हमने दाइश द्वारा अपने सरग़ना अबू बक्र अलबग़दादी को ख़लीफ़ा मानने के विषय की समीक्षा की थी।

तकफ़ीरी विचारधारा इस्लाम के आरम्भिक काल में चार ख़लीफ़ाओं के शासन को महत्वकांक्षी शासन क़रार देती है और उससे हटकर किसी भी राजनीतिक व्यवस्था को स्वीकार नहीं करती। इसी कारण, तकफ़ीरी इस्लामी देशों में किसी भी शासन को औपचारिकता प्रदान नहीं करते हैं। वे लोकतंत्र, चुनाव और शक्ति के विकेन्द्रीकरण का विरोध करते हैं और इसे अनेकेश्वरवाद का प्रतीक बताते हैं। इसी आधार पर वे बग़दादी को अपना ख़लीफ़ा मानते हैं।

दाइश ने 2014 में इराक़ में व्यापक हमले करके हज़ारों लोगों का जनसंहार किया और इस देश के कई भागों पर क़ब्ज़ा कर लिया। दाइश ने इराक़ के दूसरे सबसे बड़े शहर मोसिल को अपना गढ़ बना लिया। 29 जून 2014 को मूसिल पर क़ब्ज़ा करने के बाद, दाइश ने इस्लामी ख़िलफ़ात के गठन का एलान कर दिया और अबू बक्र बग़दादी को ख़लीफ़ा घोषित कर दिया।

प्रशासनिक ढांचे की दृष्टि से दाइश का शासन, एक व्यक्ति अर्थात ख़लीफ़ा पर केन्द्रित है, जो क़ुरैश में सबसे विशिष्ट व्यक्ति माना जाता है। यही कारण है कि दाइश ने अपने ख़लीफ़ा को क़ुरैशी वंश से क़रार देने के लिए झूठे दस्तावेज़ बनाए हैं।

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ख़लीफ़ा का चयन मुजाहेदीन की एक परिषद करती है, जिन्हें शौकत कहते हैं। दाइश का प्रशासनिक ढांचा पिरामिड आकार का है। इसमें अबू बक्र बग़दादी शासन के शिखर पर स्थित है। वह संपूर्ण शक्ति संपन्न शासक है और समस्त फ़ैसले और नियुक्तियां उसी के हाथ में हैं। सैन्य और धार्मिक परिषदें उसके तहत कार्य करती हैं। बग़दादी अमीरों और कमांडरों को नियुक्त करता है और सैन्य परिषदों को आदेश देता है। उसे असीमित अधिकार प्राप्त हैं और वह किसी भी फ़ैसले को पलट सकता है। बग़दादी ने ख़लीफ़ा बनने के बाद, कुछ अमीरों की नियुक्ति की थी।

दाइश का प्रशासनिक ढांचा 6 परिषदों पर आधारित है। इनमें से प्रत्येक परिषद इराक़ के पूर्व तानाशाह सद्दाम की पार्टी के अधिकारियों की निगरानी में कार्य करती है। प्रथम परिषद सैन्य परिषद है। सैन्य परिषद दाइश की महत्वपूर्ण इकाई है। सैन्य परिषद का प्रमुख अबू अहमद अलवानी है। रिपोर्टे के मुताबिक़, इराक़ के अलअंबार प्रांत के आज़ादी अभियान में उसकी मौत हो गई। इस परिषद का महत्वपूर्ण कर्तव्य सैन्य कमान को संभालना और सैन्य कार्यवाहियों को अंजाम देना है। रक्षा, सुरक्षा और सूचना परिषद दाइश की दूसरी परिषद है। इसका प्रमुख अबू अली अलअंबारी है। वह इराक़ की पूर्व ख़ुफ़िया एजेंसी का एक अधिकारी है और दाइश के गठन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। बग़दादी की सुरक्षा और दाइश की रक्षा की ज़िम्मेदारी उसकी है। न्यायिक परिषद दाइश की तीसरी परिषद है। इस परिषद का प्रमुख अबू मोहम्मद अलआनी है। यह परिषद शरीयत और न्यायिक मामलों पर नज़र रखती है। धार्मिक समितियां इस परिषद की निगरानी में फ़ैसले करती हैं। दाइश की चौथी परिषद शूरा है। इसका प्रमुख अबू अरकान अलअमीरी है है। इस परिषद के 11 सदस्य हैं। यह परिषद दाइश प्रशासन के समस्त कार्यों की निगरानी करती है। मीडिया परिषद दाइश की पांचवी परिषद है। उसका प्रमुख अबुल असीर उमर अलअबसी है। इसके सदस्य इलैक्ट्रोनिक सूचना प्रसार की ज़िम्मेदारी संभालते हैं और जेहादी साइट चलाते हैं। दाइश की वित्तीय ज़रूरतों की आपूर्ति की ज़िम्मेदारी वित्तीय परिषद की है। दाइश ने इन 6 परिषदों के अलावा, कुछ मंत्रालयों का भी गठन किया है।

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दाइश अन्य तकफ़ीरी गुटों की भांति देशों की सीमाओं को औपचारिकता प्रदान नहीं करता है, बल्कि वह मुस्लिम उम्मा और दारुल इस्लाम कहकर मुसलमानों को संबोधित करता है। हालांकि दाइश के अनुसार, जो भी उसके विचारों से सहमत नहीं है, वह मुसलमान नहीं है। दाइश के विचारों के समर्थक अबू रूमीसा ख़िलाफ़त के बारे में कहते हैं, ख़िलाफ़त राजशाही का ही विस्तृत रूप है, जिसका गठन एक नेटवर्क के आधार पर होता है। इस प्रकार से कि इस्लामिक स्टेट के नागरिक स्वयं को रक्क़ा या फ़ल्लूजा के नागरिक नहीं कहते हैं, बल्कि वे स्वयं को एक बहुराष्ट्रीय साम्राज्य का भाग मानते हैं, जो किसी सीमा को औपचारिकता नहीं देता।

ख़िलाफ़त में देशों के बीच सीमाओं को औपचारिकता प्रदान नहीं की गई है, बल्कि दाइश के इस्लामिक स्टेट की सीमाओं का निर्धारण करता है। यही कारण है कि जो भी उनकी परिभाषा के अनुसार, दारुल इस्लाम से बाहर होगा, वह दारुल कुफ़्र में है और उसकी हत्या और उससे लड़ाई जायज़ है। इस प्रकार दाइश ने अपनी ख़िलाफ़त के लिए जो राजनीतिक मैप तैयार किया है, उसमें पश्चिमी चीन से लेकर अंडोलुसिया तक समस्त इस्लामी देश शामिल हैं।

दाइश की ख़िलाफ़त की स्थापना की घोषणा के साथ ही कुछ सलफ़ी गुटों और विशिष्ट व्यक्तियों ने बग़दादी की बैयत कर ली, लेकिन उनमें से अधिकांश लोगों ने इसका विरोध किया और इसे अवैध क़रार दिया। दाइश ने अपना आधार तकफ़ीर को बनाया है। जो कोई भी दाइश से सहमत नहीं है या उसकी थोड़ी सी भी आलोचना करता है तो वह दाइश का दुश्मन है।

इस्लाम के मतों में जिस मत से दाइश सबसे अधिक दुश्मनी रखता है वह शिया मत है। दाइश ने शिया मत को काफ़िर और अनेकेश्वरवादी क़रार देते हुए विभिन्न प्रकार के आरोप लगाए हैं। दाइश का मानना है कि शिया इस्लाम में नई भ्रांतिया या बिदअतें उत्पन्न करते हैं। बिदअत का अर्थ है कि ऐसा कार्य शुरू करना जिसका कोई प्राचीन धार्मिक आधार न हो। धर्म में बिदअत की परिभाषा में कहा गया है, धर्म में कोई नई चीज़ शामिल करना या उससे निकालना, जिसके लिए कोई धार्मिक आधार न हो। समस्त धार्मिक विद्वानों के अनुसार, बिदअत हराम है। क़ुरान में ईश्वर ने धर्म में बिदअत की निंदा की है। सूरए नहल की 116वीं आयत में ईश्वर कहता है, तुम्हें ख़ुद से झूठे ही किसी चीज़ को हलाल और किसी चीज़ को हराम नहीं कहना चाहिए, ईश्वर से झूठ को नहीं जोड़ना चाहिए, जो लोग ईश्वर पर झूठा आरोप मढ़ेंगे, उन्हें मुक्ति नहीं मिल सकेगी।

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इसी प्रकार से क़ुरान में बिदअत को परिभाषित किया गया है। जैसा कि सूरए बक़रा की 79वीं आयत में ईश्वर ने यहूदियों द्वारा ईश्वरीय किताबों में फेरबदल को बिदअत बताया है। यह बात ध्यान योग्य है कि धर्म में किसी नई चीज़ के शामिल करने को बिदअत कहते हैं, लेकिन हर नई चीज़ बिदअत नहीं है। इसलिए कि समय की ज़रूरतों के साथ इंसान के जीवन में परिवर्तन होता है, इस्लामी शरीयत में इस बदलाव पर ध्यान दिया जाना चाहिए। क्योंकि अगर हर नई चीज़ को बिदअत कहा जाएगा तो उसके परिणाम स्वरूप, समय की ज़रूरतों और शरीयत में टकराव उत्पन्न होगा। जबकि समस्त मुसलमान इसे ग़लत मानते हैं। इसलिए हर नई चीज़ बिदअत नहीं है, बल्कि बिदअत की सीमाओं के निर्धारण की ज़रूरत है। 

 

Feb १४, २०१७ १७:०७ Asia/Kolkata
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