सूरे होमज़ह पवित्र क़ुरआन का 104वां सूरा है और यह मक्के में नाज़िल हुआ था और इसमें नौ आयते हैं।

इस सूरे में उन लोगों की बात की गयी है जिन  लोगों ने अपने सारे प्रयास धन- सम्पत्ति एकत्रित करने में लगा दिये हैं और अपने अस्तित्व की भेंट इन्हीं चीज़ों पर चढ़ा देते हैं। उसके पश्चात यह लोग उन लोगों को गिरी हुई दृष्टि से देखते हैं जिनके पास- धन दौलत नहीं होती है और उनका मज़ाक़ उड़ाते हैं।  दूसरों में कमी ढ़ूढ़ने वाले, दूसरों की बुराई करने वाले, चुगुलखोर, दूसरों का मज़ाक़ उड़ाने वाले और धन- सम्पत्ति का भंडारण करने वाले उन लोगों में से हैं जिन्हें सूरे होमज़ह में संबोधित किया गया है। ये वे लोग हैं जिनका अंजाम पीड़ादायक होगा और बहुत ही अपमान जनक ढंग से नरक में डाले जायेंगे।

पवित्र कुरआन के कुछ व्याख्याकर्ताओं का मानना है कि इस सूरे की आयतें वलीद बिन मुग़ैरह के बारे में नाज़िल हुई हैं जो पैग़म्बरे इस्लाम की पीठ पीछे बुराई करता था और सामने भी उनका मज़ाक उड़ाता और उन पर कटाक्ष करता था जबकि कुछ व्याख्याकर्ताओं का मानना है कि इस सूरे की आयतें अख़नस बिन शरीक़, उमय्या बिन ख़लफ़ और आस बिन वाएल जैसे अनेकेश्वरवादियों के बारे में हैं परंतु इस बात को ध्यान में रखना चाहिये कि यह आयतें उन समस्त लोगों के बारे में हैं जिनके अंदर ये विशेषताएं पाइ जाती हैं।

सूरे होमज़ह की पहली से तीसरी आयत में महान ईश्वर कहता है धिक्कार हो हर उस बुराई करने वाले पर जिसने धन संचित किया और उसकी गणना की। वह सोचता है कि उसका धन उसे अमर बना देगा।“

होमज़ह, हम्ज़ शब्द से बना है जिसका अर्थ टूटना है और चूंकि दूसरों में कमी ढ़ूढने वाले और बुराई करने वाले दूसरों के व्यक्तित्व को तोड़ देते हैं इसलिए उन्हें होमज़ा कहा गया है। लोमज़ा का अर्थ भी दूसरों की बुराई करना और कमी ढ़ूढ़ना है। पवित्र कुरआन के कुछ व्याख्याकारों का मानना है कि यह आयत उन लोगों के लिए चेतावनी है जो दूसरों की बुराई करते हैं और चुगली करके लोगों में द्वेष, दुश्मनी और ईर्ष्या का बोज बोते हैं। इसी प्रकार यह आयत उन लोगों के लिए चेतावनी है जो लोगों की बुराई ज़बान या हाथों और आंखों के इशारे से करते हैं या लोगों पर आरोप लगाते या उन पर कटाक्ष करते हैं।

इस आयत के अनुसार धन संचित करने का एक नुकसान यह है कि ऐसा करने वाला व्यक्ति दूसरों को गिरी हुई दृष्टि से देखता है। तो जिस इंसान के पास अधिक संपत्ति हो उसे धन- दौलत के धोखे में नहीं आना और उस पर घमंड नहीं करना चाहिये।

दूसरों में कमी ढूंढ़ना एक नैतिक बुराई है और पवित्र कुरआन की विभिन्न आयतों में इस चीज़ से मना किया गया है और कमी ढूंढ़ने वाले की आलोचना की गयी है। इंसान की सोच चाहे अच्छी हो या बुरी वह स्वयं और दूसरों पर प्रभाव डालती है। दूसरों के अंदर कमी ढूंढ़ना भी एक नैतिक रोग है और उसका स्वयं इंसान और दूसरों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उसका एक दुष्परिणाम स्वयं उस व्यक्ति का अपमानित होना है जो दूसरों के अंदर दोष ढूंढ़ता है। महान ईश्वर के निकट मोमिनीन प्रतिष्ठित व सम्मानीय हैं और वह इस बात की अनुमति नहीं देता है कि कुछ ईर्ष्यालु और बुरे लोग उसके बंदों की प्रतिष्ठा से खिलवाड़ करें। अतः ऐसा करने वालों को परलोक में दंड देने के अतिरिक्त वह इसी दुनिया में अपमानित करेगा। हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम के हवाले से फरमाते हैं” मोमिनीन की ग़लतियों को मत ढूंढ़ो क्योंकि जो भी अपने भाई की गलतियों की खोज में रहेगा ईश्वर उसकी गलतियों की खोज में रहेगा और जिसकी ग़लती की खोज में ईश्वर रहे तो वह उसे अपमानित करके छोड़ेगा यद्यपि वह अपने घर के अंदर ही क्यों न रहे।“

कुल मिलाकर पवित्र कुरआन ने अपनी शिक्षाओं के एक भाग को इसी बात से विशेष किया है और उसने लोगों को दूसरों में कमी ढूंढ़ने से मना किया है। इस आधार पर दूसरों में कमी ढ़ूढ़ने से विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले नुकसान पर ध्यान दिया गया है। पवित्र कुरआन दूसरों की बुराई करने, मज़ाक उड़ाने, झूठ बोलने, कंजूसी और अज्ञानता जैसी नैतिक बुराइयों की ओर संकेत करता है और उसने इंसान का आह्वान किया है कि वह इन बुराइयों से मुकाबला करके अपने अंदर से इनका अंत कर दे। अलबत्ता यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि पैग़म्बरों, मासूमों और ईश्वरीय दूतों के अलावा शायद ही कोई ऐसा इंसान मिले जिसके अंदर दूसरों में बुराई ढूंढ़ने की बुराई न हो परंतु महत्वपूर्ण बात यह है कि इंसान को चाहिये कि वह अपनी कमियों को अच्छी तरह पहचाने और पूरी गम्भीरता से उन्हें दूर करने का प्रयास करे।

 

“फील” पवित्र कुरआन का 105वां सूरा है। यह सूरा मक्के में नाज़िल हुआ था और इसमें पांच आयते हैं। सूरे फील एक महत्वपूर्ण इतिहासिक घटना की ओर संकेत करता है। उस चकित कर देने वाली इतिहासिक घटना में महान ईश्वर ने ख़ानये काबा को अबरहा और हाथियों की उस सेना से बचाया है। अबरहा और उसकी सेना ख़ानये काबा को ध्वस्त करने के लिए गये थे। इस घटना को याद दिलाना घमंडी व हठधर्मी काफिरों को एक चेतावनी है कि वे जान लें कि महान ईश्वर की शक्ति के मुकाबले में वे कुछ भी नहीं हैं। सूरे फील की आयतों का अनुवाद इस प्रकार है क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे पालनहार ने हाथी सवारों के साथ क्या किया? क्या उनके षडयंत्रों पर पानी नहीं फेर दिया? और उनके सिरों पर पक्षियों को दल- दल में भेजा ताकि उन पर कंकरिया गिरा दें तो उन्होंने उन सबको चबाये भूसे की तरह बना दिया।“

यमन का शासक ज़ू नोवास था। उसने पास में रहने वाले नजरान के ईसाईयों को कड़ी यातना दे रखी थी ताकि वह ईसाई धर्म छोड़ दें। उनमें से दूस नाम का व्यक्ति बच निकलने में सफल हो गया और उसने स्वयं को सम्राट के पास पहुंचाया जो ईसाई धर्म का अनुयाई था और उसने पूरी बात उससे बताई। इसके बाद क़ैसर ने हबशा अर्थात वर्तमान इथोपिया के शासक नज्जाशी के नाम एक पत्र लिखा कि वह ज़ूनोवास से नजरान के ईसाईयों का प्रतिशोध ले। नज्जाशी ने अरयात नाम के व्यक्ति को सेनापति बनाकर उसके नेतृत्व में 70 हज़ार की सेना यमन रवाना की। अबरहा भी इस सेना का एक कमांडर था। यमन के शासक ज़ूनोवास और अरयात की सेना के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में ज़ू नोवास की पराजय हुई और अरयात यमन का शासक बन गया। कुछ समय के बाद अबरहा ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया और उसे मार कर स्वयं उसके स्थान पर बैठ गया। इस बात की ख़बर नज्जाशी तक पहुंची तो उसने अबरहा का दमन करने का फैसला किया परंतु अबरहा ने जल्दी से नज्जाशी के प्रति अपनी वफादारी की घोषणा कर दी। नज्जाशी ने उसे माफ कर दिया और उसे उसके पद पर बाकी रखा। इसी बीच अबरहा ने दिखावटी सेवा भाव के तहत यमन में एक सुन्दर व महत्वपूर्ण गिरजाघर का निर्माण करवाया जो अपने समय में अद्वतीय था। उसके बाद उसने अरब के लोगों को काबे का दर्शन करने से जाने से रोकने के लिए यमन में निर्मित गिरजाघर में बुलाने का फैसला किया। इसी प्रकार उसने यह भी निर्णय किया कि अरब यहीं पर हज करें ताकि लोग इस गिरजाघर का दर्शन और उसकी परिक्रमा करें।  इसी उद्देश्य से उसने हिजाज और आस -पास की अरब भूमियों व कबीलों में बहुत से प्रचारक भेजे। समस्त प्रयास के बाद भी अबरहा अरबों के ध्यान को अपने नव निर्मित गिरजाघर की ओर आकृष्ट करने में सफल नहीं हो पाया। इससे वह बहुत क्रोधित हुआ और उसने खानये काबा को ध्वस्त करने का फैसला किया। अतः इस कार्य के लिए हाथी सवारों की एक भारी सेना तैयार करके वह मक्के की ओर चल पड़ा। जब वह मक्के के निकट पहुंचा तो उसने कुछ लोगों को भेजा ताकि वे मक्का के रहने वालों के ऊंटों और सम्पत्ति को लूटें। इस दौरान अबरहा के लोगों ने हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के 200 ऊंटों को भी लूट लिया। अबरहा ने किसी को मक्का नगर के भीतर भेजा ताकि मक्का के प्रमुख व प्रतिष्ठित व्यक्ति को उसके पास ले जाया जाये। सब ने पैग़म्बरे इस्लाम के दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब की ओर संकेत किया और वह व्यक्ति हज़रत अब्दुल मुत्तलिब को अबरहा के पास ले गया। जब हज़रत अब्दुल मुत्तलिब अबरहा के पास पहुंचे तो वह बहुत प्रभावित हुआ यहां तक कि उनके सम्मान में खड़ा हो गया और उनसे पूछा कि तुम क्या चाहते हो? इस पर हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने कहा मेरे 200 ऊंटों को लूट लिया है तुम मेरे माल को लौटाने का आदेश दो। अबरहा ने आश्चर्य से कहा जब मैंने तुम्हें देखा तो तुम्हारी महानता व रोब मेरे दिल में बैठ गया किन्तु तुमने जो यह कहा मेरी नज़र में तुम छोटे हो गये और तुम 200 ऊंटों की बात करते हो किन्तु तुम काबे के बारे में क्यों बात नहीं करते हो? जबकि वह तुम्हारे और तुम्हारे पूर्वजों के धर्म से संबंधित है और मैं उसे ध्वस्त करने के लिए आया हूं। इस पर हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने कहा मैं अपने ऊंटों का मालिक हूं और इस घर का भी मालिक है जो स्वयं इसकी रक्षा करेगा। हज़रत अब्दुल मुत्तलिब की इस बात से अबरहा हिल गया और सोच में पड़ गया। हज़रत अब्दुल मुत्तलिब मक्का लौट आये और लोगों से कहा कि आस- पास के पहाड़ों पर शरण लें और स्वयं कुछ लोगों के साथ ख़ानये काबा के समीप पहुंच गये और ईश्वर से सहायता मांगी। अबरहा हाथी पर सवार होकर बहुत बड़ी सेना के साथ खानये काबा को ध्वस्त करने के लिए मक्के की ओर रवाना हो गया। इस बीच समुद्र की ओर से पक्षियों का दल पहुंच गया। उनमें से हर एक के पास तीन छोटी -छोटी कंकरियां थीं एक चोंच में और दो चंगुल में। इन पक्षियों ने वर्षा के पानी की भांति इन कंकरियों को अबरहा की सेना के सिरों पर गिरा दिया। जब कंकरियों की वर्षा अबरहा की सेना पर हुई तो वे सबके सब चबाये हुए भूसे की भांति ज़मीन पर गिर कर तबाह हो गये। कंकरियां अबरहा को भी लगीं वह घायल हो गया और उसे यमन वापस ले जाया गया और वह वहीं पर मर गया। यह महत्वपूर्ण और शिक्षाप्रद घटना 570 ईसवी में हुई। इतिहासकारों के मध्य प्रसिद्ध बात के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम उसी वर्ष पैदा हुए थे। यह घटना इस बात का कारण बनी कि उस वर्ष का नाम आमुल फील अर्थात हाथियों वाला साल रखा गया। जैसाकि कहा गया कि यह सूरा चेतावनी है संसार के समस्त घमंडी व शक्तिशाली लोगों के लिए कि वे सेना और सैनिक संसाधनों की दृष्टि से कितने ही मज़बूत क्यों न हों परंतु महान व सर्वसमर्थ ईश्वर की शक्ति के सामने असमर्थ और कुछ भी नहीं हैं। रोचक बात यह है कि शत्रु अपने समय के युद्ध के आधुनिकतम हथियार व सैनिक संसाधन का प्रयोग करता है परंतु महान ईश्वर छोटे- छोटे पक्षियों और छोटी- छोटी कंकरियों के माध्यम से शक्ति के नशे में चूर घमंडियों का का अंत कर देता है।

 

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Oct १७, २०१६ १५:०३ Asia/Kolkata
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