हमने बताया था कि अपनी उपयोगिता के कारण विश्व के बहुत से राष्ट्रों में चमड़े का प्रयोग होता आया है। 

चमड़े का प्रयोग पहले ज़माने में कवच, ज़ीन और युद्ध की पोशाकों के रूप में भी होता था।  अति प्राचीन काल में चमड़े का प्रयोग सामान्यतः युद्ध में प्रयोग किये जाने वाले शस्त्रों के रूप में होता आया है किंतु इसके अतिरिक्त भी कई रूप में चमड़े का प्रयोग किया जाता है।

चमड़े का प्रयोग जहां कुछ चीज़ों के बनाने में होता आया है वहीं किताबों की जिल्द बनाने में ईरान में इसका प्रयोग अधिक देखा गया है।  इसका मुख्य कारण यह है कि चमड़े की जिल्द लगने के बाद किताबें अधिक मज़बूत हो जाती हैं जिन्हें लंबे समय तक प्रयोग किया जा सकता ह पिछले एक हज़ार साल से ईरान में जिल्दसाज़ी का काम व्यापक स्तर पर चल रहा है।  ईरानी कलाकार शताब्दियों से जिल्दसाज़ी में जिल्दों के ऊपर विभिन्न प्रकार के आकारों को उकेरते आए हैं।  बाद में यही काम सोने पर किया जाने लगा।  सोने से लिखने का काम बहुत मंहगी किताबों या दस्तावेज़ों पर किया जाता था।

ईरान में 15वीं शताब्दी से किताबों की जिल्दों पर बड़ी सूक्ष्मता से काम करने की कला जारी है।  इस कला के अन्तर्गत जिल्दों को बहुत ही सुन्दर एवं आकर्षक ढंग से सुसज्जित किया जाता है।  इस कला को फ़ारसी में “मोअर्रक़े सूख़्त” या पच्चीकारी कहा जाता है।  यह जिल्दसाज़ी की सर्वोत्तम कला है जिसमें किताब सुन्दर भी दिखाई देती है और उसकी आयु भी बढ़ जाती है।

जिल्साज़ी का काम सामान्यतः कई पीढ़ियों से बाद वाली पीढ़ियों तक हस्तांतरित होता चला आया है।  जिल्दसाज़ी का काम करने वालों की कला के उत्कृष्ट नमूने इस समय पवित्र क़ुरआन, काव्य संग्रहों, धार्मिक पुस्तकों, एवं वैज्ञानिक और चिकित्सा की किताबों के रूप में विश्व के कई पुस्तकालयों तथा संग्रहालयों में मौजूद हैं जैसे फ्रांस का लोरो संग्रहालय और वहां का राष्ट्रीय पुस्तकाल।  लंदन का शाही संग्रहालय।  इस्तांबूल का तूपकापी संग्रहालय और तेहरान का रज़ा अब्बासी संग्रहालय आदि।

ईरानी कलाकारों द्वारा ज़िल्दों पर की गई कलाकारी को “सूख़्त” या “सूख़्ते” कहा जाता है।  इनपर बड़ी ही सूक्षम्ता से डिज़ाइन बनाए जाते हैं।  वैसे तो ज़िल्द के ऊपरी भाग पर चांदी से भी काम किया जाता है किंतु बहुत सी किताबों की जिल्दों पर सोने के पानी का काम किया जाता है।  इस कला में तबरेज़ और हेरात के कलाकारों को अधिक ख्याति प्राप्त है।  यह कलाकार किताबों की जिल्दों के ऊपर पशु-पक्षियों या प्राकृतिक दृश्यों के चित्र बनाया करते थे।

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हस्तलिखित पुस्तकों को अधिक सुरक्षित रखने के उद्देश्य से जिस चमड़े का किताब की जिल्द के लिए प्रयोग किया जाता था उसे सुन्दर एवं आकर्षक बनाने के लिए पहले धातु के फ़्रेम पर कुछ चित्र या बेलबूटों को उकेरा जाता था।  बाद में धातु वाले फ़्रेम को चमड़े के ऊपर रखकर कुछ समय के लिए दबाकर छोड़े देते थे।  बाद में जब फ्रेम को चमड़े से हटाते थे तो उसपर बना चित्र चमड़े पर उभर आता था।  इस शैली में बनाई गई जिल्दें देखने में अधिक सुन्दर लगती हैं।

चमड़े के ऊपर “सूख़्त” या “सूख़्ते” कला का प्रयोग केवल एक ही शैली में नहीं किया जाता बल्कि अपनी जानकारी के हिसाब से कलाकार दूसरे डिज़ाइन भी प्रयोग करते हैं।  सामान्यतः इन डिज़ाइनों में वास्तविक या काल्पनिक पशु-पक्षियों या दृष्यों को ही चित्रित किया जाता है।  “सूख़्त” या “सूख़्ते” कला के अन्तर्गत जिल्द के किनारे वाले हिस्सों पर सोने के पानी से नक़्क़ाशी की जाती है।

“सूख़्त” या “सूख़्ते” नामक कला सफ़वी काल में अपने चरम बिंदु पर थी।  उस काल में पवित्र क़ुरआन या हस्तलिखित दुर्लभ पुस्तकों और दस्तावेज़ों को सुरक्षित रखने के लिए इस कला का प्रयोग किया जाता था।  जिल्द के चमड़े पर चित्र उकेरने के लिए पहले तो उन चित्रों को किसी धातु या फ्रेम पर उकेरते थे।  बाद में उस फ्रेम को आग पर गर्म कर लेते थे।  जब फ्रेम पूरी तरह से गर्म हो जाता था तो चमड़े को उसपर रखकर लंबे समय तक दबाकर छोड़ देते थे।  कुछ समय के बाद जब फ़्रेम को चमड़े से हटाते थे वह वह चित्र चमड़े पर आ जाता था।  सामान्यतः किताबों की जिल्द का चमड़ा कत्थई रंग का होता था।

इसकी एक अन्य शैली यह भी है कि पहले चमड़े को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है।  बाद में उन टुकड़ों पर डिज़ाइन बनाए जाते हैं।  जब डिज़ाइन बन जाते हैं तो चमड़े के टुकड़ों को आपस में जोड़ दिया जाता है।  चमड़े के इन टुकड़ों को जोड़ते समय जिस बारीक धागे का प्रयोग किया जाता है वह भी चमड़े का ही होता है।  यह सारा काम हाथों से किया जाता है।  यही कारण है कि काम की गुण्वत्ता उच्च कोटि की होती है।  हालांकि बाज़ार में मशीनों से बनी हुई इस प्रकार की जिल्दें तो उपलब्ध हैं किंतु उनमें वह बात नहीं है जो हाथ से बनाई जाने वाली जिल्दों में होती है।

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जिल्दसाज़ी में प्रयोग होने वाली कला “सूख़्त” या “सूख़्ते” का चलर सफ़वी काल से पहले से रहा है।  उस काल में इस शैली का अधिकतर प्रयोग पवित्र क़ुरआन की जिल्दें बनाने में किया जाता था।  इस्लाम के आंरभिक काल में पवित्र क़ुरआन की आयतों को खाल पर लिखा जाता था जिनकी बहुत अधिक सुरक्षा की जाती थी।  पवित्र क़ुरआन की आयतों को सुरक्षित करने के उद्देश्य से ईरानियों ने “सूख़्त” या “सूख़्ते” नामक कला को जन्म दिया।  इस प्रकार पुरानी हस्तलिखित पुस्तकों और पांडुलिपियों को सुरक्षित किया जा सका।

सूख़्ते कला के अतिरिक्त चमड़े पर गुदाई की एक अन्य कला भी है जिसे “हक्काकी” कहा जाता है।  यह सूख़्ते कला से बहुत मिजती-जुलती है।  इस कला के अन्तर्गत धातु के क़लम से बड़ी सूक्ष्मता के साथ डिज़ाइनिंग का काम किया जाता है।

उल्लेखनीय है कि चमड़े पर नक़क़ाशी का काम तेहरान प्रांत में प्राचीनकाल से होता आ रहा है।  यह कला तेहरान से ही ईरान के दूसरे अन्य क्षेत्रों में गई है।  ईरान के भीतर तेहरान की चमड़े के उत्पाद का महत्वपूर्ण केन्द्र है।  राजधानी तेहरान और इसके इर्दगिर्द चमड़े से बनी वस्तुएं बनाने के बड़े-बड़े कारख़ाने मौजूद हैं।

  

 

Nov ०९, २०१६ १४:०२ Asia/Kolkata
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