क़ुरआन के सूरों की समीक्षा करते हुए हम इसके तीसवें पारे में पहुंच चुके हैं जो क़ुरआन का अंतिम पारा या खंड है।

इस पारे के अधिक्तर सूरे मक्के में उतरे। तीसवें पारे में जिस विषय पर बहुत अधिक बल दिया गया है वह क़यामत का दिन और इस दिन इंसानों की हालत है। कुछ लोग सवाल करते हैं कि क़यामत पर इतना अधिक बल देने की वजह क्या है। क़ुरआन के व्याख्याकर्ताओं की नज़र में क़यामत पर इतना अधिक बल देने का कारण  यह है कि इंसान के सुधार के लिए सबसे पहले उसका यह जानना ज़रूरी है कि हिसाब किताब लिया जाएगा। कोई अदालत है जिसकी नज़रों से किसी भी इंसान का कोई भी कर्म छिपा नहीं है। वहां किसी के साथ कोई ज़्यादती नहीं होगी और कोई भी अपनी वाजिब सज़ा से बच भी नहीं सकेगा। इस प्रकार के हिसाब किताब और अदालत पर यदि इंसान का ईमान होगा तो वह होश में आएगा तथा उसके भीतर सदाचार, प्रतिबद्धता और ज़िम्मेदारी की भावना जागेगी।

सूरए नबा क़ुरआन के तीसवें पारे का पहला सूरा है। यह क़ुरआन का 78वां सूरा है जो मक्के में उतरा। इसमें कुल 40 आयतें हैं। इस सूरे का दूसरा नाम अम्म है क्योंकि सूरे की शुरूआत इसी शब्द से हुई है। जब इस्लाम का उदय हुआ तो मक्के के नास्तिकों को एकेश्वरवाद, क़यामत, वहि, पैगम्बरी जैसे नए तथ्यों का सामना हुआ। इस लिए वह कभी तो संदेह और अज्ञान के कारण तथा कभी उपहास के उद्देश्य से इन तथ्यों के बारे में एक दूसरे से विभिन्न प्रकार के सवाल पूछा करते थे। उनका सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होता था कि क्या वाक़ई क़यामत आएगी?

सूरए नबा में इस सवाल को रखने के बाद आकाश और धरती में ईश्वर की शक्ति के प्रतीकों, इंसानों के लिए उसकी नेमतों, क़यामत शुरू होने की निशानियों, पापियों की दर्दनाक सज़ा, तथा स्वर्ग में नेक बंदों को मिलने वाली कुछ मनमोहक नेमतों का उल्लेख किया गया है।

सूरए नबा की शुरू की आयतों में ईश्वर की शक्ति और सामर्थ्य की निशानियों को बयान करने के बाद नास्तिकों और झुठलाने वालों को सृष्टि की व्यवस्था तथा ब्रह्मांड के अचरजों की ओर उन्मुख कराया गया है ताकि उन्हें यह अंदाज़ा हो कि इसी प्रकार क़यामत भी आ सकती है। जैसे किः क्या हमने धरती को तुम्हारे के लिए चैन की जगह नहीं बनाया? पहाड़ों को ज़मीन की कीलें नहीं बनाया और तुम्हें जोड़ों के रूप मे पैदा किया। नींद को तुम्हारे विश्राम का ज़रिया बनाया। रात को तुम्हारे लिए ढांपने वाला और दिन को तुम्हारे लिए रोज़ी कमाने का माध्यम बनाया और तुम्हारे ऊपर सात मज़बूत आसमान बनाए।

सूरए नबा की कुछ आयतें उन घटनाओं के बारे में बताती हैं जो क़यामत के दिन होने वाली हैं। उनमें बताया गया है कि इंसान दो सदाचारी और दुराचारी समूहों में विभाजित होंगे तथा चेतावनी देने के लिए दुराचारियों की सज़ा के बारे में कुछ बताया गया है। जैसे कि वहां वह किसी ठंडी चीज़ का स्वाद तक नहीं चख पाएंगे कि जो नरक की भयानक तपिश में कुछ शांति दे और न उन्हें कोई अच्छा पेय मिलेगा। बस केवल खौलता हुआ पानी और ख़ून तथा पस से भरा हुआ द्रव होगा। यह उनके कर्मों का उचित और सही बदला है।

सूरे के एक अन्य भाग में सदाचारियों और मोमिनों को क़यामत में प्रदान किए जाने वाले पारितोषिक का भी उल्लेख किया गया है। ईश्वर ने कहा है कि सदाचारियों के लिए बहुत बड़ी कामयाबी है। हरे भरे बाग़ और कई क़िस्म के अंगूर हैं। हमउम्र नौजवान हूरे हैं। स्वर्ग में रहने वालों को जो बड़ा आध्यात्मिक पारितोषिक मिलेगा वह यह होगा कि वहां न कोई व्यर्थ और निरर्थक बात करेगा न कोई किसी पर आरोप लगाएगा, न सत्य को झुठलाएगा और न वह बुरी बातें होंगी जो दुनिया में सदाचारियों को हमेशा परेशान करती हैं। वाक़ई यह वातावरण कितना अच्छा है।

सूरए नबा की आख़िरी आयत इंसानों को निकट आ पहुंचे प्रकोप से सचेत करती है और उस दिन के बारे में डराती है जिस दिन इंसान की आखों के सामने वह सारी चीज़ें आ जाएंगी जो उसने पहले अंजाम दिया होगा। इस अवसर पर काफ़िर इंसान करेगा कि काश मैं मिट्टी होता। इस आयत के अनुसार क़यामत के दिन इंसान के कर्म अपनी समुचित शक्ल में इंसान के सामने ज़ाहिर होंगे। वह अपने कर्मो को देखेगा तथा अपने बुरे कर्मों का बुरा रूप देखकर भय और पछतावे में पड़ जाएगा जबकि अपने अच्छे कर्मों का सुंदर रूप देखकर ख़ुश होगा। इस प्रकार भले इंसानों को बेहतरीन पारितोषिक उनके यही कर्म होंगे जो सुंदर रूप में उनके साथ होंगे और बुरे लोगों की सबसे बड़ी सज़ा यह होगी कि उनके बुरे और कुरूप कर्म उनके साथ चलेंगे।

 

सूरए नबा के बाद सूरए नाज़ेआत है जो क़ुरआन का 79वां सूरा है। यह मक्के में उतरा और इसमें 46 आयतें हैं। इस सूरे की भी बुनियादी बहस क़यामत के बारे में है। इस दिन के आने के बारे में बार बार क़समें, क़यामत के दिन के डरावने दृश्य, हज़रत मूसा और फ़िरऔन का क़िस्सा, धरती और आसमान पर ईश्वरीय शक्ति के प्रतीक, बुरे इंसानों का अंजाम, भले लोगों को मिलने वाले उपहार, इस सूरे के प्रमुख विषय हैं।

सूरए नाज़ेआत कई महत्वपूर्ण क़समों से शुरू होता है। क़ुरआन की क़समें इस ईश्वरीय ग्रंथ के चमत्कारों तथा उसके अति आकर्षक भागों में हैं। इन सूरों की इन क़समों की विषयवस्तु बड़ी सूक्ष्मता और रोचकता के साथ क़यामत के विषय का अलग अलग पहलुओं से उल्लेख करती है। पहली आयत में नाज़ेआत की क़सम खाई गई है। इस सूरे का नाम भी इसी शब्द पर रखा गया है। नाज़ेआत उन फ़रिश्तों को कहते हैं जिन्हें ईश्वर ने मामलों के संचालन का माध्यम बनाया है और उनकी क़सम खाई है और इस प्रकार उनकी भूमिका के महत्व को दिखाया है। फ़रिश्ते प्रकाश से बने हैं। वह छोटे बड़े समूहों के रूप में है। हर समूह के फ़रिश्त किसी विशेष काम के लिए हैं। एक समूह इंसानों के कर्म लिखता है। कुछ फ़रिश्ते ईश्वरीय संदेश पहुंचाने पर नियुक्त किए गए हैं। कुछ फ़रिश्ते इंसानों और पशुओं की रोज़ी पहुंचाते हैं। कुछ फ़रिश्ते इंसानों की जान निकालते हैं। सूरए नाज़ेआत की आरंभिक आयतों में कहा गया है कि उन फ़रिश्तों की क़सम जो पापियों की जान बड़ी कड़ाई से निकालते हैं और उन फरिश्तों की क़सम जो मोमिन इंसानों की जान बड़ी सहनशीलता और उत्साह के साथ निकालते हैं। उन फ़रिश्तों की क़सम जो ईश्वरीय आदेश का पालन करने में तेज़ी दिखाते हैं। एक दूसरे से आगे निकल जाने की कोशिश करते हैं और वह जो मामलों का संचालन करते हैं।

क़यामत पर विश्वास रखना, सभी ईश्वरीय धर्मों का एक स्तंभ है। क़ुरआन ने इस पर बहुत अधिक बल दिया है। इस प्रकार से कि क़ुरआन में 1400 आयतें क़यामत के बारे में हैं। क़यामत की कई निशानियां हैं जिनमें एक है सूर का फूंका जाना। सूर फूंका जाने वह महत्वपूर्ण घटना है जिसे क़ुरआन ने भौतिक संसार के अंत की और अनन्त संसार के प्रारंभ शुरूआत कहा है तथा इस समय बहुत भयानक और डरावनी घटनाओं की सूचना दी है। सूरए नाज़ेआत की आयतों में अपराधियों और पापियों के बेचैन दिलों की बात की गई है जो सज़ा और हिसाब किताब से डरे हुए होंगे। यह आंतरिक बेचैनी इतनी भीषण होगी कि उसके चिन्ह पापियों के पूरे अस्तित्व में प्रकट होंगे। डर से उनकी आखें धंस जाएंगी, पुतलियां हिलना बंद करके पथरा सी जाएंगी। मानो उनका प्रकाश चला गया हो।

सूरए नाज़ेआत की 15 से 26 तक की आयतों में इतिहास के बहुत बड़े पापी अर्थात फ़िरऔन और उसके दर्दनाक अंजाम का उल्लेख किया गया है। ताकि अरब के नास्तिकों को भी पता चल जाए कि उनसे अधिक शक्तिशाली फ़िरऔन भी ईश्वरीय प्रकोप के सामने नहीं टिक सका और साथ ही मोमिनों को भी पता चल जाए कि शत्रु के विदित वर्चस्व से नहीं घबराना चाहिए क्योंकि इस वर्चस्व को मिटा देना ईश्वर के लिए बहुत आसान है। सत्ता लोभ और अपना वर्चस्व बढाने की चाह फ़िरऔन को इस हद तक ले गई कि उसने ख़ुद को भगवान कहना शुरू कर दिया। लेकिन ईश्वर ने इस नास्तिक को दुनिया में भी और परलोक में भी भयानक प्रकोप में डाल दिया। क़ुरआन ने कहा है कि उसने यह कहानी उन लोगों को पाठ देने के लिए बयान की है जो ईश्वर का भय रखते हैं।

धरती इंसानों और अन्य प्राणियों का आश्रय है। यह अपने सभी पहाड़ों, नदियों, दर्रों, जंगलों, जलसोतों, समुद्रों, खदानों, मूल्यवान संसाधनों के साथ ईश्वर की निशानियों में से एक निशानी है। सूरए नाज़ेआत की आयत नंबर 30 कहती है कि इसके बाद ज़मीन का फ़र्श बिछाया। ज़मीन का फ़र्श बिछाने से तात्पर्य यह है कि रचा के समय धरती की पूरी सतह बाढ़ और बारिश के पानी में डूबी हुई थी। धीरे धीरे पानी ज़मीन के गहरे भागों में चला गया तथा सूखी ज़मीन पानी के भीतर से निकल आई और इसका फैलाव बढ़ता गया। दूसरी ओर धरती शुरू में बहुत ऊबड़ खाबड़ थी तथा उस पर इंसानो के लिए जीवन व्यतीत कर पाना कठिन था। लेकिन बारिश का पानी उस पर बार बार गिरा और ऊंचे भागों की ऊंचाई कुछ कम हुई और दर्रे विस्तृत हो गए और धरती धीरे धीरे समतल होने लगी और खेती के योग्य बन गई। इसी को ज़मीन का फ़र्श बिछाने का नाम दिया गया है। इस समतल धरती को भूकंप जैसी प्रकृतिक आपदाएं नुक़सान पहुंचा सकती थीं और उसकी स्थिरता को भंग कर सकती थीं इस लिए ईश्वर ने पहाड़ों का जाल धरती पर रख दिया और इसे मज़बूत बना दिया। सूरे  की अंतिम आयतों में कहा गया कि यह सब कुछ ईश्वर ने इंसानों और उनके पशुओं के लिए पैदा किया है।

सूरए नाज़ेआत की अंतिम आयतें पैग़म्बरे इस्लाम को यह बताती हैं कि आपका संदेश केवल उन लोगों को प्रभावित करेगा जो क़ियामत का डर रखते हैं लेकिन जिसे क़यामत का डर नहीं है उसके लिए यदि आप पूरा क़ुरआन भी पढ़ डालें तो भी उसपर कोई असर नहीं होगा।

 

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Sep ०४, २०१६ १२:२७ Asia/Kolkata
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