हमने मां-बाप के अधिकारों के विषय की चर्चा शुरू करते हुए कहा था कि जिस प्रकार मानवीय समाज और धर्म, मां-बाप को अपनी संतान के प्रति जवाबदेह बनाता है और उनके लिए कुछ ज़िम्मेदारियों का निर्धारण करता है, उसी तरह संतान को भी अपने मां-बाप के प्रति उत्तरदायी और ज़िम्मेदार ठहराता है।

विभिन्न धर्मों में मां-बाप, विशेष रूप से मां के विशिष्ट स्थान और विशेष सम्मान का उल्लेख करते हुए हमने ईश्वरीय दूत हज़रत मूसा की शिक्षाओं की ओर संकेत किया था। हज़रत मूसा (अ) ने जब ईश्वर से यह जानना चाहा कि स्वर्ग में कौन उनका साथी होगा? तो ईश्वर ने एक युवा क़साई का पता बताया। हज़रत मूसा उस युवा से मिलने और यह जानने के लिए उत्सुक थे कि वह आख़िर ऐसा कौनसा पुण्य करता है, जिसके कारण ईश्वर उसे स्वर्ग में अपने दूत के समान उच्च स्थान प्रदान करेगा। हज़रत मूसा (अ) ने जब दिन भर की उसकी गतिविधियों को देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ, इसलिए कि उस युवक ने कोई भी ऐसा पुण्य अंजाम नहीं दिया था, जो असमान्य हो। रात होने पर उस युवक को अपना परिचय देते हुए हज़रत मूसा उसके साथ उसके घर गए तो देखा, घर पहुंचकर सबसे पहले युवक एक बूढ़ी महिला की सेवा में उपस्थित हुआ, जो इतनी कमज़ोर थी कि अपनी जगह से उठ भी नहीं सकती थी। हज़रत मूसा ने युवक से पूछा कि घर पहुंचते ही सबसे पहले जिस बूढ़ी महिला को तुमने भोजन करवाया और उसकी सेवा की वह कौन है और जब तुम उसे खाना खिला रहे थे तो वह आसमान की ओर देखकर धीरे धीरे क्या कह रही थी? युवक ने जवाब दिया कि जब भी मैं अपनी मां को खाना खिलाता हूं और उसकी सेवा करता हूं तो वह ईश्वर से बस एक ही दुआ करती है कि स्वर्ग में मेरे बेटे को ईश्वरीय दूत मूसा का साथी बना दे।

इस घटना से स्पष्ट हो जाता है कि मां की सेवा और मां के दिल से संतान के लिए निकलने वाली दुआओं का ईश्वर कितना सम्मान करता है। एक ईश्वरीय दूत जो लोगों तक ईश्वरीय संदेश पहुंचाने और उनके मार्गदर्शन के लिए जीवन भर तरह तरह की कठिनाईयां सहन करता है, हमेशा ईश्वर की उपासना में लीन रहता है और परोपकार करता है, उसके बाद स्वर्ग में उसे जो उच्च स्थान प्राप्त होता है, ईश्वर एक सामान्य से व्यक्ति को भी वही स्थान प्रदान कर देता है, जो अपनी मां की सेवा करता है और मां उसे दिल से आशीर्वाद देती है। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि ईश्वर के निकट मां-बाप को प्रसन्न रखने और उनकी सेवा का क्या महत्व है।

मनुष्य के सामाजिक बोध का सही विकास पारिवारिक जीवन में संभव है, इसलिए अगर इस छोटी सी सामाजिक इकाई में बच्चों का पालन-पोषण इस प्रकार से किया जाए कि वह आपस में एक दूसरे का विशेष रूप से अपने बड़ों और मां-बाप का सम्मान करें, तो निश्चित रूप से अन्य लोगों के अधिकारों का सम्मान उनके स्वभाव में शामिल हो जाएगा, इस प्रकार सामाजिक स्तर पर वे दूसरों के अधिकारों का सम्मान और सामाजिक नियमों का पालन करेंगे।

विभिन्न धर्मों के ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि मां-बाप का सम्मान और उनकी सेवा को हमेशा से एक नौतिक गुण और धार्मिक नियम के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ओल्ड टेस्टामेंट अर्थात पुराना नियम में जिसे यहूदी अपना धर्मग्रन्थ मानते हैं, हम देखते हैं कि ईश्वरीय दूत हज़रत याक़ूब जहां अपने कुछ बेटों को आज्ञाकारी होने के कारण आशिर्वाद देते हैं, तो वहीं कुछ बेटों को आज्ञापालन नही करने के लिए बुरा भला कहते हैं। 

इसी प्रकार, हज़रत मूसा के लिए ईश्वर के 10 आदेशों में से एक यह था कि अपने मां-बाप का सम्मान करो, ताकि ईश्वर जो इलाक़ा तुम्हें प्रदान करेगा, उसमें लम्बे समय तक जीवन व्यापन कर सको।

इतिहास में इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ) के हवाले से है कि हज़रत मूसा (अ) ने ईश्वर से आग्रह किया कि मुझे कुछ नसीहत कर। ईश्वर ने कहा स्वयं का सम्मान कर। हज़रत मूसा ने पुनः आग्रह किया तो ईश्वर ने दोबारा कहा स्वयं का सम्मान कर। हज़रत मूसा ने तीसरी बार कहा हे ईश्वर मुझे कुछ नसीहत कर, ईश्वर ने कहा अपनी मां का सम्मान कर। मूसा ने पुनः वही आग्रह किया तो ईश्वर ने दोहराया अपनी मां का सम्मान कर। मूसा ने फिर कहा हे ईश्वर मुझे नसीहत कर, इस बार ईश्वर ने कहा अपने पिता का सम्मान कर।

ईश्वर ने दो बार हज़रत मूसा से स्वयं उनके संबंध में सिफ़ारिश की, उसके बाद दो बार अपने दूत से मां के बारे में सिफ़ारिश की, अंत में एक बार पिता के बारे में सिफ़ारिश की। ईश्वर ने मां के बारे में उतनी ही बार सिफ़ारिश की है जितनी स्वयं मनुष्य के बारे में। इससे ईश्वर के निकट मां के स्थान और महत्व का पता चला है। यहां ध्यान योग्य एक अन्य बिंदु यह है कि ईश्वर ने मां के सम्मान और अधिकारों के बारे में दो बार सिफ़ारिश की है, जबकि बाप के बारे में केवल एक बार। इससे स्पष्ट होता है कि मां का स्थान और दर्जा बाप के स्थान से भी ऊंचा है। 

ईश्वर हज़रत मूसा को संबोधित करते हुए कहता है कि हे मूसा यह ध्यान रखना कि मां की ख़ुशी में ही मेरी ख़ुशी है और मां की नाराज़गी में मेरी नाराज़गी। अर्थात जब कभी भी कोई यह जानना चाहे कि क्या ईश्वर हमसे ख़ुश है या नहीं, तो ईश्वर ने इसके लिए मां को पैमाना क़रार दे दिया है। अब इंसान अपनी मां को देख ले कि वह उससे ख़ुश है या नहीं। अगर मां ख़ुश है तो ईश्वर भी ख़ुश और अगर मां नाराज़ है तो ईश्वर भी नाराज़। ईश्वर की नाराज़गी के परिणाम से तो हर कोई अवगत है।

ईश्वरीय दूत हज़रत मूसा (अ) के काल में बनी इस्राईल समुदाय में एक युवक अनाज का व्यापार करता था। वह एक सभ्य और सुशील लड़का था। हर दिन की भांति वह एक दिन अपनी दुकान में बैठा हुआ था। उसके पास एक व्यक्ति आया और उसने बड़ी मात्रा में उससे गेंहू ख़रीदने का सौदा किया। यह सौदा उस युवा व्यापारी के लिए काफ़ी लाभदायक था। युवा जब उस व्यक्ति को गेंहू देने के लिए भंडार पर पहुंचा तो देखा कि भंडार का द्वार बंद है और उसके पिता किवाड़ों से टेक लगाकर सो रहे हैं। यह युवा क्योंकि अपने मां-बाप का बहुत सम्मान करता था, इसलिए उसने ग्राहक से कहा, दुर्भाग्यवश मैं तुम्हें अभी गेंहू नहीं दे सकता। तुम्हें थोड़ी प्रतीक्षा करना होगी इसके लिए मैं तुम्हें मूल्यों में कुछ छूट भी दे सकता हूं। अगर तुम प्रतीक्षा नहीं कर सकते तो कृप्या करके कहीं और से गेंहू ख़रीद लो।

ग्राहक ने कहा, मैं तुम्हारे गेंहू की क़ीमत बढ़ाकर दे सकता हूं, इसलिए टाल मटोल मत करो और अपने पिता को जगा दो, और गेंहू मेरे हवाले कर दो। युवा ने कहा कि मैं कदापि अपने पिता को नहीं जगाऊंगा, पिता का आराम मेरे लिए इस सौदे के लाभ से कहीं अधिक मूल्यवान है। ग्राहक के आग्रह के बावजूद युवा ने उसकी बात स्वीकार नहीं की और अंततः ग्राहक सौदा समाप्त करके वहां से चला गया।

कुछ देर बाद जब बाप सोकर उठा तो उसने देखा कि बेटा निकट ही टहल रहा है। उसने कहा, बेटे इस समय दुकान बंद करके तुम यहां क्या कर रहे हो? युवक ने अपने पिता को पूरी कहानी सुनाई। बाप यह सब सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और ईश्वर का आभार जताते हुए कहा, हे ईश्वर मैं तेरा आभारी हूं जो तूने मुझे ऐसा शिष्टाचारी बेटा दिया है। पिता ने अपने बेटे से कहा, अगर तुम मुझे नींद से उठा देते तो भी मैं नाराज़ नहीं होता, इसलिए कि इस प्रकार काफ़ी बड़ा लाभ हाथ से निकल गया। लेकिन क्योंकि तुमने इतनी विनम्रता दिखाई और अपने बूढ़े बाप का इतना सम्मान किया है, इसलिए मैं उस लाभ के बदले में तुम्हें अपना बछड़ा उपहार में देता हूं। मुझे आशा है कि ईश्वर इस बछड़े के द्वारा तुम्हें बड़ा लाभ पहुंचाएगा, जो उन समस्त युवाओं के लिए एक सबक़ होगा जो अपन मां-बाप का सम्मान करते हैं।

दूसरी ओर एक दूसरे इलाक़े में बनी इस्राईल समुदाय के एक परिवार में एक सुन्दर और सुशील लड़की थी। उसकी भद्रता, सुन्दरता और सुशीलता को देखते हुए उससे शादी के लिए काफ़ी संदेश आ रहे थे। लड़की के दो चचेरे भाई भी उससे शादी के इच्छुक थे। उन दोनों में से एक उदार और सभ्य था, लेकिन उसके पास कोई धन दौलत नहीं थी। इसके विपरीत उसके चचेरे भाई के पास काफ़ी दौलत थी, लेकिन वह अभद्र, असभ्य और अशिष्ट था। ईश्वरीय दूत हज़रत मूसा का मित्र और अनुयाई होने का केवल दिखावा करता था। लड़की ने विवाह के समस्त रिश्तों को ठुकराते हुए इन दोनों में से किसी एक से शादी का निर्णय लिया और एक सप्ताह का समय मांगा ताकि इन दोनों में से किसी एक का अपने जीवन साथी के रूप में चयन कर सके।

 

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Sep १८, २०१६ १५:४८ Asia/Kolkata
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