ईरान की हस्तलाओं में एक क़लमकारी है जिसे इसफ़हान में अन्य क्षेत्रों से अधिक लोकप्रियता प्राप्त है।

क़लमकारी सूती कपड़े पर डिज़ाइनें बनाने की कला है। वस्त्रों के उपर निश्चित पैटर्न या डिजाइन के अनुसार रंग चढ़ाने की प्रक्रिया को कपड़े की छपाई (Textile printing)  कहते हैं। एक अच्छी छपाई वह है जिसमें रंग सूत के साथ एका हो जाये ताकि घर्षण से या धुलाई करने पर भी रंग न छूटे। अब तक कपड़े की छपाई के जो नमूने मिले हैं वह ग़ज़नवी के बाद के हैं। इसी वजह से बहुत से अनुसंधानकर्ता यह मानते हैं कि इस कला की शुरुआत ग़ज़नवी काल में हुई लेकिन यह प्रबल संभावना है कि सफ़वी काल में भरपूर तरीक़े से प्रचलित थी। यही कारण था कि इस शासन श्रंखला के दौर में इसफ़हान ही नहीं बल्कि यज़्द और काशान में भी कपड़ों को इस कला से सजाया जाता था। क़लमकारी से सजे सूती कपड़े तेहरान के म्युज़ियम में रखे हुए हैं यह सफवी काल के राजाओं के कपड़े हैं। इससे भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सफ़वी काल में यह कला प्रचलित थी।

ईरान के प्रख्यात शोधकर्ता दिवंगत मुहसनि मुक़द्दम का मानना है कि सफ़वी दौर ईरान में हस्तकलाओं के पनपने और फैलने का बहुत अच्छा दौर था। उन्होंने तेहरान में जो संग्रहालय बनाया है उसमें क़लमकारी किए हुए कपड़े रखे हैं।

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सफ़वी काल में पुरुषों और महिलाओं के कपड़े क़लमकारी किए हुए होते थे और उस समय इन कपड़ो का बड़ा महत्व था। क़जारी काल में ईरानी चित्रकला में बदलाव आया जिसके तहत आम जनता के स्तर पर फैली चित्रकला के चित्र क़लमकारी में भी प्रयोग होने लगे तथा पारंपरिक, धार्मिक और शौर्य गाथाओं से जुड़े चित्र भी क़लमकारी की कला का विषय बन गए। इसी तरह क़हवाख़ानों में नज़र आने वाली क़लमकारीशुद कपड़े बनने लगे। कपड़ों के साथ ही पर्दों को भी क़लमकारी की कला से सजाया जाने लगा। इन पर्दों पर इतिहास की महान घटनाओं को क़लमकारी के माध्यम से चित्रित किया जाता था। यह पर्दे धार्मिक स्थलों पर अधिक नज़र आते थे। इसफ़हान की क़लमकारी को अन्य नगरों में भी ख्याति मिल गई और इसी शैली को दूसरी जगहों पर भी प्रयोग किया जाने लगा।

अलबत्ता इस समय क़लमकारी की जो कला प्रचलित है वह अतीत की कला से काफ़ी अलग है। पहले सूची कपड़ों पर रंग और ब्रश के माध्यम से डिज़ाइनें बनाई जाती थीं लेकिन अब डिज़ाइनें बनाने के लिए लकड़ी का प्रयोग किया जाने लगा है। लकड़ी के मोहरों की मदद से कपड़े पर डिज़ाइनें बनाई जाती हैं किसी एक मोहरे को बीच में रखकर इसी ध्रुव पर कोई आकृति तैयार कर दी जाती है। इस केन्द्रीय मोहरे को क़ालिब कहा जाता है। क़ालिब बनाने के लिए गुलाबी के पेड़ की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। गुलाबी एक फल है जो नाशपाती से बहुत मिलता है। कलाकारो का कहना था कि इस लकड़ी का क़ालिब या सांचा बहुत अच्छा बनता है क्योंकि यह लकड़ी बहुत मज़बूत होती है और टेढ़ी नहीं होती। डिज़ाइन में बने नक़्श जितने मोटे होते हैं लकड़ी तराशने का काम उतना आसान होता है और यदि आकृतियां बहुत छोटी हैं तो लकड़ी तराशने का काम बहुत मुशकिल हो जाता है। क़ालिब तैयार करने का काम क़लमकारी की कला में सबसे महत्वपूर्ण और सबसे बारीक काम होता है।

जो क़ालिब या सांचा बनाया जाता है इसके कई प्रकार हैं कुछ क़ालिब प्रेम के विषयों से संबंधित हैं जैसे युसुफ़ और जुलैख़ा का क़ालिब, या शीरीं व फ़रहाद का क़ालिब। प्राचीनी कहानियों को चित्रित करना और उनके साथ लोमड़ी, बगले या काल्पनिक पशु पक्षियों के चित्र बनाना, एतिहासिक अवशेषों जैसे पेर्सपोलीस के चित्र, कवियों या विद्वानों जैसे फ़िरदौसी और इब्ने सीना के चित्र बनाना, प्राकृतिक दृश्यों के चित्र बनान या, साज़िंदों और फूल पत्तियों के चित्र बनाना अलग अलग क़ालिबों के विषय हैं।

क़लमकारी का काम इस तरह होता है कि पहले कपड़े का चयन किया जाता है। फिर उसे अलग अलग आकारों में काट कर धोया जाता है। क़लमकारी में प्रयोग होने वाले सारे रंग वनस्पतीय होते हैं। क़लमकारी में दक्ष लोगों को वनस्तीय रंगों की बहुत व्यापक जानकारी होती है। इस तरह खनिज लवण के बारे में भी इन विशेषज्ञों का ज्ञान बहुत अधिक होता है इन की मदद से वह विभिन्न प्रकार के चमकीले रंग तैयार कर लेते हैं।

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पहला रंग काला होता है जो पृष्ठभूमिक के लिए प्रयोग किया जाता हैं। यह रंग आख़रोट के छिलके से बनाया जाता है। इसके बाद दूसरे रंगों का प्रयोग किया जाता है। ज़ाज नाम के एक पत्थर और रोनास नाम की एक वनस्पति से लाल रंग तैयार कर लिया जाता है। इसी प्रकार अनार, अंगूर सहित कई वनस्पतियों के प्रयोग से सफ़ेद, हरा और नीला रंग बनाया जाता है। वनस्पतियों तथा अन्य वस्तुओं से बनाए गए रंगों को अगल अलग क़ालिबों के माध्यम से कपड़े पर डिज़ाइनें बनाने में प्रयोग किया जाता है। रंगाई हो जाने के बाद कपड़े को धो लिया जाता है ताकि जो अतिरिक्त रंग है वह कपड़े से हट जाए और कपड़ा बिल्कुल साफ़ हो जाए। इसके बाद डिज़ाइनों वाले भागों में रंगों को मज़बूती से जमाने की प्रक्रिया शुरू होती है ताकि रंग बाद में फीका न पड़े और डिज़ाइनें अपने असली रूप में बाक़ी रहें। काम पूरा हो जाने के बाद कपड़े को नदी के किनारे रेत पर फैला दिया जाता है ताकि वह पूरी तरह सूख जाए।

अतीत काल में अधिकतर धनवान  लोग क़लमकारी किए हुए कपड़े पहनते थे और कुछ लोग तो एसे भी कपड़े पहनते थे जिनपर सोने का प्रयोग करके क़लमकारी का काम किया गया होता था। इसी तरह बहुत से शौक़ीन लोग अपने घोड़े की ज़ीन और नमदे को भी क़लमकारी की कला से सजाते थे। इसके अलावा ख़ैमे बनाने के लिए भी क़लमकारी के कलाकारों की मदद ली जाती थे। कभी कभी ख़ैमे का पूरा एक भाग ही क़लमकारी की कला से सजा दिया जाता था। जिसे पर्दे के लिए भी प्रयोग किया जाता था। शादियों और अन्य समारोहों में भी क़लमकारी किए हुए कपड़ों से समारोह के स्थान को सजाया जाता था और मेहमानों के गुज़रने के लिए बनाए गए गलियारे इन्हीं कपड़े से सजे हुए नज़र आते थे। मेज़पोश, घर और दुल्हन के कमरे को भी क़लमकारी किए हुए कपड़ों से बड़ी सुंदरता के साथ सजाया जाता था। इस समय क़लमकारी का काम कपड़ों, जानमाज़, दस्तरख़ान, पर्दे, मेज़पोश, कुर्सी के कवर, महिलाओं के पर्स और जूतों पर किया जाता है।

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बाटीक छपाई भी कपड़े की छपाई की एक विख्यात शैली है जो इंडोनेशियान, थाईलैंड, श्रीलंका, भारत और ईरान जैसे देशों में बहुत प्राचीन समय से चली आ रही है। बाटीक छपाई का अर्थ है मज़बूत छपाई। इसमें सभी रंगों और डिज़ाइनों को रंगरेज़ी की विशेष शैली के माध्यम से कपड़े तक पहुंचाया जाता है। इसके लिए रेशमी कपड़ों का प्रयोग किया जाता है। इस छपाई में कपड़े के दोनों ओर एक ही डिज़ाइन और एक ही रंग नज़र आता है। इस छपाई में प्रयोग होने वाले अधिकतर रंग भी वनस्पतियों से तैयार किए जाते हैं।

हर क्षेत्र की बाटीक छपाई वहां की परम्पराओं, रस्मों, संस्कृति और मान्यताओं को प्रतिबंबित करती है। इस छपाई से तैयार होने वाले कपड़े आम तौर पर बहुत सुंदर होते हैं। यह कपड़े अपनी सादगी के साथ ही साथ यह भी बताते हैं कि एक पुरानी परम्परा और पुरानी कला किस तरह इतना लंबा समय बीत जाने के बाद भी अपना अस्तित्व बाक़ी रखने में सफल हुई है। यह कला पूर्वजों की महानता और सौंदर्य बोध को भी दर्शाती है। इस छपाई के माध्यम से बहुत सी चीज़ें तैयार होती हैं। इस छपाई वाले कपड़ों से तरह तरह के पर्दे और वस्त्र तैयार किए जाते हैं।

बाटीक शब्द इंडोनेशियाई भाषा से फ़ार्सी में आया है। यह एसी कला है जिसका जन्म चीन में हुआ फिर वहां से यह कला भारत, मिस्र, रूस और ईरान तथा अन्य स्थानों तक पहुंची। ईरान में बाटीक छपाई की शुरुआत तबरेज़ शहर से हुई। इस कला के बहुत विख्यात कलाकार हुसैन कलाग़ची गंजीने हैं। इस समय भी यह छपाई तबरेज़ में प्रचलित है और तबरेज़ तथा उसके निकट स्थित इसकू नगर को इस छपाई का केंन्द्र माना जाता है। इस छपाई में कलाकार पहले रेशमी कपड़े को रंगते हैं जिसके बाद इसके डिज़ाइन बनाने के लिए तैयार करते हैं। कलाकार पहले तो अपने मन में डिज़ाइनें तैयार करता है फिर क़लिबों को मोम द्वारा ढांक देता है और फिर उस पर दबाव डालता है मोम कपड़े के भीतर चला जाता हैं इसके बाद कपड़े को रंग मे डाल जाता है तो जहा जहां मोम नहीं लगा है वह जग रंग उठती है। जिस जगह मोम होता है वहां रंग नहीं पहुंचता। अब यदि इस जगह को रंगना हो जहां मोम लगाया था तो दूसरे क़ालिबों का प्रयोग करना पड़ता है। बाद में भाप और गर्म पानी की मदद से मोम को कपड़े से छुड़ा दिया जाता है।

 

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Oct १६, २०१६ १७:२५ Asia/Kolkata
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