सूरए इंशराह मक्के में नाज़िल हुआ।

यह क़ुरान का सूरा नम्बर 14 है। इंशराह का मतलब है विस्तार देना। इस सूरे में 8 आयते हैं।

इस सूरे में पैग़म्बरे इस्लाम पर कुछ ईश्वरीय अनुकंपाओं का उल्लेख किया गया है। विशेष रूप से इस सूरे में तीन विषयों को प्रस्तुत किया गया है। पैग़म्बर पर ईश्वरीय अनुकंपाओं का उल्लेख, पैग़म्बरे इस्लाम की समस्याओं के समाधान की शुभ सूचना, एक ईश्वर पर ध्यान और उसकी इबादत के लिए प्रोत्साहन।

पहली और दूसरी आयतों में उल्लेख है कि क्या हमने तुम्हारे सीने को विस्तृत नहीं किया, और क्या तुम्हें भारी बोझ से मुक्ति नहीं दिलायी। हदीस में उल्लेख है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, मैंने ईश्वर के समक्ष एक मांग रखी, जबकि मैं चाहता था कि यह मांग न करूं। मैंने प्रार्थना की, हे ईश्वर, तूने मेरे पूर्ववर्ती कुछ दूतों को हवा पर निंयत्रण प्रदान किया था और अन्य कुछ मुर्दों को ज़िंदा कर दिया करते थे। ईश्वर ने जवाब दिया, क्या तुम अनाथ नहीं थे, मैंने तुम्हें शरण दी। मैंने जवाब दिया, हां। उसने कहा, क्या तुम गुमनाम नहीं थे, मैंने तुम्हारा मार्गदर्शन किया। मैंने कहा हां हे ईश्वर। उसने कहा, क्या मैंने तुम्हारे सीने को विस्तृत नहीं किया और तुम्हारी पीठ से बोझ हल्का नहीं किया, मैंने कहा हां हे ईश्वर।

सूरए इंशराह पैग़म्बरे इस्लाम द्वारा अंतिम ईश्वरीय दूत होने की घोषणा के पहले वर्ष में नाज़िल हुआ था। जैसै ही पैग़म्बरे इस्लाम ने एकेश्वरवाद का आहवान किया, मक्के के अनेकेश्वरवादियों ने बड़े पैमाने पर उनका विरोध शुरू कर दिया। यह विरोध इतना अधिक और व्यापक था कि पैग़म्बरे इस्लाम को चिंता हुई कि वह इस महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी को निभा भी पायेंगे या नहीं। हालांकि समस्त ईश्वरीय दूतों को आरम्भ में इस प्रकार की समस्याओं का सामना रहा है। ईश्वर की कृपा से उन्होंने इन समस्याओं पर जीत भी हासिल की। लेकिन पैग़म्बरे इस्लाम (स) के समय की परिस्थितियां और समस्याएं कहीं अधिक कठिन और गंभीर थीं।

ईश्वर सूरए इंशराह में पैग़म्बरे इस्लाम की इन चिंताओं के उत्तर में कहता है, ईश्वरीय धर्म के प्रचार जैसे उद्देश्य तक पहुंचने के लिए कठिनाईयों को सहन करना कदापि परिणामहीन नहीं होगा। इसलिए कि ईश्वर की परम्परा के अनुसार, हर कठिनाई के बाद, आसानी है। इसका अर्थ है कि जब भी इंसान किसी पवित्र और महान उद्देश्य के लिए कठिनाईयां सहन करता है, तो यही कठिनाईयां उसके विकास के लिए नई सुविधाओं के लिए भूमि प्रशस्त करती हैं। इसलिए न सिर्फ़ समस्याओं से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि उनका स्वागत करना चाहिए।

ईश्वरीय दूत बनने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम को प्राप्त होने वाला ईश्वर का विशेष समर्थन और उनपर उसकी विशेष कृपा इस बात का उदाहरण है कि कठिनाईयों को केवल नकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इस वास्तविकता पर ध्यान रहना चाहिए कि हर कठिनाई के बाद राहत है और सफलता के द्वार खुलते हैं। इस सूरे की बाद की आयतें इसी विषय को बयान करती हैं, निःसंदेह हर कठिनाई के बाद, राहत और आसानी है।

सूरए इंशराह की चौथी आयत पैग़म्बरे इस्लाम पर ईश्वर की कृपाओं का उल्लेख करते हुए कहती है कि ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम के नाम को ऊंचा किया। समस्त साज़िशों और कोशिशों के बावजूद, आज भी पैग़म्बरे इस्लाम (स) और इस्लाम के नाम की हर ओर चर्चा है। प्रतिदिन पांच बार अल्लाह के नाम के साथ उसके पैग़म्बर का नाम मस्जिद की मीनारों से दुनिया के वातावरण में गूंजता है। इसी प्रकार ईश्वर के एक होने की गवाही के साथ उनके ईश्वरीय दूत होने की गवाही उनका नाम ऊंचा होने का सुबूत है।

पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं, जिबरईल ने मुझसे कहा, ईश्वर कहता है कि तुम्हारी महानता के लिए बस इतना ही काफ़ी है कि जब भी मेरा नाम लिया जाएगा, उसके साथ तुम्हारा नाम भी लिया जाएगा।

सूरए इंशराह की अंतिम आयतें इस बात का उल्लेख करती हैं कि हर महत्वपूर्ण कार्य के बाद, दूसरे अहम काम पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इन आयतों में सिफ़ारिश की गई है कि समस्त प्रयास ईश्वर के लिए किए जाने चाहिए। पैग़म्बर से कहा गया है कि कदापि प्रयास और प्रयत्न से पीछे नहीं हटना, हमेशा कोशिश करते रहना और हर स्थिति में ईश्वर की ओर ध्यान रखना, उसकी प्रसन्नता को अपना उद्देश्य बनाना और उसकी निकटता के लिए कोशिश करते रहना।

 

सूरए तीन क़ुरान का सूरा नंबर 95 है और यह मक्के में नाज़िल हुआ है। इस सूरे में भी आठ आयते हैं। यह सूरा इंसान के जन्म की प्रक्रिया का बारीकी से उल्लेख करता है और उसकी उत्कृष्टता एवं पतन के चरणों को बयान करता है। सूरे की शुरूआत में सौंगधों के साथ इस विषय को प्रस्तुत किया गया है और इंसान की मुक्ति और सफलता के कारणों का उल्लेख करते हुए प्रलय और ईश्वर के पूर्ण शासन के विषय के बयान के साथ ख़त्म होता है।

सूरे का नाम उसकी पहली आयत से लिया गया है और उसका अर्थ है अंजीर। जिस समय मक्के में हज़रत मोहम्मद (स) ईश्वरीय दूत बने तो उन्होंने ईश्वर की शिक्षाओं का प्रचार प्रसार करना शुरू किया। उन्होंने लोगों से ईश्वर की शिक्षाओं का पालन करने का आहवान किया और ग़लत परम्पराओं से बचने पर बल दिया। लेकिन मक्का के अनेकेश्वरवादियों ने पैग़म्बरे इस्लाम की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया और ग़लत मार्ग पर आगे बढ़ते रहे। ऐसी परिस्थिति में सूरए तीन नाज़िल हुआ और उसने ईश्वरीय धर्म की विशिष्टता एवं उसके अनुसरण के महत्व को उजागर किया और उससे मूंह फेरने वाले लोगों की आलोचना की।

पहली से तीसरी तक की आयतों में उल्लेख है, अंजीर और ज़ैतून की क़सम, और तूरे सीना की और इस शांतिपूर्ण शहर की। अंजीर और ज़ैतून दो लाभदायक एवं पोषाहार फल हैं। अंजीर को सबसे अधिक स्वर्ग के फलों की भांति माना जाता है और ज़ैतून के वृक्ष को क़ुरान में पवित्र बताया गया है।

क़ुरान के कुछ व्याख्याकारों का मानना है कि यह क़समें उन इलाक़ों की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए खाई गई हैं, जहां ईश्वरीय धर्मों ने जन्म लिया है। हज़रत नूह उस पहाड़ी इलाक़े में ईश्वरीय दूत बने जहां अंजीर के दरख़्त हैं, हज़रत इब्राहीम को यह ज़िम्मेदारी उस पहाड़ी इलाक़े में मिली, जहां ज़ैतून के अधिक दरख़्त हैं और बैतुल मुक़द्दस शहर उसके आंचल में स्थित है, इसी प्रकार सीना पहाड़ का उल्लेख है, जहां हज़रत मूसा को ईश्वरीय दूत बनाया गया और अंत में पवित्र मक्के की क़सम खायी गई है, जहां हज़रत मोहम्मद (स) पैग़म्बर बने। ईश्वर ने इन स्थानों की क़सम खायी है। इस प्रकार ईश्वर बताना चाहता है कि नूह, इब्राहीम, मूसा और मोहम्मद जैसे महान दूतों को भेजकर उसने अपने धर्म को समस्त स्थानों और इंसानों के लिए पेश कर दिया है और अंतिम ईश्वरीय धर्म इस्लाम है, जो पूर्ण है।

ईश्वर सूरए तीन में इन सौगंधों के बाद कहता है कि हमने इंसान को सर्वोत्तम सरंचना के साथ पैदा किया। यहां तक़वीम का शब्द प्रयोग किया गया है, जिसका अर्थ है संतुलित व बेहतरीन सरंचना एवं व्यवस्था, यह इस बात का संकेत है कि ईश्वर ने इंसान को हर प्रकार से संतुलित और सर्वोत्त्म रूप में पैदा किय है। बौद्धिक रूप में भी और शारीरिक रूप से भी। इसलिए कि उसे प्रकार की क्षमता प्रदान की है और उसे महानता एवं सम्मान प्रदान किया है। उसे बुद्धि प्रदान की है, ताकि वह उत्कृष्टता के मार्ग पर चल सके और ईश्वर ने अपने दूतों को इस मार्ग की ओर मार्गदर्शन के लिए भेजा है।

ईश्वर की शरीअत और ईश्वरीय दूतों की शिक्षाएं पूर्ण से इंसान की प्रकृति के अनुसार हैं, इसके बावजूद कुछ लोग ईश्वरीय धर्म को मानने से इनकार कर देते हैं और मानव प्रकृति के विपरीत, जिसका आधार ईश्वरीय सृष्टि है, क़दम उठाते हैं। ऐसे लोग भावनाओं में बह जाते हैं और भ्रष्ट धर्मों का अनुसरण करते हैं। अगली आयतों में उल्लेख किया गया है कि ईश्वर के मार्ग पर चलने के बजाए किसी और मार्ग पर चलने से इंसान अपने वास्तविक स्थान और लक्ष्य से दूर हो जाता है और जो लोग ईश्वरीय धर्म के विरोध पर आग्रह करते हैं, वे इतना आगे निकल जाते हैं कि मानवता के स्थान से गिर जाते हैं।

इस गुट के मुक़ाबले में वह लोग हैं कि जो ईश्वर द्वारा प्रदान की गई क्षमताओं और अनंत भौतिक एवं आध्यात्मिक अनुकंपाओं से भरपूर लाभ उठाते हैं और ईश्वर पर विश्वास के साथ अच्छे कर्म करते हैं, ताकि उत्कृष्टता तक पहुंच सकें और कल्याण प्राप्त कर सकें और लोक एवं परलोक में ईश्वरीय प्रतिफल हासलि कर सकें। उनके लिए मूल्यवान, स्थायी और परिपूर्ण प्रतिफल है।

सूरए तीन की सातवीं आयत में आभार व्यक्त न करने वाले इंसान को संबोधित करते हुए ईश्वर कहता है, क्या कारण है कि तू इन समस्त तर्कों के बाद भी हिसाब किताब वाले दिन को झुटलाता है। तेरा अस्तित्व और यह विशाल संसार साबित करता है कि दुनिया की चंद दिनों की ज़िंदगी, सृष्टि का अंतिम उद्देश्य हो। यह सब इससे भी विशाल और पूर्ण संसार के लिए केवल एक शुरूआत है।

यह संसार और प्रतिवर्ष वनस्पतियों का मुरझाना और खिलना, इंसान के सामने मौत और जीवन का दृश्य प्रस्तुत करता है। दूसरी ओर, सब जानते हैं कि ईश्वर हर चीज़ का ज्ञान रखता है और बहुत ज्ञानी एवं बुद्धिमानी है। उसके नियम सर्वश्रेष्ठ एवं ठोस हैं। इसलिए बुद्धि कहती है कि ईश्वरीय नियमों का पालन किया जाना चाहिए। इस वास्तविकता को इस सवाल के साथ इस तरह बयान किया गया है कि क्या ईश्वर सर्वश्रेष्ठ आदेश करने वाला नहीं है।    

 

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Oct ०२, २०१६ १६:२६ Asia/Kolkata
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