सूरए क़ुरैश क़ुरआने मजीद का एक सौ छठा सूरा है जो मदीने में नाज़िल हुआ और इसमें चार आयतें हैं।

यह सूरा वास्तव में सूरए फ़ील का पूरक है क्योंकि दोनों ही सूरों की विषय वस्तु एक दूसरे से जुड़ी हुई है। इस सूरे में मुख्य रूप से क़ुरैश क़बीले पर ईश्वर की अनुकंपाओं का उल्लेख किया गया है और इस प्रकार उनमें ईश्वर के प्रति कृतज्ञता की भावना जगाने की कोशिश की गई है ताकि वे इस महान घर के पालनहार की उपासना करें। इस सूरे की आयतों का अनुवाद है। (हाथी वालों का दंड) इस लिए था कि क़ुरैश को (मक्के की पवित्र धरती) से लगाव हो जाए (और पैग़म्बर के आगमन का मार्ग प्रशस्त हो जाए) उनका लगाव जाड़े और गर्मी की यात्रा में है अतः उन्हें चाहिए कि (इस महान विभूति पर कृतज्ञता स्वरूप) इस घर के पालनहार की उपासना करें जिसने उन्हें भूख से बचाया और भय से मुक्ति प्रदान की।

सूरए फ़ील में हमने जाना कि यमन का शासक अबरहा हाथी सवारों की एक बड़ी सेना के साथ मक्के की ओर बढ़ा ताकि ईश्वर के घर अर्थात काबे को ध्वस्त कर दे और लोगों को उसके द्वारा निर्मित गिरजाघर की ओर आकृष्ट करे। लेकिन ईश्वर ने, पक्षियों की एक सेना के माध्यम से जिनकी चोंच में कंकर थे, अबरहा की सेना को तबाह कर दिया। सूरए क़ुरैश में ईश्वर कहता है कि हाथी वालों की सेना को इस लिए तबाह कर दिया गया ताकि क़ुरैश के लोग मक्के के प्रति आकृष्ट हों और इस्लाम के उदय का मार्ग प्रशस्त हो जाए। क़ुरैश और मक्के के सभी लोग, उस धरती के केंद्रिय महत्व और शांति व सुरक्षा के कारण वहां पर बस गए थे। हेजाज़ के बहुत से लोग हर साल वहां आकर हज करते थे और साथ ही आर्थिक एवं व्यापारिक लेन-देन भी करते थे। इस प्रकार वे उस धरती की विभिन्न विभूतियों से लाभान्वित होते थे।

ये सारी चीज़ें उस धरती की शांति व सुरक्षा के कारण थीं। अगर अबरहा और उस जैसों के हमलों से मक्के की शांति व सुरक्षा समाप्त हो जाती या काबा ध्वस्त हो जाता तो फिर कोई भी मक्के का रुख़ न करता। अलबत्ता मक्के की धरती हरी भरी नहीं थी और वहां कृषि नहीं होती थी। पशु पालन भी सीमित था और लोगों की आय का मुख्य स्रोत व्यापारिक कारवां हुआ करते थे। वे लोग सर्दियों में दक्षिण की ओर अर्थात यमन का रुख़ करते थे जहां का मौसम अपेक्षाकृत गर्म होता था और गर्मियों में वे उत्तर की ओर अर्थात वर्तमान सीरिया की ओर जाते थे जहां की जलवायु मधुर थी।

वस्तुतः यमन व सीरिया उस समय व्यापार के महत्वपूर्ण केंद्र थे और मक्का व मदीना उन दोनों को जोड़ने वाले पुल का काम करते थे। अलबत्ता क़ुरैश के लोग जितने अपराध व पाप करते थे उनके दृष्टिगत वे इतनी कृपा व विभूति के पात्र नहीं थे लेकिन चूंकि यह तय था कि उन्हीं के बीच से और उस पवित्र धरती से इस्लाम व पैग़म्बरे इस्लाम का उदय होगा इसी लिए ईश्वर ने उन्हें अपनी कृपा का पात्र बनाया था। एक ओर उसने उनके व्यापार को बढ़ा दिया और उनके जीवन के स्तर को बेहतर बनाया और दूसरी ओर अशांति व असुरक्षा को उनसे दूर कर दिया। ये सारी बातें अबरहा की सेना की पराजय से अधिक सिद्ध हो गईं। भूख व दरिद्रता की समाप्ति, आर्थिक समस्याओं का समाधान और समाज में शांति की स्थापना, ईश्वर की उपासना की भूमिका बन सकती है लेकिन क़ुरैश के लोगों ने ईश्वर की इन अनुकंपाओं का मूल्य न समझा और उसके पवित्र घर को मूर्तिपूजा का केंद्र बना दिया तथा मूर्तियों की पूजा को ईश्वर की उपासना पर प्राथमिकता दी। अंततः उन्होंने अपनी कृतघ्नता का बुरा परिणाम भी देख लिया।

सूरए माऊन क़ुरआने मजीद का एक सौ सातवां सूरा है जो सूरए क़ुरैश के बाद आया है। इस सूरे को दीन व तकज़ीब के नाम से भी याद किया जाता है। सूरए माऊन मक्के में नाज़िल हुआ है और इसमें सात आयतें हैं। इस सूरे में प्रलय का इन्कार करने वालों की विशेषताओं व कर्मों का उल्लेख किया गया है।

इस्लाम के उदय और समय बीतने के साथ साथ मुसलमानों की संख्या में वृद्धि के बाद नई परिस्थितियां अस्तित्व में आईं जिनके परिणाम स्वरूप कुछ समस्याएं भी पैदा हुईं। उदाहरण स्वरूप कुछ लोग यह सोचते थे कि ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह कहने और इस्लाम की विदित बातों का दिखावा करने से उनका ईमान सुरक्षित हो गया है और उन्हें लोक-परलोक में कल्याण प्राप्त होगा जबकि इस्लाम सिद्धांतों व आदेशों का एक समूह है। मुसलमानों को परिपूर्णता तक पहुंचने के लिए अनाथों व दरिद्रों के साथ भलाई, निष्ठापूर्ण उपासना और सद्कर्म करने चाहिए। इन परिस्थितियों में सूरए माऊन नाज़िल हुआ और उसने धर्म को झुठलाने वालों की निशानियां बयान कीं। दूसरे शब्दों में सूरए माऊन में ऐसे अवगुणों का उल्लेख है जो जिसमें भी हों उसके ईमान रहित, तुच्छ और घृणित होने का चिन्ह हैं।

ध्यान योग्य बात यह है कि कुरआने मजीद ने इन सभी अवगुणों और बुरे व्यवहार को धर्म या प्रलय के दिन को झुठलाने का परिणाम बताया है। अनाथों का अनादर, भूखों को झिड़कना, नमाज़ से निश्चेतना, दिखावा और मामूली सी चीज़ें देने में भी लोगों से असहयोग इस सूरे में वर्णित विषयों में शामिल हैं। इस प्रकार क़ुरआने मजीद कंजूस, स्वार्थी और दिखावा करने वालों की स्थिति बयान करता है जिनका न तो लोगों से रिश्ता होता है और न ही रचयिता से कोई संबंध। इन लोगों में ईमान का प्रकाश और दायित्व का आभास नहीं होता। ये न तो ईश्वर के पारितोषिक के बारे में सोचते हैं और न ही उसके दंड से डरते हैं।

इस सूरे की आरंभिक तीन आयतों में कहा गया है। क्या तुमने उसे देखा जो धर्म (और प्रलय के दिन) को निरंतर झुठलाता है? वह वही तो है जो अनाथ को हिंसा के साथ भगा  देता है और (दूसरों को) मुहताज व दरिद्र को (खाना) खिलाने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता। कुछ लोगों का कहना है कि ये आयतें अबू सुफ़यान के बारे में आई हैं जिसने एक दिन उससे कुछ मांगने वाले अनाथ को अपनी लाठी से मार कर भगा दिया था।

सूरए माऊन की चौथी और पांचवीं आयतें नमाज़ पढ़ने वालों को सचेत करते हुए आरंभ हुई हैं। इन आयतों में कहा गया है। तो धिक्कार है उन नमाज़ियों के लिए जो पालनहार से सही संपर्क न होने के कारण अपनी नमाज़ की ओर से ही निश्चेत हैं। न तो वे नमाज़ को महत्व देते हैं, न उसके समय और न ही उसे सही ढंग से अदा करते हैं। सबसे मूल्यवान उपासना नमाज़ और पालनहार से बंदे का निष्ठापूर्ण संपर्क है। अगर यह उपासना सही ढंग से और पूरी निष्ठा के साथ की जाए तो इससे लोगों के निजी व पारिवारिक जीवन और सामाजिक व्यवहार पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। क़ुरआने मजीद ने एक आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए रात की नमाज़ के बारे में कहा है कि नमाज़ क़ाएम कीजिए कि निश्चित रूप से वह मनुष्य को बुरे कर्मों और पापों से रोकती है और ईश्वर की याद अधिक बड़ी है और जो कुछ वे करते हैं उससे ईश्वर अवगत है।

क़ुरआने मजीद की शिक्षाओं में आस्था और कर्म को एक दूसरे से जुड़ा हुआ बताया गया है। इन दोनों का संबंध, पत्ते व जड़ जैसा है। जड़, ज़मीन से खाद्य सामग्री लेती है और पत्ते तक पहुंचाती है। पत्ता भी प्रकाश से आहार लेता है और जड़ तक पहुंचाता है। आस्था भी जड़ की तरह मनुष्य को कर्म के लिए प्रेरित करती है जबकि कर्म पत्ते की तरह, आस्था को मज़बूत बनाता है। दूसरे शब्दों में इस्लाम की दृष्टि में, कर्म का आधार नीयत है और वह भी निष्ठापूर्ण नीयत। हर किसी को अपने कर्म का उसी नीयत के अनुसार फल मिलेगा जिसके आधार पर उसने कर्म किया है। जो ईश्वर के लिए जेहाद करता है उसका प्रतिफल ईश्वर के ज़िम्मे है और जो कोई सांसारिक लाभ के लिए लड़ता है  उसका प्रतिफल केवल सांसारिक होता है।

सूरए माऊन की अंतिम आयत उन लोगों क बारे में है जो अन्य लोगों को माऊन से रोकते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम माऊन शब्द के बारे में कहते हैं कि यह वह ऋण है जो इंसान दूसरों को देता है। यह जीवन यापन की वस्तु भी हो सकता है जिसे उधार दिया जाए या सहायता और भले कर्म हैं जो इंसान अंजाम देता है। दूसरे शब्दों में वे लोग, अन्य लोगों को जीवन की आवश्यक वस्तुओं से रोकते हैं और यह कंजूसी और प्रलय पर ईमान न होने का एक उदाहरण है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अनुसार जो इतना कंजूस हो कि छोटी-मोटी चीज़ें भी दूसरों को न दे, ईश्वर उसे प्रलय में अपनी कृपा से वंचित कर देगा और उसे उसके हाल पर छोड़ देगा और जिसे ईश्वर उसके हाल पर छोड़ देगा उसकी स्थिति क्या होगी? यह कहने की ज़रूरत नहीं है।

 

Nov ०९, २०१६ १४:५७ Asia/Kolkata
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