पहली सितम्बर वर्ष 1878 को एम्मा एम नट्ट अमेरिका में पहली महिला टेलीफोन ऑपरेटर बनी।

पहली सितम्बर वर्ष  1511 में पीसा काउंसिल खुला।

पहली सितम्बर वर्ष 1807  में अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति आरोन बर्र  राजद्रोह के मामले में निर्दोष पाये गये।

पहली सितम्बर वर्ष  1923 में ग्रेट कैंटो भूकंप ने  जापान के टोक्यो और योकोहामा में भयंकर तबाही मचायी।

पहली सितम्बर वर्ष 1947 में भारतीय मानक समय को अपनाया गया।

पहली सितम्बर वर्ष  1956 में भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की स्थापना हुई।

पहली सितम्बर वर्ष 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद  त्रिपुरा केन्द्रशासित प्रदेश बना।

पहली सितम्बर वर्ष 1964 में इंडियन ऑयल रिफ़ाइनरी और इंडियन ऑयल कम्पनी को विलय करके इंडियन ऑयल कॉपरेशन बनाई गयी।

पहली सितम्बर वर्ष   1972 में मिस्र और लीबिया ने फेडरेशन बनाया।

पहली सितम्बर वर्ष 1994 में उत्तरी आयरलैंड में आयरिन रिपब्लिकन आर्मी ने युद्ध विराम लागू किया।

पहली सितम्बर वर्ष 2000 में चीन ने तिब्बत होते हुए नेपाल जाने वाले अपने एकमात्र रास्ते को बंद किया।

पहली सितम्बर वर्ष 2003 में लीबिया और फ्रांस के बीच यूटीए विमान पर 1989 में हुई बमबारी में मारे गये लोगों के निकट सम्बन्धियों को मुआवजा देने को लेकर समझौता हुआ।

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पहली सितम्बर वर्ष 1939 को जर्मनी की नाज़ी सेना द्वारा पोलैंड पर आक्रमण के साथ ही दूसरा विश्व युद्ध आरंभ हो गया।

हिटलर ने जर्मनी पर अपने शासन के दौरान लोगों की राष्ट्रवादी सोच का दुरुपयोग करके, एक सशक्त सेना तैयार कर ली। उसने जातिवादी विचारों के सहारे अपने विस्तारवादी लक्ष्यों को आगे बढ़ाया। हिटलर ने थोड़ी सी अवधि में ही यूरोप के बड़े भाग और उत्तरी अफ़्रीक़ा के कुछ भागों पर नियंत्रण कर लिया। इसी के साथ जर्मनी के दो घटकों इटली और जापान ने भी दूसरे विश्व युद्ध में अफ़्रीक़ा व एशिया के कई क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा कर लिया। वर्ष 1943 में सोवियत यूनियन से नाज़ी सेना की पराजय के बाद, जर्मनी ने विभिन्न क्षेत्रों से पीछे हटना आरंभ कर दिया और अंततः 1945 के मई महीने में बिना शर्त हथियार रख दिए किंतु जापान ने इसी साल के अगस्त महीने तक हीरोशीमा और नागासाकी पर होने वाली बमबारी तक प्रतिरोध जारी रखा। दूसरे विश्व युद्ध में लगभग चार करोड़ लोग मारे गए और विभिन्न देशों को अरबों डालर की क्षति उठानी पड़ी।

 

 

पहली सितम्बर वर्ष 1961 को पूर्व यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में 25 देशों के अधिकारियों की उपस्थिति से गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों का पहला शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। पूर्वी व पश्चिमी ब्लाक के मुक़ाबले में तीसरी दुनिया के देशों के समर्थन के लिए गुट निरपेक्ष आंदोलन का गठन हुआ था और इसकी सदस्यता की सबसे महत्वपूर्ण शर्त, पूर्वी व पश्चिमी शक्तियों की संधियों में सदस्यता न लेना होना था। इस आंदोलन में दो मुख्य धड़े थे जिनमें पहला धड़ा यूगोस्लाविया, इंडोनेशिया, घाना और भारत के राष्ट्राध्यक्षों मार्शल टीटू, अहमद सूकार्नो, केवाम नकरूमा और पंडित नेहरू पर आधारित थे। यह धड़ा क्रांतिकारी और किसी पर भी निर्भर नहीं था। दूसरे धड़े में अधिकतर कंज़रवेटिव विचार के लोग थे जो व्यवहारिक रूप से पूरब या पश्चिम की किसी न किसी बड़ी शक्ति से जुड़े हुए थे। दोनों धड़ों के बीच अब भी मतभेद पाए जाते हैं और इसी लिए यह आंदोलन अब तक बड़ी शक्तियों के विरुद्ध कोई एकजुट मोर्चा नहीं बना पाया है।

 

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10 शहरीवर 1357 हिजरी शम्सी को अमरीका में रहने वाले सैकड़ों ईरानी छात्रों ने अमरीकी संचार माध्यमों की ओर से अत्याचारी पहलवी शासन के समर्थन के विरुद्ध प्रदर्शन किया। छात्रों ने शाह को अपदस्थ करने का नारा लगाया। इस अवसर पर लास एन्जेलस की पुलिस से उनकी झड़पें भी हुई। 500 छात्रों ने इस संबंध में लास एन्जेलस टाइम्ज़ समाचार पत्र की इमारत पर क़ब्ज़ा कर लिया और अमरीकी संचार माध्यमों पर आरोप लगाया कि वह ईरान के बारे में ग़लत समाचार प्रकाशित कर रहे हैं। पुलिस के हस्तक्षेप से यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन एक रक्तरंजित झड़पों की शक्ल अख़्तियार कर गया। पुलिस ने चालीस छात्रों को घायल करने के अतिरिक्त एक सौ बीस छात्रों को गिरफ़्तार कर लिया।

10 शहरीवर 1347 हिजरी शम्सी को ईरान के ख़ुरासान प्रांत के पूर्वी क्षेत्रों में भीषण भूकंप आया। इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 7 दश्मलव 8 मापी गयी थी। भूकंप के झटकों का चार मिनट तक आभास किया गया। इस भूकंप से पांच सौ गांव नष्ट हो गये जबकि दस हज़ार से अधिक लोग हताहत हुए।

 

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20 ज़िलहिज्ज 128 हिजरी क़मरी को पैग़म्बरे इस्लाम के परपौत्र हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का जन्म हुआ। उन्होंने 20 साल अपने पिता इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की सेवा में बिताए और उनके ज्ञान के अथाह सागर से अत्यधिक मोती बटोरे। इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने अपने पिता की शहादत के बाद 35 साल जनता के मार्गदर्शन का ईश्वरीय दायित्व इमामत संभाला। उन्होंने इस मार्ग में बहुत सी कठिनाइयां सहन कीं। इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के जीवन के आरंभिक साल उमवी शासन के पतन और अब्बासी शासन के सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का दौर था। इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम 55 साल ज़िन्दा रहे और इस दौरान उन्होंने अब्बासी शासन के 5 शासकों का दौर देखा। इनमें से हर एक शासक विरोधियों को दबाने और पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के अनुयाइयों को कुचलने में किसी से पीछे न था। इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने अपने जीवन का बड़ा भाग लोगों के बीच इस्लामी शिक्षाओं के प्रसार और उनके प्रशिक्षिण में बिताए। लेकिन अब्बासी शासन ने इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की ओर से ख़तरा महसूस करते हुए उन्हें जेल में डाल दिया ताकि लोग उनके ज्ञान व परिज्ञान से लाभान्वित न हो सकें और अंधकार में पड़े रहें। इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम अपने समय के सबसे विद्वान व दानी व्यक्ति थे। वे लोगों के बीच दानशीलता, उदारता और क्षमाशीलता के लिए मशहूर थे। इस अवसर पर आपकी सेवा में हार्दिक बधाई प्रस्तुत करते हैं और इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का एक स्वर्ण कथन पेश करते हैं। आप फ़रमाते हैः ईश्वर की पहचान के बाद उसकी निकटता हासिल करने का सबसे अच्छा माध्यम नमाज़, मां बाप के साथ भलाई करना और ईर्ष्या व आत्ममुग्धता से दूरी है।

 

20 ज़िल्हिज्जा सन 1329 हिजरी क़मरी को ईरान के महान धर्मगुरू व संवैधानिक क्रांति के अग्रणी नेता आयतुल्लाह मुल्ला मुहम्मद काज़िम ख़ुरासानी का निधन हुआ। वे आख़ुन्द ख़ुरासानी के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनके भीतर अपार क्षमताएं निहित थीं। उन्होंने आरंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद धार्मिक शिक्षा केन्द्र में प्रेवश लिया और वहां समय के प्रसिद्ध धर्मगुरूओं और विद्वानों से ज्ञान प्राप्त किया । वे अपने समय के श्रेष्ठतम शिष्यों में से एक थे। वे बाद में उच्च शिक्षा की प्राप्ति के लिए इराक़ के पवित्र नगर नजफ़ चले गये और वहां उन्होंने शिक्षा में उच्च स्थान प्राप्त किया। उसूले फ़िक्ह में उनका अलग ही दृष्टिकोण था। उन्होंने उसूले फ़िक्ह में सबसे प्रसिद्ध पुस्तक किफ़ायतुल उसूल लिखी जो आज तक शीया धर्म के उसूले फ़िक्ह के मुख्य स्रोतों में से एक है। उन्होंने जब से यह पुस्तक लिखी तब से लेकर आज तक उनकी यह पुस्तक धार्मिक शिक्षा केन्द्रों में पढ़ाई जा रही है।

Aug ३१, २०१६ १०:३७ Asia/Kolkata
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