इस्लाम में मां-बाप के आदर और अधिकारों के विषय पर हमारी चर्चा जारी है।

यह विषय इस्लाम में इतना अधिक महत्वपूर्ण है कि पवित्र ईश्वरीय किताब क़ुरान में और अंतिम ईश्वरीय दूत पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों के कथनों में मां-बाप के आदर एवं सम्मान पर अत्यधिक बल दिया गया है।

पैग़म्बरे इस्लाम और उनके उत्तराधिकारी मासूम इमामों ने जहां मां-बाप का आदर करने और उनकी सेवा करने में व्यवहारिक आदर्श प्रस्तुत किया है, वहीं अपने मूल्यवान कथनों द्वारा इसके महत्व को उजागर किया है। कार्यक्रम की पिछली कड़ी में मां-बाप के लिए हमने इमाम अली इब्नुल हुसैन ज़ैनुल आबेदीन (अ) की अति सुन्दर एवं शिक्षाप्रद दुआ का उल्लेख किय था। हर संतान को यह दुआ करनी चाहिए और इसका गहन अध्ययन करना चाहिए। निःसंदेह मां-बाप के अधिकारों और उनके प्रति संतान के कर्तव्य के संदर्भ में यह संपूर्ण इंसाइक्लोपीडिया है। 

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) इंसान का ध्यान इस महत्वपूर्ण वास्तविकता की ओर खींचते हैं कि संतान को हमेशा मां द्वारा अपनी संतान के पालन-पोषण के लिए सहन की गई कठिनाईयों के लिए उसका आभारी रहना चाहिए और अपनी योग्यता, प्रतिभा एवं शक्ति के लिए सदैव उसका शुक्रगुज़ार होना चाहिए।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) मां-बाप को इंसान के लिए सबसे बड़ी ईश्वरीय अनुकंपा बताते हुए फ़रमाते हैं, तुम देखो कि क्या मां-बाप से अच्छी कोई और अनुकंपा है?

ईश्वर के निकट मां-बाप की सेवा और उनके आदर का महत्व इतना अधिक है कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन के अनुसार, पैग़म्बरे इस्लाम (स) की सेवा में एक व्यक्ति उपस्धित हुआ और उसने कहा, हे ईश्वरीय दूत, कोई ऐसा गुनाह नहीं है जो मैंने नहीं किया है। क्या सही रास्ते पर मेरी वापसी संभव है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने फ़रमाया, क्या तुम्हारे मां-बाप में से कोई जीवित है? उसने उत्तर दिया, मेरे पिता जीवित हैं। पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, जाओ और उनकी सेवा करो। जब वह व्यक्ति चल गया तो पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने साथियों से कहा, काश उसकी मां जीवित होती। ईश्वरीय दूत पैग़म्बरे इस्लाम (स) के इस कथन से स्पष्ट हो जाता है कि वे मां-बाप की सेवा और उनके आदर के महत्व पर कितना अधिक बल देते थे। जब इंसान बुराईयों के ग़र्त में गिर जाए और उसे हर ओर से निराशा का अँधकार घेरले, तो ऐसी स्थिति में पैग़म्बरे इस्लाम आशा की एक किरण जगाते हुए मां-बीप की सेवा पर बल देते हैं। विशेष रूप से इस बिंदु की ओर संकेत करते हैं कि ईश्वर के निकट मां की सेवा का इतना अधिक महत्व है कि अगर उसकी सेवा के साथ ईश्वर से अपने पापों की क्षमा मांगी जाएगी तो ईश्वर उसे कदापि रद्द नहीं करेगा।

एक अन्य स्थान पर पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं, दरिद्र है वह व्यक्ति, दरिद्र है वह व्यक्ति, दरिद्र है वह व्यक्ति जिसके बूढ़े मां-बाप में से कोई एक जीवित हो, इसके बावजूद वह स्वर्ग से वंचित रहे। पैग़म्बरे इस्लाम मां-बाप विशेष रूप से बूढ़े मां-बाप की सेवा का प्रतिफल स्वर्ग क़रार देते हैं और ऐसे लोगों को अभागा बताते हैं, जिनके जीवन में बूढ़े मां-बाप में से कोई एक जीवित हो, उसके बावजूद वह अपने कुकर्मों के कारण एवं बूढ़े मां-बाप की उपेक्षा करके नरक को अपना स्थायी  स्थान बना ले।

एक अन्य स्थान पर पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने मां-बाप की सेवा के महत्व का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया है कि यह कोई मजबूरी में उठाया जाना वाले क़दम या धर्म एवं समाज की ओर से थोपा गया फ़ैसला नहीं है, बल्कि यह ऐसा काम है जिसमें अच्छे से अच्छे प्रतिफल एवं पुण्य के साथ जीवन का वास्तविक आनंद है। पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं, जीवन का आनंद, मां-बाप की सेवा में है।

इंसान जीवन भर झूठे एवं अस्थायी आनंद के पीछे भागता रहता है, जबकि वास्तविक एवं स्थायी आनंद आत्मिक आनंद है, जो ईश्वर की इबादत, अच्छे कार्यों और मां-बाप की सेवा से ही प्राप्त हो सकता है। इसलिए मां-बाप को कदापि बोझ नहीं समझना चाहिए बल्कि उनके अस्तित्व को ईश्वरीय अनुकंपा समझते हुए उनकी सेवा का आनंद उठाना चाहिए।

इस संदर्भ में पैग़म्बरे इस्लाम (स) का एक और बहुत ही सुन्दर एवं व्यापक कथन है कि ईश्वर ने चार चीज़ों को चार चीज़ों में रखा है। ज्ञान की प्राप्ति को गुरू के सम्मान एवं आदर में, ईमान की रक्षा को ईश्वर के सामने नतमस्तक होने में, जीवन के सुख और आनंद को मां-बाप की सेवा में और नरक की आग से बचने को लोगों को नहीं सताने और उनके साथ दुर्व्यवहार न करने में, जो कोई उपकार नहीं करेगा, वह जीवन का सुख प्राप्त नहीं कर सकेगा।       

पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने एक दो बार नहीं, बल्कि अनेक बार मां-बाप के साथ भलाई और उनके आदर पर बल दिया है और इस अच्छे काम के महत्व को भी उजागर किया है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने इस भलाई के पीछे के तर्क को भी स्पष्ट कर दिया और इसके प्रतिफल का भी उल्लेख कर दिया।

वे फ़रमाते हैं, मैं उपस्थित लोगों को और प्रलय तक इस दुनिया में जन्म लेने वालों की नसीहत करता हूं कि अपने मां-बाप के साथ भलाई और उनकी सेवा करो, यद्यपि मां-बाप तक पहुंचने के लिए दो वर्ष तक की यात्रा क्यों न करना पड़े, इसलिए कि मां-बाप की सेवा धार्मिक शिक्षाओं में से है।

पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं कि ईश्वर ने तुम्हारी मांताओं के बारे में तीन बार और पिताओं के बारे में दो बार सिफ़ारिश की है। अपने पिता के साथ अच्छे रिश्ते को सुनिश्चित करो और उनसे संबंध न तोड़ो, क्योंकि अगर ऐसा किया तो ईश्वर तुम्हारे जीवन का प्रकाश बुझा देगा। एक अन्य स्थान पर फ़रमाते हैं, सबसे बड़ा पाप अनेकेश्वरवाद, किसी इंसान की जान लेना, मां-बाप के साथ दुर्व्यवहार करना और झूठी गवाही देना है।

इस्लामी शिक्षाओं में मां-बाप के अनेक भौतिक एवं आध्यात्मिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है। सर्वप्रथम मां-बाप के जीवन को सुरक्षित रखने पर बल दिया गया है। उन्हें किसी भी तरह की हानि पहुंचाने से रोका गया है। उनके साथ दुर्व्यवहार करने, उन्हें शारीरिक या मानसिक नुक़सान पहुंचाने और उनकी हत्या को महा पाप और ईश्वर की अनुकंपाओं की सबसे बड़ी अवहेलना क़रार दिया गया है।

मां-बाप का एक अन्य अधिकार उनके साथ शिष्टाचार है। यद्यपि विभिन्न संस्कृतियों में शिष्टाचार की शैली और परम्परायें विभिन्न प्रकार की होती हैं, लेकिन मानवीय सिद्धांत कि जो हर जगह एक प्रकार से लागू होते हैं और किसी भी जगह एवं संस्कृति में इनका पालन किया जा सकता है, वह इस प्रकार से हैं कि प्रत्येक संस्कृति के अनुसार मां-बाप के साथ अच्छा व्यवहार किया जाना चाहिए और उनके साथ बातचीत में स्वर धीमा, मीठा, विनम्रतापूर्ण एवं सम्मानजक होना चाहिए।

मां-बाप के साथ प्रेम और मोहब्बत के साथ पेश आना चाहिए। पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं कि मां-बाप की ओर संतान की मोहब्बत भरी निगाह, इबादत है। संतान की एक सामान्य सी निगाह, जिसमें प्यार और स्नेह होता है, मां-बाप की प्रसन्नता का कारण बनती है। मां-बाप की प्रसन्नता में ईश्वर की प्रसन्नता है और ईश्वर की प्रसन्नता, इबादत है। शिष्टाचार के अन्य उदाहरणों में मां-बाप को उनका नाम लेकर नहीं पुकारना, उनके आगे नहीं चलना, उनके सामने और पीठ के पीछे नहीं बैठना और उनके आने पर खड़े होकर उनका स्वागत करना और उन्हें सबसे उचित स्थान पर बैठाना है।

एक व्यक्ति ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) से पूछा कि बेटे पर पिता किया अधिकार है। पैग़म्बर ने जवाब दिया, बाप को नाम लेकर न पुकारे, उसके आगे न चले, उससे पहले न बैठे और उसकी बदमानी का कारण न बने।

एक दिन इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) एक रास्ते से गुज़र रहे थे, उन्होंने देखा कि एक बेटा अपने बाप के आगे आगे अकड़कर चल रहा है, जैसे ही इमाम ने यह देखा तेज़ी से आगे बढ़कर उस युवक के निकट पहुंचे और फ़रमाया, हे बेटा, जान लो कि तुम जो अपने बाप से तीन क़दम आगे अकड़कर चल रहे हो, ईश्वर ने इसके बदले में तुम्हारी आयु से 30 वर्ष कम कर दिए हैं।

ईरान की इस्लामी क्रांति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी के पास किसी काम क लिए एक अधिकारी पहुंचा, उस अधिकारी के साथ उसका बूढ़ा बाप भी था। जब वे इमाम ख़ुमैनी के पास पहुंचे तो बेटा बाप को पीछे छोड़कर तेज़ी से इमाम ख़ुमैनी की ओर बढ़ा और जब वह उनके साथ बातचीत समाप्त कर चुका तो उसने अपने बाप का परिचय करवाया। इमाम ख़ुमैनी ने उस अधिकारी से पूछा यह श्रीमानजी आपके पिता हैं। उसने कहा हां, इमाम ख़ुमैनी ने कहा, तो तुम क्यों उनसे आगे चल रहे थे और तुमने उनसे पहले घर में प्रवेश किया। इस प्रकार इमाम ख़ुमैनी ने बेटे का ध्यान बाप के सम्मान और आदर की ओर खींचा। 

हज़रत अली (अ) फ़रमाते हैं कि अपने बाप और गुरू के सम्मान में अपने स्थान से खड़े हो जाओ, यद्यपि तुम राजा ही क्यों न हो।

संतान पर मां-बाप के अन्य अधिकारों में से उनके लिए दुआ करना और उनकी कठिनाईयों का आभार व्यक्त करना है।

इस्लामी शिक्षाओं में संतान से सिफ़ारिश की गई है कि मां-बाप की वित्तीय ज़रूरतों की आपूर्ति के लिए प्रयास करे और जब किसी ज़रूरतमंद की ज़रूरत पूरी करने की बात आए तो सबसे पहले मां-बाप की ज़रूरत पूरी करे।  

 

Sep २१, २०१६ १६:०० Asia/Kolkata
कमेंट्स