हमेशा ही हर क़बीले के सदस्यों ने अपने क़बीले के मूल्यों और परम्पराओं की विशेष रूप से सुरक्षा की है।

इसीलिए विशेष रूप से कपड़े के ऊपर विभिन्न प्रकार की कढ़ाई-सिलाई किया करते थे। रेशम की कढ़ाई एक ऐसी कला है जो दुनिया भर में पायी जाती है।

रेशम, रेशमी कीड़े द्वारा हासिल किया जाता है। रेशमी कीड़ा अपने लिए अंडाकार का घोंसला बनाता है, जिसे कोकून कहते हैं। कोकून को विशेष रूप से गर्म किया जाता है और उसके बाद उसे काता जाता है। इस प्रकार रेशम का उत्पादन होता है।

ईरान में रेशम की सिलाई-कढ़ाई उतनी ही पुरानी है, जितना रेशमी कीड़े के उत्पादन। ऐसे अधिकांश लोग कि जिनका मानना है कि रेशम चीन से ईरान पहुंचा है उनका मानना है कि रेशम की बुनाई की कला भी चीनियों द्वारा ईरान पहुंची। हालांकि प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर ईरान में रेशमी कपड़े की बुनाई चीन में रेशम की खोज से भी कई वर्ष पुरानी है। केवल संभव है कि ईरानियों ने चीनियों से एक ख़ास क़िस्म की रेशमी बुनाई सीखी हो। बहरहाल निश्चित रूप से ईरान में बहुत प्राचीन समय से कढ़ाई-सिलाई में रेशम को कच्चे माल के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है।

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ईरान में रेशम की कढ़ाई का सबसे पुराना नमूना सलजूक़ी काल अर्थात पांचवी हिजरी से संबंधित है, जो ईरान के संग्राहलय में मौजूद है। उस काल में रेशमी कढ़ाई का काफ़ी रिवाज था। इसी काल से संबंधित कुछ रेशमी कपड़े और ऐसे कपड़े जिन पर रेशमी कढ़ाई थी, शहरे रय में मिले हैं। उस काल में रेशम की कढ़ाई-सिलाई करने वाले कलाकार अपने उत्पाद के निचले भाग पर अपने नाम की कढ़ाई कर दिया करते थे।

रेशम की कढ़ाई में इस्तेमाल होने वाले डिज़ाइन विविध प्रकार के होते थे, जैसे कि जानवर, इंसान, फूल-पत्तियां, पक्षी और ज्यामितीयय चित्र। इस कढ़ाई का इस्तेमान अधिकांश रूप से सजावटी बोर्ड, वेशभूषा, पर्स, मेज़पोश, पर्दों, जानमाज़, चादरों और क़लमदान पर किया जाता है।  

रेशमी कढ़ाई में डिज़ाइन पर रेशमी धागे का इस्तेमाल किया जाता है, इस प्रकार की कढ़ाई में रंग की बहुत अहम भूमिका है। रंगों को दो प्रकार में बांटा जा सकता है, छायादार और बिना छायादार। रेशम की कढ़ाई में रंग विविध प्रकार के होते हैं, लेकिन बिना छाया के काला, सफ़ैद और भूरा रंग होता है, जिससे सुन्दर और प्राकृतिक डिज़ाइन बनता है।

रेशमी कढ़ाई में बनात, अटलस, कॉटन, लिनन, ताफ़ता और टाइट्रोन के कपड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। रेशमी कढ़ी की कई क़िस्में हैं। इसी प्रकार, विभिन्न प्रकार के फूल, पत्ते, फल और पक्षी भी बनाए जाते हैं। कुछ डिज़ाइन, कोने में और कुछ बीच में और कुछ बॉक्स के रूप में बनाए जाते हैं।

कोल कशीदाकारी ईरान की अन्य सुन्दर कशीदाकारी है। इस कला में कोल धागे को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इस धागे को सोने, चांदी, या सोने का पानी चढ़ाकर सीधी व मज़बूत या नर्म नली द्वारा आयताकार रूप में काता जाता है। इस प्रकार का धागा लचीला होता है और वह कोई भी रूप धारण कर सकता है।

इस प्रकार की कढ़ाई के नमूने मौजूद नहीं हैं। ईरानी इस प्रकार की कढ़ाई का इस्तेमाल कुर्ते के कॉलरों, सैनिकों और दरबारियों की वर्दियों और झंडों को सजाने में किया करते थे। यह कला अशकानी काल में प्रचलित थी। उस काल में ईरान से निर्यात होने वाले कशीदाकारी उत्पादों में ज़र दोज़ी और इम्ब्रोयडरी वाले कपड़े होते थे, जिनमें कोल कशीदाकारी भी शामिल होते थे।

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सासानी काल तक यह कला जारी रही यहां तक कि इस्लाम के आरम्भिक काल में, ईरानी कलाकारों ने काबे के ग़िलाफ़ पर कोल कशीदाकारी का इस्तेमाल किया, जिससे एक बार फिर इसका प्रचलन बढ़ गया और यह कला विकसित हुई। क़ुरान के छोटे सूरों या आयतों को ईरानी सुलेख के रूप में डिज़ाइन के रूप में प्रयोग किया जाता था और उस पर कोल कशीदाकारी की जाती थी, जिससे अल्लाह के घर को विशेष स्वरूप प्रदान किया जाता था।

कोल कशीदाकारी में प्रयोग होने वाले डिज़ाइन इस प्रकार हैः विभिन्न प्रकार के फूल, पैस्ले, देवदार, विभिन्न प्रकार की रेखाएं और शब्द, इंसान और जानवरों के चित्र, विभिन्न प्रकार के पक्षी विशेष रूप से मोर, अंगूर के गुच्छे, तारे और शिल्पलेख।

कोल कशीदाकारी का विभिन्न प्रकार की तख़्तियों को सजाने, वस्त्रों को सजाने, कमरबंद, जानमाज़, महंगे पर्दे, मेज़ पोश और नई दुल्हनों के कमरों की चीज़ों को सजाने के लिए किया जाता है। इस कला के केन्द्रों के रूप में इस्फ़हान, तेहरान, बंदर अब्बास, काशान, यज़्द, होर्मुज़गान और इसी प्रकार कुर्दिस्तान और क़ज़वीन का नाम लिया जा सकता है।

इस कढ़ाई में पहले काग़ज़ के ऊपर डिज़ाइन बनाया जाता है, उसके बाद कपड़े पर उसे उतारा जाता है। उसके बाद कॉटन या रेशम द्वारा डिज़ाइन को उभारा जाता है और गाठों द्वारा उसे मज़बूत किया जाता है। कोल सामान्य रूप से 5 से 25 सेमी की श्रेणी में होते हैं, उसके एक भाग को अलग करके सुई और धागे को उसमें अंदर ले जाते हैं और भीतरी भाग को उससे सीते हैं।

कोल में कढ़ाई करने वाला वास्तव में लाखों टांके लगाता है और इसमें बहुत ही ध्यान और समझबूझ की ज़रूरत होती है। जिसके परिणाम स्वरूप, यह कढ़ाई बहुत ही सुन्दर और चमकदार हो जाती है।

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मलीले ईरान की एक अन्य पारम्परिक कशीदाकारी है कि जिससे कपड़े की सुन्दरता कई गुना बढ़ जाती है और उसे ईरान के हस्तशिल्प के रूप में जाना जाता है। मलीले की कढ़ाई ऐसी कढ़ाई को कहा जाता है, जिसमें सोने, चांदी और विभिन्न प्रकार की मिश्रित धातुओं का इस्तेमाल किया जाता है और इससे कपड़े की ऊपरी सतह को सजाया जाता है। कोल धागों के विपरीत, मलीले में प्रयोग होने वाले धागे नर्म नहीं होते और अधिक खींचे जाने से इनकी असली शक्ल बदल जाती है।

मलीले की कढ़ाई के लिए, पहले से तैयार डिज़ाइन को मख़मली या ऊनी कपड़े पर उतारा जाता है। कपड़े के चारो ओर मलीले कारी की जाती है और उसे सुई और धागे से मज़बूत बनाया जाता है। उसके बाद अंदर से सिला जाता है और डिज़ाइन के अंदर मलीले के टांके लगाए जाते हैं यहां तक कि डिज़ाइन पूरा हो जाए। विशेष स्थानों पर थोड़ी सी रूई रखी जाती है और उसे कपड़े पर सादा धागे से सिल दिया जाता है और उसके बाद मलीले कारी की जाती है।

इस प्रकार की कशीदाकारी या इम्ब्रोयडरी ईरान के अधिकांश भागों में प्रचलित है। उसे सुरक्षित रखने का तरीक़ा यह है कि उसे नमी, तपिश और आग, सीधी किरणों और तेज़ धूप और व्हाइटनर से दूर रखा जाए और सादे पानी एवं सामान्य साबून से धोया जाए जिसमें कोई एसिड न हो।

इसके इतिहास का पता, खुदाई में मिलने वाले इसके नमूने हैं, जो 2500 से 3000 साल पुराने हैं। मलीले का इस्तेमाल कपड़ों को सजाने के लिए किया जाता है, उसके नमूने ईरान के पूरब में लूलान से मिले हैं। मलीले कारी और कशीदाकारी के कुछ टुकड़े खुदाई में मिले हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह अश्कानी काल से संबंधित है। इन नमूनों में एक वृक्ष का चित्र है, जिसकी टहनियां एक दूसरे से उलझी हुई हैं। यह सुन्दर कला समय के साथ साथ विकसित होती गई और कभी कभी कलाकारों ने इस कला में मोतियों का प्रयोग भी किया है।             

 

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Oct १६, २०१६ १७:०८ Asia/Kolkata
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