Nov २१, २०१६ १४:१७ Asia/Kolkata

हमने बताया था कि इस्लामी शिक्षाओं मे मनुष्य को बहुत महत्व दिया गया है।

लोगों के जीवन की सुरक्षा को विशेष महत्व प्राप्त है।  इस्लाम किसी भी स्थिति में हत्या को वैध नहीं ठहराता।  इस्लाम हत्या को बहुत ही बुरा काम समझता है और इसकी बहुत निंदा की गई है विशेषकर निर्दोषों की हत्या को पूरी मानवता की हत्या के समान बताया गया है।  इस प्रकार इस्लाम ने अपने अनुयाइयों को किसी भी मनुष्य की हत्या से रोका है।  पवित्र क़ुरआन के सुरए माएदा की आयत संख्या 32 में ईश्वर कहता हैः इसी कारण हमने बनी इस्राईल पर अनिवार्य कर दिया कि जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के अतिरिक्त किसी अन्य कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इनसानों की हत्या कर डाली। और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो सारे इनसानों को जीवन दान किया। उसके पास हमारे रसूल स्पष्ट प्रमाण ला चुके हैं, फिर भी उनमें बहुत से लोग धरती में ज़्यादतियाँ करने वाले हैं।

अब हम इस बात की समीक्षा करेंगे कि क्यों किसी की हत्या करने को मना किया गया है।  मनुष्य के अस्तित्व में आने के समय फरिश्तों के बीच यह बात हुई थी जिसमें मनुष्यों के बीच रक्तपात को घृणित कृत्य बताया गया था।  सूरे बक़रा की आयत संख्या 30 में कहा गया है कि और याद करो जब तुम्हारे रब ने फरिश्तों से कहा कि "मैं धरती में (मनुष्य को) खलीफ़ा बनानेवाला हूँ।" उन्होंने कहा, "क्या उसमें उसको रखेगा, जो उसमें बिगाड़ पैदा करे और रक्तपात करे और हम तो तेरा गुणगान करते और तुझे पवित्र कहते हैं?" उसने कहा, "मैं वह जानता हूँ जो तुम नहीं जानते।  इसके जवाब में ईश्वर ने फ़रिश्तों से कहा था कि मैं उन वास्तविकताओं को जानता हूं जिनको तुम नहीं जानते।

इस बात से पता चलता है कि यदि फ़रिश्तों की बात सही न होती तो ईश्वर उसको स्वीकार नहीं करता। एसे में यह कहा जा सकता है कि फरिश्तों को इस बात की संभावना थी कि मनुष्य धरती पर रक्तपात कर सकता है।  यदि ध्यान दिया जाए तो पता चलता है कि हुआ भी कुछ एसा ही।  मनुष्य ने धरती पर पहुंचकर इस प्रकार के निंदनीय काम किये।  ईश्वर ने बनी इस्राईल से जो वचन लिए थे उनमें से एक, रक्तपात करने से बचना था।  सूरे बक़रा की आयत संख्या 84 में ईश्वर कहता है कि हमने तुमसे वचन लिया था कि तुम ख़ून नहीं बहाओगे।

हेज़ाज़ वासियों के लिए पैग़म्बरे इस्लाम जो पहला संदेश लाए थे उसमें भी हत्या न करने का उल्लेख मिलता है।  सूरए अनआम की आयत संख्या 151 में ईश्वर कहता हैः  कह दो, "आओ, मैं तुम्हें सुनाऊँ कि तुम्हारे रब ने तुम्हारे ऊपर क्या पाबन्दियाँ लगाई है? यह कि किसी चीज़ को उसका साझीदार न ठहराओ और माँ-बाप के साथ सद्व्यवहार करो और निर्धनता के कारण अपनी सन्तान की हत्या न करो; हम तुम्हें भी रोज़ी देते है और उन्हें भी। और अश्लील बातों के निकट न जाओ, चाहे वे खुली हुई हों या छिपी हुई हो। और किसी जीव की, जिसे अल्लाह ने आदरणीय ठहराया है, हत्या न करो। यह और बात है कि हक़ के लिए ऐसा करना पड़े। ये बाते है, जिनकी ताकीद उसने तुमसे की है, शायद कि तुम बुद्धि से काम लो।

ईश्वर के विशेष एवं उसके निकटतम दासों की विशेषता यह है कि वे अपने हाथों को दूसरों के ख़ून से रंगीन नहीं होने देते।  इस संदर्भ में सूरे फ़ुरक़ान की 68वीं आयत मे ईश्वर कहता हैः जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे इष्ट-पूज्य को नहीं पुकारते और न नाहक़ किसी जीव को जिस (के क़त्ल) को अल्लाह ने हराम किया है, क़त्ल करते है। और न वे व्यभिचार करते है, जो कोई यह काम करे तो वह गुनाह के वबाल से दोचार होगा।

मनुष्य का सम्मान करना और हत्या जैसे कार्य की निंदा वह विषय है जिसका उल्लेख सभी धर्मों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।  सारे ही धर्मों में हत्या को महापाप बताया गया है।  इस्लाम का मानना है कि हर व्यक्ति का जीवन सम्मानीय है चाहे वह मुसलमान हो या ग़ैर मुसलमान।  किसी भी मनुष्य का जीवन उससे लेने का अधिकार केवल उसी को है जिसने उसे जीवन प्रदान किया है।

किसी निर्दोष व्यक्ति की हत्या के दुष्प्रभाव उस समाज पर ही पड़ते हैं जिसमें उसकी हत्या की जाती है।  दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता हे कि हत्या के कुछ सामाजिक दुष्प्रभाव होते हैं।  इन दुष्प्रभावों में से एक यह है कि जिस व्यक्ति की हत्या की जाती है उसका पूरा परिवार सदमें में रहता है।  मरने वाला यदि कुछ लोगों का सरपरस्त है तो फिर उसके परिवार के सदस्यों को जीवन बिताने में नाना प्रकार की समस्याएं आती हैं।  एसे में अभिभावक के न होने की स्थिति में उसी परिवार के कुछ लोग ग़लत रास्ते पर चल निकलते हैं।  इसका सबसे बड़ा नुक़सान समाज को भुगतना पड़ता है।

अन्तिम ईश्वरीय धर्म के रूप में इस्लाम ने हत्या करने वाले के लिए कड़े दंड का प्रावधान कर रखा है।  इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि हत्या जैसे पाप को रोका जा सके।  वैसे तो किसी भी व्यक्ति की हत्या करना बुरा काम एवं पाप है किंतु किसी मोमिन की हत्या करना बहुत बुरा और घृणित काम है।  इस बारे में सूरे नेसा की आयत संख्या 93 में कहा जा रहा है कि और जो व्यक्ति जान-बूझकर किसी मोमिन की हत्या करे, तो उसका बदला जहन्नम है, जिसमें वह सदा रहेगा; उसपर अल्लाह का प्रकोप और उसकी फिटकार है और उसके लिए अल्लाह ने बड़ी यातना तैयार कर रखी है।

हत्यारे का पहला दंड तो नरक है जबकि दूसरा दंड उसका नरक में सदैव रहना है।  दूसरा दंड, पहले वाले दंड से अधिक ख़तरनाक है।  पहले वाले की विशेषता यह है कि कुछ समय गुज़ारने के बाद अपराधी को निजात मिल जाएगी किंतु दूसरे वाले के अन्तर्गत वह सदैव ही नरक में रहेगा जो बहुत ख़तरनाक है।  तीसरा दंड यह है कि व्यक्ति जिस समय किसी की हत्या करता है उसी समय से ईश्वर का प्रकोप उसपर पड़ने लगता है जो हत्यारे के अंत तक उसके साथ रहता है बल्कि मृत्यु के बाद भी वह उसका पीछा नहीं छोड़ता।

हत्यारे के लिए जो दंड निर्धारित किये गए हैं उनमे से एक, ईश्वर की कृपा से दूरी है जो लानत है।  इस संदर्भ में अल्लामा मु. शफी उस्मानी लिखते हैं कि लानत अरबी भाषा का एक शब्द है।  इसका अर्थ होता है ईश्वरीय अनुकंपाओं से दूरी।  हर वह व्यक्ति जिसपर ईश्वर की लानत हो वह सदा के लिए ईश्वर की निकटता से दूर हो जाता है।

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) सदैव ही लोगों के जीवन को विशेष महत्व दिया करते थे। वे हत्या और रक्तपात के प्रबल विरोधी थे।  अब्दुल्लाह बिन उमर का कहना है कि एक बार मैंने पैग़म्बरे इसलाम (स) को देखा जो काबे की परिक्रमा कर रहे थे।  वे पवित्र काबे को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि हे काबे! तू कितना आकर्षक है।  तू कितना महान है।  ईश्वर की सौगंध, मोमिन का महत्व और उसका जीवन ईश्वर के निकट अधिक महत्वपूर्ण है।

वे ग़ैर मुसलमानों की हत्या को भी कभी वैध नहीं मानते थे।  इस संदर्भ में उनका कहना है कि इस्लामी देशों में रहने वाले किसी भी ग़ैर मुस्लिम की यदि कोई हत्या करता है तो वह स्वर्ग की सुगंध तक नहीं सूंघ सकता।  सूरए अनआम की आयत संख्या 151 के एक भाग में ईश्वर कहता है किसी जीव की, जिसे अल्लाह ने आदरणीय ठहराया है, हत्या न करो।

इस प्रकार हम देखते हैं कि इस्लाम में हत्या को अति निंदनीय कार्य बताया गया है।  खेद की बात है कि उसी इस्लाम के नाम पर, जो शांति का धर्म है और जिसमें हत्या को महापाप बताया गया है, कुछ लोग उसी के नाम पर हत्याएं कर रहे हैं।  यह लोग वहाबी विचारधारा से प्रभावित हैं और पूरी दुनिया में उन्होंने उत्पात मचा रखा है।  ऐसे में हर मुसलमान का दायित्व बनता है कि वह इस इस्लाम विरोधी कार्यवाही की निंदा करे और इसे रोकने के प्रयास करे।

      

 

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