आदियात क़ुराने मजीद का 100वां सूरा है। यह मदीने में नाज़िल हुआ और इसमें 11 आयते हैं।

आदियात जागरुक करने वाली क़मसों से शुरू होता है और उसके बाद वह कुफ़्र, कंजूसी और दुनिया का लोभ जैसी इंसान की कमज़ोरियों का उल्लेख करता है और अंत में प्रलय और बंदों के बारे में ईश्वर के ज्ञान की ओर संकेत करता है।

हिजरी के आठवें वर्ष में पैग़म्बरे इस्लाम (स) को सूचना दी गई कि याबिस इलाक़े में 12 हज़ार सवार एकत्रित हो गए हैं और उन्होंने आपस में यह संकल्प लिया है कि वह हज़रत अली (अ) की हत्या करेंगे और मुसलमानों को तितर बितर कर देंगे। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपने कई साथियों को उनसे बातचीत के लिए भेजा, लेकिन उनकी बातचीत परिणामहीन रही। पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने विभिन्न साथियों के नेतृत्व में कई बार वार्ता दल भेजा, लेकिन हर बार यह बातचीत परिणामहीन रही। अंततः पैग़म्बरे इस्लाम ने उनसे लड़ाई के लिए हज़रत अली के नेतृत्व में मुसलमानों का एक दल भेजा। वे तेज़ी से दुश्मन की ओर बढ़े। रात भर यात्रा करने के बाद सुबह उन्होंने दुश्मन को घेर लिया। पहले उन्होंने उन्हें इस्लाम की दावत दी। लेकिन उन्होंने अस्वीकार कर दी। उसके बाद मुसलमानों ने उन पर हमला कर दिया और उन्हें पराजित कर दिया।

हालांकि अभी मुसलमान लड़ाके मदीने वापस नहीं लौटे थे, पैग़म्बरे इस्लाम ने सुबह की नमाज़ में आदियात सूरे की तिलावत की। नमाज़ के बाद पैग़म्बर के साथियों ने पूछा, हे ईश्वरीय दूत अभी तक हमने यह सूरा नहीं सुना था। हज़रत ने फ़रमाया, हां, अली ने दुश्मनों पर विजय प्राप्त कर ली है और जिबरईल ने यह सूरा लाकर मुझे शुभ सूचना दी है। कुछ दिन बाद हज़रत अली (अ) युद्ध में प्राप्त होने वाले माल और क़ैदियों के साथ मदीने पहुंचे।

सरपट दौड़ने वाले घोड़ों की क़सम, जो हांपते हुए आगे बढ़ते हैं। जो पत्थरों पर सुम मारकर चिंगारियां निकालते हैं। इस्लाम में जेहाद और अत्याचारियों के ख़िलाफ़ संधर्ब बहुत महत्वपूर्ण है। इस्लाम ने अत्याचार और दूसरे समुदायों को सताने से मना किया है, लेकिन इस्लाम और मुसलमानों की रक्षा को अनिवार्य और पवित्र कार्य क़रार दिया है। सत्य के मार्ग में जेहाद का इतना अधिक महत्व है कि लड़ाकों के घोड़ों की सांसों को क़सम खाने योग्य समझा गया है। जैसा कि इन आयतों में ईश्वर के मार्ग में लड़ने वाले लड़ाकों के घोड़ों की क़सम खाई गई है। ऐसे घोड़े जो रणक्षेत्र की ओर झपटते हैं और पत्थरों पर उनकी टापों से चिंगारियां निकलती हैं। उसके बाद सुबह सवेरे लड़ाकों के हमले की क़सम खाई गई है। वे इस तरह से दुश्मन पर झपटे कि चारो ओर धूल उड़ने लगी और अचानक वे दुश्मन के सामने जा खड़े हुए। उनका हमला इतना अचानक और तेज़ था कि थोड़ी ही देर में दुश्मन तितर बितर हो गए। यह तेज़ी, जागरुकता और लक्ष्य तक पहुंचने के लिए तैयार रहने का ही परिणाम है।

निश्चित रूप से इंसान अपने पालनहार के अनुकंपाओं का आभार व्यक्त नहीं करता और वह कंजूस है। यह इंसान की एक अन्य विशेषता है, जिसके लिए क़सम खाई गई है। क़ुरान में ईश्वर ने कई बार इंसान के आभार व्यक्त न करने की शिकायत की है, जो मुसीबत और कठिनाई के वक़्त ईश्वर को याद करता है, लेकिन मुसीबत के टलते ही उसे भूल जाता है। जिस इंसान की सही परवरिश नहीं हुई है और जो ईश्वरीय प्रकाश से वंचित रहा है, वह लोभ एवं कामवासना में फंस जाता है। ऐसा व्यक्ति कंजूसी करता है और आभार नहीं जताता। दिलचस्प यह है कि वह ख़ुद भी अपनी इस कमज़ोरी को समझता है। वह अपनी आतंरिक कमज़ोरियों को यद्यपि दूसरों से छिपा सकता है, लेकिन ईश्वर से अपनी अंतरात्मा को नहीं छिपा सकता। वास्तव में अधिकांश कठिनाईयों और मुसीबतों की जड़ उसके आभार व्यक्त न करने में है, परिणाम स्वरूप वह प्रलय के दिन दंड का पात्र बन जाता है और कल्याण प्राप्ति के स्थान पर पाप कमा लेता है। इसलिए केवल वह ख़ुद ही निंदा के योग्य है।

इंसान को धन से बहुत अधिक लगाव होता है। इसी अत्यधिक लगाव के कारण वह कंजूस बन जाता है और आभार जताने से बचता है। सूरए आदियात की 8वीं आयत में धन के साथ अच्छा शब्द प्रयोग किया गया है, जिससे पता चलता है कि धन और दौलत मूल रूप से कोई बुरी चीज़ नहीं है और इसे भलाई के मार्ग में इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन कंजूस इंसान धन का सही इस्तेमाल नहीं करता है, बल्कि वह स्वार्थ के लिए उसका इस्तेमाल करता है।

क़ुरान की दृष्टि में जो व्यक्ति आभार व्यक्त नहीं करता है, उसका स्थान नरक है और उसे कठोर दंड प्राप्त होगा। इसीलिए आयत में सवाल किया गया है, क्या आभार व्यक्त न करने वाला और यह कंजूस इंसान नहीं जानता है कि प्रलय के दिन समस्त उन लोगों को जो क़ब्र में हैं, पुनः उठाया जाएगा, और जो कुछ उनके सीनों में था, वह सामने आ जाएगा। उनके पालनहार को उनका, उनके कर्मों का और उनके विचारों का पूर्ण ज्ञान है और जो कार्य उन्होंने किए थे उनका बदला उन्हें मिलेगा। ईश्वर हमेशा और हर स्थिति में इंसान के भीतर और बाहर के रहस्यों को जानता है, लेकिन इस ज्ञान का असर प्रलय के दिन हिसाब किताब के वक़्त ज़ाहिर होगा। यह समस्त इंसानों के लिए एक चेतावनी है, अगर वास्तव में वे ईश्वर के ज्ञान पर विश्वास रखेंगे तो पापों से बचे रहेंगे।

क़ारेआ क़ुरान का एक सौ एकवां सूरा है। यह सूरा हिजरत से पहले मक्के में नाज़िल हुआ, इसमें 11 आयते हैं।

क़ारेआ का अर्थ कूटने और टुकड़े टुकड़े करने वाला होता है। आयत में इस शब्द से अभिप्राय प्रलय का दिन है। प्रलय के दिन समस्त ग्रहों और संसार का विनाश हो जाएगा।

सूरए क़ारेआ में मोटे तौर पर प्रलय और उससे पहले घटने वाली घटनाओं का उल्लेख है, उसके बाद स्पष्ट रूप से इंसानों को दो गुटों में बांटा गया है। एक गुट वह है ईश्वरीय तराज़ू में जिसके कर्मों का पलड़ा भारी है और परलोक में उन्हें इसका सर्वश्रेष्ठ प्रतिफल मिलेगा। एक गुट ऐसा है जिसके भले कर्मों का पलड़ा हल्का है, परलोक में उनका स्थान नरक है।

सूरए क़ारेआ की चौथी आयत में उल्लेख है कि एक ऐसा दिन कि जब लोग पतिंगों एवं तितलियों की भांति तितर बितर हो जायेंगे। पतिंगे से यहां उपमा इसलिए दी गई है, क्योंकि पतिंगे चिराग़ या आग का उस वक़्त तक चक्कर लगाते रहते हैं, जब तक कि जान नहीं दे देते, इसी प्रकार बुरे कर्म करने वाले भी ख़ुद को नरक की आग के हवाले कर देंगे। दूसरे दृष्टिकोण के मुताबिक़, पतिंगे से उपमा इसलिए दी गई है, क्योंकि प्रलय के दिन इंसान, पतिंगों की भांति परेशानी में इधर उधर चक्कर लगा रहे होंगे।

और पहाड़ धुनी हुई रंग बिरंगी रूई की भांति हो जायेंगे। क़ुरान की विभिन्न आयतों के अनुसार, प्रलय के वक़्त पहले पहाड़ अपनी जगह छोड़ देंगे और उसके बाद टुकड़े टुकड़े होकर बिखर जायेंगे, अंततः धूल एवं रूई की भांति हवा में उड़ जायेंगे। इस सूरे की पांचवी आयत में इस प्रक्रिया को रंगीन धुनी हुई रूई से उपमा दी गई है। ऐसी रूई कि जिसका केवल रंग दिखाई देता है, यह पहाड़ों की स्थिति का अंतिम चरण होगा।

बाद की आयतों में हिसाब किताब और मुर्दों के दोबारा ज़िंदा होने एवं उनके दो गुटों में बांटे जाने तथा मीज़ान का उल्लेख है, जिसमें इंसानों के कर्मों को तौला जाएगा। लेकिन मीज़ान कोई सामान्य तराज़ू नहीं है, बल्कि हर प्रकार के तौलने को कहते हैं। हदीसों के अनुसार, ईश्वरीय दूत या ईश्वरीय नियम ऐसा पैमाना या मानक हैं जिसपर इंसानों के कर्मों को तौला जाएगा। इसके अलावा, इंसान के कर्मों की विविधता को देखते हुए उसके हर कर्म को एक पैमाने पर तौला जाना चाहिए और मानकों में भी विविधता होनी चाहिए।

माज़ान के बारे में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से पूछा गया। हज़रत ने जवाब में फ़रमाया, तौलने का पैमाना वही न्याय है।

जैसा कि भले और अच्छे कर्मों का मूल्य एक समान नहीं है, हदीसों में कुछ अच्छे कर्मों पर अधिक बल दिया गया है और उन्हें प्रलय के दिन मीज़ान के भारी होने का कारण बताया गया है। लेकिन जिस व्यक्ति के अच्छे कर्मों का पलड़ा भारी होगा, वह हमेशा के लिए अनुकंपाओं का आनंद लेगा। यह जीवन इतना अधिक सुखद होगा कि मानो स्वयं सुख है और यह परलोक के जीवन की एक बड़ी विशिष्टता है। इसलिए इस दुनिया में जीवन, जितना भी सुखी हो और ख़ुशहाल होगा, फिर भी दुखों से ख़ाली नहीं होगा। केवल परलोक का जीवन है जो पूर्ण रूप से सुखी और ख़ुशहाल होगा लेकिन जिसके बुरे कर्मों का पलड़ा भारी होगा, उसका ठिकाना केवल नरक होगा, जिसमें उसे डाला जाएगा। नरक में ऐसी भड़कती हुई आग होगी जिसकी इंसान कल्पना भी नहीं कर सकता।                         

 

Oct १६, २०१६ १७:४९ Asia/Kolkata
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