सूरए इन्फ़ेतार पवित्र क़ुरआन का 82वां सूरा है। 

इसमें 19 आयते हैं।  क़ुरआन के व्याख्याकारों का कहना है कि यह सूरा मक्की है।  वे कहते हैं कि इन्फ़ेतार, बेसत के तेरहवें साल नाज़िल हुआ अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम के मदीना पलायन से थोड़ा पहले।

इन्फ़ेतार, अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है किसी चीज़ में परिवर्तन उत्पन्न करना।  यह परिवर्तन एसा होता है कि वह वस्तु अपना पहला रूप बदलकर नए रूप में सामने आती है।  इस सूरे में प्रलय से पूर्व आसमान में होने वाले महान परिवर्तनों का उल्लेख किया गया है।  सूरए इन्फ़ेतार में जिन विषयों का उल्लेख किया गया है वे इस प्रकार हैः संसार की समाप्ति के निकट घटने वाली घटनाएं, मानव को ईश्वर की ओर से दी जाने वाली अनुकंपाएं, मनुष्य के कर्मों का लेखाजोखा रखने वाले फ़रिश्तों की ओर संकेत, प्रलय के दिन अच्छे और बुरे लोगों के भविष्य का निर्धारण और उस महान दिन की कठिनाइयों का उल्लेख आदि।

हमने इन्फ़ेतार से पहले वाले सूरे तकवीर का उल्लेख करते हुए बताया था कि प्रलय के दिन मनुष्य अपने कर्मों की वास्तविकता को स्वयं देखेगा।  सूरे इन्फ़ेतार में भी इसी वास्तविकता पर बल दिया गया है।  प्रलय के दिन मनुष्य के कर्मो का लेखाजोखा बहुत ही सटीक ढंग से किया जाएगा।  वह इस प्रकार से होगा कि यदि मनुष्य के मरने के बाद उससे संबन्धित जो प्रभाव पाए जाते हैं यदि उसकी मृत्यु के बाद वे किसी के मार्गदर्शन या पथभ्रष्टा का कारण बनते हैं तो उनको भी उसी के हिसाब में लिखा जाएगा।  दूसरे शब्दों मे इस प्रकार की अच्छाइयों और बुराइयों का वह भी भागीदार होगा।

सूरे की पहली आयत में संसार के अंत में घटने वाली कुछ घटनाओं के उल्लेख के साथ संकेत किया गया है कि आकाश की व्यवस्था भी बिखर जाएगी।  नक्षत्रों में बड़े बड़े विस्फोट होंगे और आपस में टकराव के साथ सोलर सिस्टम तहस नहस हो जाएगा।  इस प्रकार से इस नश्वर संसार का अंत हो जाएगा जिसके पश्चात एक नई व्यवस्था जन्म लेगी।  उस समय मनुष्य को पता चलेगा कि उसने पहले क्या भेजा है और बाद के लिए क्या रखा है।

पवित्र क़ुरआन की विभिन्न आयतों में यह बात बल देकर कही गई है कि प्रलय के दिन संसार की वास्तविकता सामने आएगी।  उस समय मनुष्य अपने सारे कर्मों को अपनी आखों से देखेगा।  उस दिन वह अपने कर्म भी देखेगा जिनको उसने अपने जीवन में अंजाम दिया है और उन कर्मों को भी देखेगा जिन्होंने उसकी मृत्यु के बाद लोगों को प्रभावित किया है चाहे वे अच्छे हो या बुरे।  यदि उसने किसी बुरी परंपरा की नीव डाली है तो उसके दंड में वह भी सहभागी बनेगा।

सूरए इन्फ़ेतार की छठी आयत में ईश्वर कहता है कि हे मनुष्य! किस चीज़ ने तुझको तेरे महान ईश्वर के सामने घमण्डी बना दिया है?  यह आयत मनुष्य को सचेत करती है।  यह कैसी विडंबना है कि उस महान सृष्टिकर्ता के सामने मनुष्य घमण्डी बन गया है जिसने स्वयं उसको जीवन दिया और विभिन्न प्रकार की अनुकंपाओं का उसे स्वामी बनाया।  उसकी आजीविका का प्रबंध भी उसी ने किया और अपनी कृपा से उसे भौतिक एवं आध्यात्मिक विभूतियों से मालामाल किया।

सूरए इन्फ़ेतार की इस आयत में और इसके अतिरिक्त कुछ अन्य आयतों में भी ईश्वर, घमण्डी लोगों को इस बात के लिए प्रेरित करता है कि वे अपनी सृष्टि के बारे में सोच विचार करें।  वे देखें कि उनको अनुकंपाएं देने वाला कौन है? इस बारे में सोच विचार करने के बाद मनुष्य को घमण्ड छोड़कर ईश्वर की उपासना और उसके आदेशों का पाल्न करना चाहिए।

इस सूरे की कुछ अन्य आयतें मनुष्य की निश्चेतता के कारकों की समीक्षा के साथ ही साथ सृष्टि और प्रलय के दिन के प्रति उसकी उदासीनता का भी वर्णन करती हैं।  इसमें यह भी बयान किया गया है कि किस प्रकार के फ़रिश्ते मनुष्य के कर्मों को लिखते हैं जिनके आधार पर उसका हिसाब अच्छे या बरे के रूप में किया जाएगा।  सूरए इन्फ़ेतार के अंत में इस बात पर विशेष रूप में बल दिया गया है कि प्रलय के दिन केवल ईश्वर का आदे ही जारी होगा और लोगों के कर्मों की बड़ी ही सूक्ष्मता से समीक्षा की जाएगी।  इस सूरे की अन्तिम आयत में क़यामत या प्रलय के दिन की एक अन्य विशेषता का उल्लेख किया गया है। आयत में कहा गया है कि यह वह दिन है जिस दिन कोई भी व्यक्ति किसी के हित में कार्य करने में सक्षम नहीं है और सबकुछ ईश्वर के आदेश से ही है।  वास्तविकता भी यही है कि सबकुछ ईश्वर का ही है।  संसार के सब लोगों की ईश्वर की आवश्यकता है जबकि ईश्वर को किसी की आवश्यकता नहीं है।  वह सर्वशक्तिमान है।

सूरे मुतफ़्फ़ेफ़ीन 83 नंबर का सूरा है।  इसमें 36 आयते हैं।  सूरे मुतफ़्फ़ेफ़ीन मक्के में नाज़िल हुआ।  इस सूरे में पांच चीज़ों का मुख्य रूप से उल्लेख किया गया है।  कम तोलने वालों को चेतावनी, प्रलय पर भरोसा न होना, प्रलय के दिन पापियों का अंजाम, स्वर्ग में परोपकारियों और भले लोगों की मिलने वाली अनुकंपाएं और काफ़िरों द्वारा मोमिनों का परिहास आदि जैसे विषय।

इब्ने अब्बास कहते हैं कि जब पैग़म्बरे इस्लाम (स) मदीने पहुंचे तो उस समय मदीना में रहने वाले बहुत से लोग कम तोलने जैसी बुराई में लिप्त थे।  ईश्वर ने यह आयत नाज़िल की और उन्होंने ईश्वर की बात मान ली।  इसके बाद उन्होंने अपनी यह बुरी आदत छोड़ दी।  पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने यह आयत मदीनावासियों के सामने पढ़ने के बाद कहा कि पांच काम एसे हैं जिनके बदले में पांच काम निश्चित रूप में होंगे।  उनकी यह बात सुनकर लोगों में यह पांच बातें जानने के लिए उत्सुकता जिरासा बढ़ी।  उन्होंने पूछा कि वे पांच काम कौन से हैं?

पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने कहा कि जब जब किसी जाति ने वचनों को पूरा नहीं किया तो ईश्वर ने उस जाति पर शत्रुओं को लाद दिया।  जिन जातियों ने ईश्वर के आदेश की अवहेलना की उनके बीच निर्धन्ता फैल गई।  जिस जाति में भी अनैतिक बातें प्रलित हुईं उसके भीतर मरने वालों की संख्या में वृद्धि हुई।  जिस जाति ने भी कम तोलने जैसा काम किया उसकी खेती नष्ट हो गई और वहां पर अकाल पड़ा।  जिस जाति ने भी ज़कात नहीं दी वह वर्षा से वंचित हो गई।

सूरे मुतफ़्फ़ेफ़ीन की पहली आयत में ईश्वर कहता है कि धिक्कार हो कम तोलने वालों पर।  यह आयत ईश्वर की ओर से उन लोगों के लिए खुली चेतावनी है जो कम तोलते हैं और इस प्रकार से लोगों पर अत्याचार करते हैं।  वे लोग जब भी अपने लिए कोई चीज़ लेते हैं तो उसे नाप तोलकर सही ढंग से लेते हैं जबकि दूसरों को देते समय डंडी मारते हैं।

क़ुरआन के व्याख्याकारों का कहना है कि कम तोलने जैसी बुराई केवल कम तोलने तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसमे बहुत सी चीज़ें सम्मिलित हैं। उदाहरण स्वरूप वह व्यक्ति जो अपना काम सही ढंग से न करे उसकी गणना भी कम तोलने वालों की सूचि में ही होगी।  इस प्रकार के लोग घाटे में रहने वाले हैं।  एसे कामों की ईश्वर ने कड़ी निंदा की है।

आयत के अनुसार यदि कम तोलने वाले इस बात पर विश्वास रखते कि उनके सारे कामों का लेखाजोखा रखा जा रहा है जिसे प्रलय के दिन पेश किया जाएगा तो वे कम तोलने जैसा बुरा काम नहीं करते।  इस प्रकार वे लोग दूसरों के अधिकारों का हनन न करते।

इस सूरे की कुछ आयतों में क़यामत के दिन बुरे काम करने वालों के अंजाम की ओर संकेत किया गया है।  इसकी आयत संख्या 7 से 9 में कहा गया है कि कुछ नहीं, निश्चय ही दुराचारियों का काग़ज 'सिज्जीन' में है तुम्हें क्या मालूम कि 'सिज्जीन' क्या हैं? मुहर लगा हुआ काग़ज़ है।

एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम (स) अपने कुछ साथियों के साथ मक्के के काफ़िरों के निकट से गुज़रे।  उन लोगों ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके साथियों का मज़ाक़ उड़ाया।  काफ़िर लोग, मोमिनों के निर्धन होने के कारण उनको गिरी नज़र से देख रहे थे और उनका मज़ाक़ उड़ा रहे थे।  वे लोग मोमिनों को पथभ्रष्ट कहते थे और अपने किये से बहुत खुश थे।  इसी बीच कुछ आयतें नाज़िल हुईं जिनमें क़यामत या प्रलय के दिन मज़ाक़ उड़ाने वाले काफ़िरों के अंजाम का उल्लेख किया गया है।  प्रलय का दिन एसा दिन होगा कि जब अधर्मी अपने किये पर पछताएंगे और संसार में अबतक किये गए बुरे कामों को देखकर घबराए हुए होंगे।

क़ुरआन की इन आयतों को पढ़ने से पता चलता है कि उपहास करना या मज़ाक़ उड़ाना, शत्रुओं का एक हथकण्डा है।  यह काम सामान्यतः वे लोग ही करते हैं जो घमण्डी होते हैं और तर्क को नहीं समझते।  एसे लोग स्वयं को दूसरों पर वरीयता देते हैं और इस बात की प्रतीक्षा में रहते हैं कि उनका आदर किया जाए।  इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि हठधर्मी अत्याचारी, ईमान वालों के मुक़ाबले इस प्रकार का काम करें। 

 

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Sep ०४, २०१६ १३:४७ Asia/Kolkata
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