने नहीं देती। सूरे ‘क़यामत’ इंसान सी यह समझाना चाहता है कि जब इंसान के वजूद की छोटी की दुनिया में ख़ुद एक प्रकार की अदालत मौजूद है तो किस तरह यह वैभवशाली विराट जगत बिना अदालत के रह सकता है?

 

जैसा कि ‘क़यामत’ सूरे की आयत नंबर 3 और 4 में ईश्वर कह रहा है, क्या इंसान यह सोचता है कि हम उसकी हड्डियों को कभी इकट्ठा नहीं करेंगे? बेशक हम तो उसकी अंगुलियों के पोर के चिन्ह को भी ठीक करने में सक्षम हैं।

 

इस आयत में पवित्र क़ुरआन मानव जाति को सबसे बड़े उद्देश्य अर्थात परलोक की ओर मार्गदर्शन करते हुए एक बहुत ही सूक्ष्य बिन्दु की ओर संकेत करती है जिसकी सच्चाई को समझने में इंसान को शताब्दियां लग गयीं। इस आयत में ईश्वर कह रहा है कि हम तुम्हारी अंगुलियों के पोर के चिन्ह को भी ठीक करने में सक्षम हैं। आज साइंस को इस सच्चाई का पता लगा कि हर व्यक्ति की अंगुलियों के पोर पर बनी हुयी लाइनें अलग अलग होती हैं। यहां तक कि मां के पेट से जुड़वा पैदा होने वाले बच्चों की अंगुलियों के पोर की लाइनें अलग अलग होती हैं और यही लाइनें पूरी दुनिया में हर व्यक्ति की अद्वितीय पहचान होती हैं। पवित्र क़ुरआन में इंसान की अंगुलियों की पोर पर बनी लाइनों को फिर से बनाने की ओर संकेत का अर्थ यह है कि इंसान यह समझ ले कि सर्वशक्तिमान ईश्वर न सिर्फ़ हर व्यक्ति बल्कि उसकी अद्वितीय पहचान को भी फिर से बना सकता है। वह पहचान जो उसे दूसरों से अलग करती है। यही इशारा बुद्धिमान लोगों को यह समझाने के लिए काफ़ी है कि इस संसार का रचयिता तत्वदर्शी ईश्वर है और मौत के बाद जीवन उसी तरह सच है जिस तरह हर जानदार को मौत आना अटल सच्चाई है।

 

‘क़यामत’ सूरे की आयत नंबर 5 में इंसान की अंतरात्मा को संबोधित किया गया है और प्रलय का इंकार किए जाने के एक कारण की ओर इशारा करते हुए कहती है, इंसान को प्रलय के बारे में संदेह नहीं है बल्कि वह प्रलय का इंकार करके अपने लिए हर प्रकार की इच्छा को पूरा करने, अत्याचार व पाप करने के लिए मार्ग खुला रखना चाहता है ताकि इस प्रकार अपनी अंतरात्मा को झूठी तसल्ली दे और उसे यह समझाए कि ईश्वर के सामने उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती।

 

क़ुरआन की आयत में नफ़्स अर्थात मन के तीन प्रकार बयान किए गए हैं। एक अम्मारा, दूसरे लव्वामा और तीसरे मुतमइन्ना।

अम्मारा मन उस स्थिति को कहते हैं जब इंसान का मन उसे निरंतर बुराई और पाप की ओर बुलाए और खुल्लम खुल्ला पाप करना भी उसे बुरा न लगे बल्कि इसे भी मन अच्छा दिखाए। लव्वामा, मन की वह स्थिति है जब इंसान की अंतरात्म अपेक्षाकृत जागरुक होती है। अर्थात इस स्थिति में मनुष्य पाप करता है किन्तु मन की ओर से धिक्कारे जाने के कारण पाप से पश्चाताप करता है। इसी अवस्था को आम भाषा में नैतिक जागरुकता कहते हैं।

 

तीसरी अवस्था नफ़्से मुतमइन्ना अर्थात संतुष्ट मन कहलाती है। यह उस अवस्था को कहते हैं जब मनुष्य की आत्मा परिपूर्णतः के चरण को तय करके संतोष की स्थिति में पहुंच जाती है। इस अवस्था में बेलगाम इच्छाओं को लगाम लग जाती है और फिर इंसान हमेशा ईश्वर से डरता है और किसी प्रकार का पाप नहीं करता।

 

मनुष्य के मन की दूसरी अवस्था जिसे लव्वामा कहते हैं वह उसके वजूद में मौजूद एक छोटी सी अदालत की तरह है जो प्रलय के दिन से समानता रखती है। अर्थात इस स्थिति में मनुष्य का मन ख़ुद ही गवाह, ख़ुद ही जज और ख़ुद ही आदेश को लागू करता है और यही चीज़ प्रलय के दिन भी होगी। जिस प्रकार अंतर्रात्मा की अदालत में सिफ़ारिश और रिश्वत नहीं चलती या किसी दूसरे को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता उसी प्रकार प्रलय की अदालत में कोई दूसरे व्यक्ति को किसी व्यक्ति की जगह पर सज़ा नहीं दी जाएगी। न ही किसी प्रकार की सिफ़ारिश क़ुबूल होगी, न ही रिश्वत, न ही किसी की तरफ़ से किसी की क़ुरबानी स्वीकार होगी और न ही कोई किसी दूसरे की किसी प्रकार की मदद कर सकेगा।

 

मनुष्य की अंतरात्मा बड़े से बड़े मामले को बहुत ही थोड़े समय में निपटाकर अंतिम आदेश जारी कर देती है। इसी प्रकार प्रलय की अदालत के बारे में पवित्र क़ुरआन रअद नामक सूरे की आयत नंबर 41 में कह रहा है, ईश्वर आदेश देगा, उसका आदेश रद्द नहीं होगा और उसकी ओर से हिसाब किसाब बहुत तेज़ होगा।

 

मनुष्य की अंतरात्मा रूपी अदालत को किसी प्रकार के गवाह की ज़रूरत नहीं होती। बल्कि स्वंय आरोपी इंसान की जानकारी को उसके हित या उसके विरुद्ध स्वीकार करती है। जैसा कि प्रलय की अदालत में मनुष्य के वजूद की छोटी छोटी कोशिकाएं, उसके हाथ पैर, त्वचा उसके कर्म की गवाही देंगे जैसा कि फ़ुस्सेलत सूरे की आयत नंबर 20 में ईश्वर कह रहा है, जब उन्हें नरक की आग की ओर ले जाया जाएगा तो उनके कान, आंख और त्वचा उनके ख़िलाफ़ गवाही देंगी।

 

मनुष्य के वजूद में मौजूद अंतरात्मा रूपी अदालत और प्रलय के दिन की अदालत के बीच आश्चर्यचकित करने वाली समानता, प्रलय के निश्चित व स्वाभाविक होने की ओर एक और निशानी है। क़यामत सूरे की आयत इस सवाल के बारे में  कि प्रलय कब आएगी? उससे पहले संसार में घटने वाली घटनाओं और उसकी व्यवस्था के ठप्प पड़ने का उल्लेख करती है। जैसा कि ‘क़यामत’ सूरे की 7वीं से 9वीं आयतों में ईश्वर कह रहा है, “उस दिन डर के मारे आंखे फटी की फटी रह जाएंगी। चांद ग्रहण लग जाएगा और सूर्य और चंद्रमा इकट्ठा कर दिए जाएंगे।” सूरज और चांद के इकट्ठा होने के बारे में जो उल्लेख है संभवतः उससे यह मतलब है चांद सूरज के गरुत्वाकर्षण के कारण धीरे धीरे उसके निकट हो जाएगा और दोनों में प्रकाश ख़त्म हो जाएगा।जिसके नतीजे में धरती पर अंधेरा छा जाएगा।

 

इस प्रकार एक महा परिवर्तन से जो पहली फूंक का परिणाम होगा, संसार ख़त्म हो जाएगा। उसके बाद दूसरे महा परिवर्तन से जो दूसरी फूंक का परिणाम होगा, मनुष्य दोबारा ज़िन्दा होगा। उस दिन पापी और नास्तिक जो प्रलय के दिन का इंकार करते थे, डर के मारे शरण तलाश करते फिरेंगे और अपने पाप के बोझ के कारण ईश्वरीय प्रकोप से बचने के लिए फ़रार होने का मार्ग ढूंढेंगे। किन्तु उनसे कहा जाएगा, “कोई भागने का स्थान नहीं है। उस दिन अंतिम ठिकाना तुम्हारे पालनहार के पास है। उस दिन इंसान को जो कुछ उसने पहले या बाद में कर्म किया होगा, उसे बताया जाएगा।”

               

‘क़यामत’ सूरे की कुछ आयतों में प्रलय के दिन सदाचारी और पापी दोनों प्रकार के बंदों के चेहरे का उल्लेख किया गया है। पवित्र क़ुरआन कहता है, उस दिन कुछ चेहरे प्रसन्नचित दिखाई देंगे। वे अपने ईश्वर की अनुकंपाओं को देख रहे होंगे और बहुत से चेहरे उदास होंगे। जिस समय वे प्रकोप के चिन्ह को देखेंगे तो उन्हें अपने कर्मपत्र में कोई भलाई दिखाई नहीं देगी बल्कि वह बुराइयों व पापों से भरा नज़र आएगा। उस समय वे बहुत परेशान व दुखी होंगे। वे समझ रहे होंगे कि उन पर मुसीबत पड़ने वाली है। ऐसी मुसीबत जो उनकी कमर तोड़ देगी।

 

‘क़यामत’ सूरे की आयत नंबर 26 में मौत के पीड़ादायक क्षण का चित्रण किया गया है जो परलोक की ओर पहुंचाने वाली एक प्रकार की खिड़की के समान है। क़ुरआन की आयत के अनुसार, मौत के क्षण सदाचारी बंदों के लिए आसान होंगे जबकि पापियों के लिए बहुत ही कष्टदायक होंगे।

 

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं, सदाचारी बंदे के लिए मौत बहुत ही मनमोहक ख़ुशबू की तरह होती है जिसे सूंघते हुए वह सो जाता है और सारी पीड़ाएं उससे ख़त्म हो जाती हैं जबकि नास्तिक के लिए वह ज़हरीले सांप, बिच्छु या उससे भी ज़्यादा ख़तरनाक होती है।

 

जिस समय मौत इंसान के गले तक पहुंचती है उस समय सभी भौतिक पर्दे उसकी नज़र से हट जाते हैं और पापी व्यक्ति अपनी निगाहों के सामने प्रकोप के चिन्ह देखता है और उसे अपने कर्म का अंजाम पता चल जाता है। उस समय वह ईश्वर पर ईमान लाता है किन्तु इस अवस्था में यह ईमान उसे कोई फ़ायदा नहीं पहुंचाएगा। इस स्थिति में मरने वाले के आस-पास मौजूद लोग डरे हुए उसकी मुक्ति के बारे में सोचते हैं और उनसे कहा जाता है, कोई है जो इस रोगी को मौत से बचा ले।

जिस समय रोगी को अपने जीवन की ओर से पूरी तरह निराशा और उसे दुनिया छोड़ कर जाने का यक़ीन हो जाता है और पिंडलियां जान निकलने के कारण एक दूसरे से टकराने लगती हैं उस समय वह अपने ईश्वर की ओर पलटता है और उसकी अदालत में हाज़िर होता है। यही हर इंसान का अंजाम है कि उसे ईश्वर की ओर पलटना है।

 

‘क़यामत’ सूरे की अंतिम आयतों में प्रलय के बारे में दो बहुत ही रोचक तर्क दिए गए हैं। सबसे पहले उसकी उद्देश्यपूर्ण पैदाइश का उल्लेख हे जैसा कि आयत नंबर 36 में ईश्वर कह रहा है, “क्या इंसान को लगता है कि उसे यूंही छोड़ दिया जाएगा।” यह कैसे हो सकता है कि ईश्वर इस विशाल व महान संसार को जो आश्चर्यों से भरी हुयी है, इंसान के लिए पैदा करे और किन्तु उसकी पैदाइश का कोई उद्देश्य न हो? उसके बाद ईश्वर की शक्ति का यूं उल्लेख है, “क्या वह वीर्य का क़तरा न था जो गर्भ में जाता है। उसके बाद वह ख़ून का लोथड़ा बना फिर ईश्वर ने उसे पैदा किया और ठीक ठाक बनाया। उसके बाद उसे दो लिंग पुरुष और महिला के रूप में पैदा किया।”

 

क्या तत्वदर्शी ईश्वर जो गर्भ के अंधेरे में तुच्छ वीर्य के क़तरे से बने नुतफ़े को हर दिन एक नया रूप देता है, उसके शरीर में जान डालता है, उस नुतफ़े से चेहरा बनाता है यहां तक कि एक दिन वह अपनी मां के पेट से पैदा होता है, “क्या इस कार्य में सक्षम नहीं है कि मुर्दों को फिर से जीवित करे।”

Jul १७, २०१६ १५:५८ Asia/Kolkata
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