हमने उल्लेख किया था कि दाइश ख़ुद को अंतिम काल में मानवता को मुक्ति दिलाने वाला गुट मानता है।

वह ख़ुद को अंतिम मुक्तिदाता के रूप में पेश करना चाहता है। दाइश की पत्रिका दाबिक़ में इस तरह का काफ़ी प्रचार किया जाता है। दाबिक़ के दूसरे अंक में अंतिम पेज पर सही मुस्लिम के हवाले से पैग़म्बरे इस्लाम (स) की हदीस का उल्लेख किया गया कि तुम अरब प्रायद्वीप के रहने वालों से जंग करते हो और ईश्वर उसे जीत लेगा और तुम अंततः दज्जाल से युद्ध करोगे और ईश्वर उस पर जीत हासिल कर लेगा।

दाइश के प्रचारक झूठी और गढ़ी हुई हदीसों से इस गुट को संसार के मुक्तिदाता के प्रकट होने के समय से जोड़ते हैं। दाइश झूठा प्रोपैगंडा करके ख़ुद को ऐसी विचारधारा के रूप में पेश करता है कि जो शियों के बारहवें इमाम हज़रत मेहदी के प्रकट होने से मिला हुआ है, ताकि उसे अधिक धार्मिक मान्यता मिल सके और वह अधिक से अधिक लोगों को धोखा दे सके। दाइशी आतंकवादी काले झंडों वाली हदीस के आधार पर ख़ुद को उस हदीस का पात्र बताते हैं, जो काले झंडों के साथ हज़रत मेहदी का अनुसरण करेंगे। हदीस इस प्रकार हैः जब तुम ख़ुरासान की ओर से आते हुए काले झंडों को देखो तो उनके साथ हो जाना, यद्यपि बर्फ़ के ऊपर क्यों न चलना पड़े, इसलिए कि ईश्वरीय मुक्तिदाता मेहदी उनके बीच होगा।

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इसी विचार के आधार पर दाइश अबू बक्र अल-बग़दादी को मुसलमानों का ख़लीफ़ा मानता है जो हज़रत मेहदी के प्रकट होने के बाद नेतृत्व को उनके हवाले कर देगा। दाइश का मानना है कि उसके लिए लड़ने वाले आतंकवादी हज़रत के साथी हैं, जो उनके साथ काफ़िरों से लड़ेंगे। शिया और सुन्नी दोनों की किताबों में अंतिम काल में काले झंडों का उल्लेख है। हालांकि इस बारे में कि यह परचम किन लोगों के हाथ में होंगे और कब वे इन्हें लेकर निकलेंगे, विद्वानों के बीच मतभेद है। अंतिम काल से संबंधित हदीसों में काले झंडों के साथ कई आंदोलनों का ज़िक्र है, जिनमें से कुछ सही होंगा और कुछ ग़लत। जो झंडे सत्य के आधार पर आगे बढ़ेंगे, उनकी प्रशंसा की गई है और लोगों से सिफ़ारिश की गई है कि वह उनके साथ सहयोग करें। अहक़ाक़ुल हक़ नामक किताब में हज़रत अली (अ) की एक हदीस में काले झंडों की ओर संकेत किया गया है जो ग़लत मार्ग पर आगे बढ़ेंगे। इस हदीस में उनकी कुछ विशेषताएं बयान की गई हैं और उनकी निंदा की गई है। उदाहरण स्वरूप, वे हिंसक और पत्थर दिल होते हैं, वे किसी वादे और समझौते का सम्मान नहीं करते। सत्य का आहवान करते हैं लेकिन ख़ुद झूठे हैं। उनके नाम उपनामों के रूप में और शहरों के आधार पर हैं। जब उन्हें देखना तो ज़मीन पर चिपक जाना और हिलना नहीं, अर्थात उनका आहवान ग़लत है, उनसे न जुड़ना और उनकी मदद न करना।

यहां यह सवाल उठता है कि तकफीरी गुट विशेष रूप से दाइश किस आधार पर ख़ुद को हदीसों में ज़िक्र होने वाले व सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ने वाले काले झंडों का पात्र बताते हैं, जबकि हदीसों में ग़लत रास्ते पर आगे बढ़ने वाले काले झंडों का भी उल्लेख है, बल्कि ग़लत रास्ते पर आगे बढ़ने वाले काले झंडों की निशानियां, इन गुटों से विशेष रूप से दाइश में पायी जाती हैं। अंतिम काल से संबंधित हदीसों की समीक्षा प्रमाणित स्रोतों से होनी चाहिए। मनमाने ढंग से इन हदीसों की व्याख्या नहीं की जा सकती। मनमाने ढंग से व्याख्या करने की प्रक्रिया ने इस्लाम को काफ़ी नुक़सान पहुंचाया है। आज के समय में इसका उदाहरण तकफ़ीरी आतंकवादी गुट हैं, जो क़ुरआन और हदीसों की ग़लत व्याख्या करते हैं।

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तकफ़ीरी विचारकों के निकट एक महत्वपूर्ण उद्देश्य ईश्वरीय दूत पैग़म्बरे इस्लाम की शैली में ख़िलाफ़त की स्थापना करना है। अहमद इब्ने हंबल ने पैग़म्बरे इस्लाम के हवाले से एक हदीस प्रस्तुत की है, जिसमें उल्लेख किया गया है कि अत्याचारी शासक के शासन के बाद, अंतिम काल में पैग़म्बरे इस्लाम की शैली में ख़िलाफ़त की पुनः स्थापना होगी। तुम्हारे बीच ईश्वरीय दूत रहेंगे, जब तक ईश्वर चाहेगा। जब ईश्वर चाहेगा उसे उठा लेगा। उसके बाद पैग़म्बर की शैली में ख़िलाफ़त की स्थापना होगी जब तक ईश्वर चाहेगा। जब ईश्वर चाहेगा उसे भी समाप्त कर देगा। उसके बाद अत्याचारी शासक आएगा, जब तक कि ईश्वर चाहेगा। उसके बाद जब ईश्वर चाहेगा उसे उठा लेगा। उसके बाद पैग़म्बर की शैली में ख़िलाफ़त की स्थापना होगी।

तकफ़ीरियों के निकट आज का काल पूर्ण रूप से निरक्षरता और अज्ञानता का काल है, इसे ख़लीफ़ाओं और पूर्वजों की ओर पलटाना ज़रूरी है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए इस्लामी ख़िलाफ़त की स्थापना अनिवार्य है। मिस्र में तकफ़ीरियों के नेता अब्दुस्सलाम फ़रज अपनी किताब फ़रीज़तुल ग़ायबा में तलवार के ज़ोर पर इस्लामी शासन की स्थापना के बारे में लिखते हैः धरती पर ईश्वरीय नियमों की स्थापना, समस्त मुसलमानों के लिए अनिवार्य है, उसके परिणाम स्वरूप इस्लामी शासन की स्थापना भी अनिवार्य है। इसलिए कि उसकी अनिवार्यता इसके बिना पूरी नहीं होगी। इसी प्रकार, हत्याओं के बिना इस्लामी शासन की स्थापना नहीं हो सकती, इसलिए जानें लेना और हत्याएं करना भी अनिवार्य है।

जैसा कि अब्दुस्सलाम फ़रज की बातों से स्पष्ट है, ख़िलाफ़त की स्थापना के लिए तकफ़ीरी युद्ध और हत्याओं पर बल देते हैं। इसी प्रकार इससे स्पष्ट होता है कि युद्ध और हत्याओं से उनका तात्पर्य मुसलमानों से युद्ध और उनकी हत्याएं करना है न कि अन्य लोगों की। हालांकि अतीत में उनके लिए आदर्श शासन राशेदीन अर्थात चार ख़लीफ़ाओ की ख़िलाफ़त है। वर्तमान आदर्शों के विपरीत सत्ता की प्राप्ति के लिए भी वे तथाकथित जेहादी शैली अपनाते हैं, जिसका आधार सलफ़ीवाद है।

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तकफ़ीरी विचारधारा यद्यपि राशेदीन की ख़िलाफ़त को महत्वाकांक्षी शासन के रूप में पेश करती है, उससे हटकर किसी भी प्रकार के राजनीतिक परिवर्तन को स्वीकार नहीं करती। इसी कारण तकफ़ीरियों के निकट, इस्लामी देशों में वर्तमान शासन अवैध हैं। वे उन विचारों और समाधानों का विरोध करते हैं, जिसमें लोगों की कोई भूमिका होती है जैसे कि लोकतंत्र, चुनाव, शक्ति का विकेन्द्रीकरण। वे इसका विरोध करते हैं और इसे अनेकेश्वरवाद का प्रतीक मानते हैं। यही कारण है कि तकफ़ीरी नेता अबू मुसअब सूरी उन समस्त मुसलम ने को कि जो लोकतंत्र व्यवस्था में सक्रिय होते हैं, काफ़िर बताते हैं। सूरी का कहना है कि आम जेहादियों का मानना है कि डेमोक्रेटिक मुसलमान जो संसद पहुंचते हैं और मंत्रालय, कार्यपालिका या न्यायपालिका में सक्रिय होते हैं, वह काफ़िर हैं। दाइश ने इस आधार पर फ़्री सीरियान आर्मी के 1500 सुन्नी लड़ाकों को मौत के घाट उतार दिया। दाइश के अनुसार, यह फ़्री सीरियन आर्मी के साथ सहयोग कर रहे थे, जो लोकतंत्र की स्थापना पर बल देती है और यह ख़ुद उनके विद्वानों की नज़र में कुफ़्र है, इसलिए की इसका आधार सेक्यूलरिज़्म है।                           

 

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Feb ०५, २०१७ १६:२१ Asia/Kolkata
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