सूरये ग़ाशिया पवित्र क़ुरआन का सूरा नंबर  88 है।

यह सूरा मक्के में नाज़िल हुआ था और इसमें 26 आयतें हैं। इस सूरे में तीन विषयों पर बल दिया गया है। एकेश्वरवाद, प्रलय और पैग़म्बरी। प्रलय के दिन की विशेषता। ईश्वरीय नेअमतों का उल्लेख, प्रलय में अच्छे और बुरे समूहों की दशा, एकेश्वरवाद की निशानियां, महान ईश्वर की शक्ति व महानता, ईश्वरीय दूतों के दायित्व और लोगों के मार्ग दर्शन में उनकी भूमिका वे विषय हैं जिनकी इस सूरे में चर्चा की गयी है।

इस सूरे के आरंभ में हम प्रलय के एक नाम ग़ाशिया को पढ़ते हैं और ग़ाशिया इस सूरे का नाम भी है। महान ईश्वर कहता है क्या तुम्हें छा जाने वाली घटना की ख़बर है?

ग़ाशिया, ग़ेशावह शब्द से बना है जिसका अर्थ छा जाना है। प्रलय के लिए इस नाम के चयन का कारण यह है कि उस दिन की भयावह घटनायें सर्वव्यापी होंगी यानी हर जगह, हर व्यक्ति और हर चीज़ पर छा जायेंगी। आयत इस संदेश के साथ इस बात को बयान करती है कि प्रलय के दिन पापियों व अपराधियों की स्थिति किस प्रकार होगी और आयत दो प्रकार के भिन्न लोगों की दशा का चित्रण करती है। पहले उन लोगों की दशा का चित्रण है जिनके सिर लज्जा से झुके होंगे और उनके पूरे अस्तित्व में भय, अपमान और दंड समाया होगा और चूंकि इंसान की आत्मिक स्थिति हर जगह से अधिक चेहरे से स्पष्ट होती है इसलिए यह भय और अपमान उनके समूचे चेहरे से दिखाई देगा। ये वे लोग होंगे जिन्होंने इस दुनिया में बहुत अधिक प्रयास किये हैं परंतु थकावट के अलावा उन्हें कुछ भी नहीं मिलेगा। उनके पास न ईमान होगा और न महान ईश्वर की बारगाह में स्वीकार्य अमल। इसी प्रकार वे उस सम्पत्ति को भी अपने साथ नहीं ले जा सकेंगे जिसे उन्होंने इस दुनिया में संचित किया था। उनके पास कोई भला कार्य नहीं होगा तो वे थके हुए परिश्रमी हैं परंतु उन लोगों का दंड यहीं पर समाप्त नहीं होगा बल्कि जब वे नरक की आग की गर्मी से प्यास से तड़प रहे होंगे तो उन्हें बहुत ही गर्म सोते का पानी पीने के लिए दिया जायेगा।

महान ईश्वर पवित्र क़ुरआन के सूरए ग़ाशिया की 6ठीं और 7वीं आयत में कहता है” उनके लिए कोई खाना नहीं होगा सिवाये एक प्रकार की ज़री के जो सूखा, कड़वा और बदबूदार कांटा है।

यह अपमानजनक चेहरे हैं जिन्होंने अत्याचार और दूसरों के अधिकारों पर अतिक्रमण से इस दुनिया में नाना प्रकार के खाने खाये और इस बात की अनुमति नहीं दी कि वंचित लोग घटिया चीज़ों व खानों के अतिरिक्त कुछ और खायें। नरक में उन्हें जो खाना मिलेगा वह उन्हें भूख से मुक्ति नहीं दिलायेगा।

प्रलय में एक दूसरा दल होगा जिसके चेहरे खिले व प्रफुल्लित होंगे अपराधी व बुरे लोगों के चेहरों के विपरीत। इन लोगों ने इस दुनिया में जो प्रयास किये हैं उससे वे प्रसन्न होंगे। हमने कहा कि नरक में जाने वालों को इस दुनिया में किये गये प्रयास के बदले में थकावट के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिलेगा जबकि स्वर्ग में जाने वाले सर्वोत्तम रूप में अपने प्रयास का परिणाम देखेंगे और वे पूरी तरह प्रसन्न होंगे। जो प्रयास उन्होंने किये हैं महान व कृपालु ईश्वर उसका बदला कभी दो बराबर और कभी दस बराबर और कभी उससे अधिक देगा। इसी प्रकार महान ईश्वर कभी उनके अच्छे कार्यों का बदला बेहिसाब देगा यानी इतना अधिक होगा कि उसका हिसाब -किताब नहीं होगा। स्वर्ग में रहने वालों का स्थान बहुत ही ऊंचा व अच्छा होगा। वहां वे किसी प्रकार की निरर्थक  बात नहीं सुनेंगे। निः संदेह इस प्रकार की जगह बहुत ही शांतिदायक और दिल को लुभाने वाली होगी। अगर सही तरह से सोचा जाये तो हम यह देखेंगे कि दुनिया में दुःखों के महत्वपूर्ण भाग का कारण पीड़ा दायक और दुःख पहुंचाने वाली बातों का सुनना है और इस प्रकार की बातों से इंसान की आत्मिक शांति छिन जाती है और सामाजिक व्यवस्था को आघात पहुंचता है और बुराई की आग भड़क जाती है।

सूरए ग़ाशिया की दूसरी आयतें इसी प्रकार इंसान का ध्यान महान ईश्वर के अस्तित्व और आसमान और ज़मीन में उसकी निशानियों की ओर केन्द्रित कराती हैं। आसमान,  जो प्रकाश का केन्द्र है, ज़मीन, जो विभिन्न प्रकार के जीव -जन्तुओं के रहने और विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों का केन्द्र है और ऊंट जैसे पशु आदि सब महान ईश्वर की निशानियां हैं और उसने इन सबको इंसान के अधिकार में दे रखा है।

इन विभिन्न प्रकार की नेअमतों के बारे में चिंतन- मनन इंसान को इन नेअमतों के जनक व दाता का शुक्र अदा करने के लिए प्रेरित करता है और नेअमत का शुक्र अदा करना इंसान को नेअमत देने वाले की पहचान प्राप्त करने के लिए आमंत्रित करता है। इस प्रकार का बयान कि महान ईश्वर ने आसमान, जमीन, पहाड़ और जानवरों को किस लिए और किस प्रकार पैदा किया है, इस बात का सूचक है कि इस ब्रह्मांड को अकारण पैदा नहीं किया गया है और इंसान को भी किसी उद्देश्य से पैदा किया गया है।

सूरे ग़ाशिया में महान ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहता है” हे पैग़म्बर लोगों को सृष्टि के उद्देश्यों से अवगत कराइये और उन्हें ईश्वर के सामिप्य का रास्ता बताइये।“

अलबत्ता परिपूर्णता का मार्ग उस समय तय होगा जब इंसान उस पर अपनी इच्छा व इरादे से चलेगा। इस आधार पर महान ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम से कहता है “आप कदापि लोगों को इस कार्य के लिए बाध्य नहीं कर सकते और अगर कर सकते तो इस प्रकार के ईमान का कोई लाभ नहीं।

 सूरे ग़ाशिया की 22वीं आयत में हम पढ़ते हैं उन पर आपका अधिकार नहीं है यानी आप उन्हें ईमान के लिए विवश नहीं कर सकते। सूरए ग़ाशिया की अंतिम आयतें महान ईशवर की ओर लौटने और प्रलय के दिन के हिसाब- किताब पर बल देती और कहती हैं निश्चित रूप से सबकी वापसी हमारी ओर है और निश्चित रूप से उनका हिसाब भी हमें करना है।

 

फज्र भी पवित्र क़ुरआन का एक सूरा है और बहुत से दूसरे सूरों की भांति उसकी आयतें छोटी हैं और यह सूरा भी मक्के में नाज़िल हुआ है। इस सूरे की कुछ आयतों में जहां डराया गया है वहीं कुछ आयतों में शुभ सूचना भी दी गयी है। इस सूरे के आरंभिक भाग में हम एसी क़समों को देखते हैं जो अपने आपमें ने अभूतपूर्व हैं और वे अत्याचारियों को नरक की आग से डराने की भूमिका हैं। इसी प्रकार इस सूरे की आरंभिक आयतों में इस बात की ओर संकेत किया गया है कि ईश्वर ने आद, समूद और फिरऔन जैसे पहले की क़ौमों और व्यक्तियों से कड़ा बदला लिया है। इसी प्रकार इस सूरे की आरंभिक आयतों में इंसान की परीक्षा, अच्छे कार्यों में इंसान की लापरवाही, प्रलय, अपराधियों और काफिरों का अंजाम और संतुष्ट आत्मा वाले मोमिनों को महान प्रतिदान वे विषय हैं जो इस सूरे की आयतों में बयान किये गये हैं।

सुबह की क़सम, दस रातों की क़सम, सम -विषम की क़सम सूरए फज्र की आरंभिक क़समें हैं। भोर का समय ईश्वर की महानता, प्रकाश के आरंभ और अंधकार की समाप्ति का चिन्ह है। भोर का समय प्राणियों के सोने के समय की समाप्ति और उनकी गतिविधियों के आरंभ होने का समय है। भोर का समय, रात के अंधेरे को समाप्त करने वाला ,ब्रह्मांड में प्रकाश बिखरने वाला और जीवन को परिवरित करने वाला है। इस आधार पर इस्लाम भी सुबह व भोर का उजाला था क्योंकि अज्ञानता के काल में उसका उदय हुआ था। इसी प्रकार महामुक्तिदाता हज़रत इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम के प्रकट होने को भी सुबह व भोर का एक नमूना समझा जाता है। इसी प्रकार कर्बला के मैदान में दसवीं मोहर्रम को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और इतिहास में कुफ्र, अज्ञानता और अत्याचार के विरुद्ध होने वाले समस्त आंदोलनों को नई सुबह समझा जाता है। यहां तक कि पापी के दिल में जलने वाली उस पहली चिंगारी को भी भोर कहा जाता है जो उसे अपने पापों से प्रायश्चित करने के लिए आमंत्रित करती है।

सूरे फज्र की 15वीं और 16वीं आयतों में इंसान के इम्तेहान के विषय के बारे में चर्चा की गयी है। इंसान के जीवन में परीक्षा ईश्वरीय पुण्य और दंड का मापदंड है और यह जीवन का महत्वपूर्ण मामला है। इन आयतों के आधार पर जब महान ईश्वर इंसान की परीक्षा लेता है और उसे नेअमतों से नवाज़ता है तो इंसान घमंडी हो जाता है और कहता है कि ईश्वर ने मुझे नवाज़ा है परंतु जब परीक्षा के उद्देश्य से  महान ईश्वर इंसान की रोज़ी को तंग व कम  कर देता है तो वह निराश हो जाता और कहता है ईश्वर ने मुझे अपमानित किया है जबकि वह इस बात को नहीं जानता है कि ईश्वरीय परीक्षा में उसकी परिपूर्णता का रहस्य नीहित है। महान ईश्वर अपनी तत्वदर्शिता के अनुसार हर गुट की परीक्षा किसी चीज़ से लेता है कभी नेअमत देकर तो कभी मुसीबत में गिरफ्तार करके इंसान की परीक्षा लेता है। महत्वपूर्ण यह है कि नेअमतों से सम्पन्न होने या उससे वंचित होने को महान ईश्वर से निकटता या उससे दूरी का चिन्ह नहीं समझना चाहिये बल्कि हर जगह इंसान की श्रेष्ठता का मापदंड तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय है।

इसी प्रकार फज्र की 17वीं और 18वीं आयतों में महान ईश्वर से दूरी और मुसीबत के कारणों पर ध्यान दिया गया है। महान ईश्वर फरमाता है “कदापि नहीं बल्कि तुम अनाथ का सम्मान नहीं करते हो और न मोहताज को खाना खिलाने के लिए एक दूसरे को प्रोत्साहित करते हो।“

निःसंदेह केवल अनाथों की भूख का मामला नहीं है बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण उनकी भावनात्मक ज़रुरतों की पूर्ति है। अनाथ का सम्मान किया जाना चाहिये ताकि वे माता –पिता की कमी का आभास न करें। इसी कारण अनाथों का सम्मान और उनसे प्रेम, ईमान की मज़बूती और सफलता का कारण है। सूरे फज्र की अंतिम आयतों में महान ईश्वर मुतमइन व संतुष्ट आत्मा और उन मोमिनों का उल्लेख करता है जिन्हें बड़ी घटनाओं और विपत्तियों के मध्य भी शांति प्राप्त होती है और उन पर अपनी कृपा दृष्टि करते हुए वह उन्हें संबोधित करता और फरमाता है” हे संतुष्ट आत्मा, अपने पालनहार की ओर लौट आ इस हालत में कि तू उससे राज़ी है और वह तुझसे राज़ी है तो मेरे बंदों में शामिल हो जा और मेरे स्वर्ग में दाखिल हो जा।“

इन सुन्दर शब्दों में महान व सर्वसमर्थ ईश्वर ने सीधे रूप से  उन आत्माओं को निमंत्रित किया है जो ईमान की छाया में संतोष व शांति के चरण तक पहुंच गयी हैं। एसा निमंत्रण जो पालनहार से वास्तविक प्रसन्नता के साथ है और उसके बाद वह अपने बंदे के सिर पर बंदगी का मुकुट रखता है और उसे अपनी बंदगी के पावन वस्त्र से गौरवान्वित करता है। इस प्रकार की आत्मा ईश्वरीय वादे पर संतुष्ट है और विभिन्न प्रकार की मुसीबतों व घटनाओं और सबसे बढ़कर प्रलय के दिन की व्याकुलता व भय के वातावरण में भी उसे शांति प्राप्त रहेगी।

                           

 

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Sep ०४, २०१६ १५:०६ Asia/Kolkata
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