1 मार्च सन 1890 ईसवी को जासूसी के विख्यात पात्र शरलाक होम्ज़ के पहले एडीशन का प्रकाशन किया गया।

 

1  मार्च सन 1896 ईसवी को फ़्रांसीसी भौतिकशास्त्री हेनरी बैक्युरील ने रेडिय एक्टिविटी का पता लगाया।

1 मार्च सन 1947 ईसवी को इंटरनैशनल मानीट्री फ़ंड आईएमएफ़ ने वित्तीय क्रिया प्रारंभ की।

पहली मार्च सन 1815 ईसवी को नेपोलियन बोनापार्ट के एलब द्वीप से फरार के बाद उनकी 100 दिवसीय तानाशाही आरंभ हुई। इस द्वीप में दस महीने के बाद 1815 के फरवरी महीने की 27 तारीख़ को नेपोलियन अपने एक हज़ार वफ़ादार कमांडरो और सैनिको के साथ फ़रार हो कर फ्रांस में प्रविष्ट हुए। इस प्रकार से उनके 100 दिवासीय शासन का आरंभ हुआ। वाटरलू युद्ध में 1815 ईसवी को नेपोलियन ने ब्रिटेन और प्रांस से पराजय का मुह देखा और फिर उन्हें देशा निकाला देकर सेन्ट हेलेन द्वीप भेज दिया गया जहां 6 वर्षों के बाद उनका निधन हो गया।

पहली मार्च सन 1871 ईसवी को जर्मनी से फ्रांस की खुली पराजय के बाद फ्रांस  की राष्ट्रीय संसद ने इस देश के नरेश नेपोलियन त्रितीय को अपदस्थ और राजशाही व्यवस्था को निरस्त कर दिया। जर्मनी के साथ संधि की परिस्थितियों की समीक्षा के लिए गठित की गयी की इस संसद ने यह निर्णय लेकर फ्रांस की क्रान्ति के 82 वर्षों बाद व्यवहारिक रुप से फ्रांस में राजशाही को समाप्त कर दिया।

 

सन 1789 में फ्रांस में क्रान्ति आने के बाद नेपोलियन बोनापार्ट ने पहली बार स्वयं को इस देश का सम्राट घोषित किया और उनके बाद भी कई लोग फ्रांस के नरेश बने। 1871 में राजशाही के बाद इस देश में तीसरी बार लोकतंत्र लागू हुआ।

 

पहली मार्च सन 1892 ईसवी को जापान के लेखक और साहित्यकार आकोटा गावा का राजधानी टोकियो में जन्म हुआ। उन्हें जापान के आधुनिक साहित्य के संस्थापको में गिना जाता है। उन्होने अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। 1927 ईसवी में उनका निधन हो गया।

 

पहली मार्च सन 1898 ईसवी को दक्षिणी अमरीका के उत्तर में स्थित एटलांटिक महासागर के पोर्टोरीको द्वीप में स्पेन ओर अमरिका के मध्य युद्ध समाप्त हो जाने के बाद अमरीकी आक्रमणकारियों का अधिकार स्थापित हो गया। 1493 ईसवी में पुर्तगाल के विख्यात नाविक क्रिस्टोफर कोलम्बस ने इस द्वीप लगाया था। अमरीका ने इस द्वीप को अपने आधिकार में लेने के बाद इस अपने हथियार गोदाम में परिवर्तित कर दिया। इस प्रकार से कि यहॉं अमरीका के 13 सैनिक ठिकाने बन गये। 

 

 

 

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10 इसफ़ंद सन 1357 हिजरी शम्सी को ईरान की इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी पवित्र नगर कुम पहुंचे। 15 ख़ुर्दाद सन 1342 हिजरी शम्सी को जनता के रक्तरंजित प्रदर्शन के बाद 1343 हिजरी शम्सी में तत्कालीन अत्याचारी शासक शाह ने इमाम ख़ुमैनी को देशनिकाला दे दिया। उन्होंने 14वर्ष देश से बाहर बिताने के बाद 12बहमन सन 1357 हिजरी शम्सी को अपने देश ईरान में प्रवेश किया। और इस्लामी क्रान्ति को सफलता तक पहुंचाया। इसके बाद वे कुम नगर पहुंचे और वहॉ अपने साधारण से आवास में रहने लगे। किंतु बाद में प्रशासनिक आवशयकताओं के दृष्टिगत उन्हें तेहरान आकर रहना पड़ा।

 

10 इसफ़ंद सन 1366 हिजरी शम्सी को इराक़ के अतिक्रमणकारी शासन के थोपे गये युद्ध के दौरान ईरान के मुकाबले में विभिन्न मोर्चों पर पराजय के बाद इराक़ ने ईरान की राजधानी तेहरान के आवासीय क्षेत्रों पर मीसाइल बरसाना आरंभ कर दिया। इस अमानवीय कार्यवाही में सैकड़ों आम नागरिक शहीद और घायल हुए। इराक़ ने ईरान के विरुद्ध अपने अतिक्रमण के आरंभ से ही आवासीय क्षेत्रों पर बम्बारी की और राकेट बरसाए। तेहरान पर सद्दाम के मीज़ाइल आक्रमण वस्तुतः आवासीय क्षेत्रों पर आक्रमण का चौथा चरण था। इराक़ ने ईरान के विरुद्ध अपने युद्ध में आवासीय क्षेत्रों पर बर्बरतापूर्ण बम्बारी की और मीज़ाइल आक्रमण किए। यात्री विमानों तथा समुद्री जहाज़ों को निशाना बनाया किंतु इराक़ को हर मोर्चे पर पराजय ही मिली।

 

10 इसफ़ंद सन 1359 हिजरी शम्सी को इस्लामी कान्फ्रेन्स संगठन ओआईसी ने जिसका वर्तमान नाम इस्लामी सहयोग संगठन है, ईरान और इराक़ के मध्य युद्ध रुकवाने के लिए अपनी एक कमेटी को तेहरान और बग़दाद के दौरे पर भेजा। सदभावना का संदेश लेकर तेहरान और बग़दाद का दौरा करने वाली इस कमेटी ने शांति के लिए अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया जिसमें दोनों देशों की अखंडता के सम्मान, शक्ति के बल पर एक दूसरे के क्षेत्रों पर क़ब्ज़े के विरोध, सेनाओं की युद्ध आरंभ होने से पहले की पोज़ीशनों पर वापसी तथा अरवंद नदी के प्रयोग के तरीक़ो के सुझाव शामिल थे। ईरान ने कहा कि शांति के लिए वह हर तार्किक एवं न्यायसंगत प्रस्ताव का स्वागत करता है किंतु इराक़ की सद्दाम सरकार ने, जिसने वर्ष 1980 में ईरान पर आक्रमण करके यह युद्ध आरंभ किया था, संधि प्रस्ताव भी स्वीकार करने से इंकार कर दिया।

ओआईसी की सदभावना कमेटी कई दौरों और अनेक प्रयासों के बाद अंततः 20 आबान सन 1365 में सऊदी अरब के जद्दा नगर में दम तोड़ गई।

 

   

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12 जमादिस्सानी सन 643 हिजरी क़मरी को मिस्र के विख्यात धर्मगुरु शब्दकोष विशेषज्ञ और कुरआन के विवरणकर्ता अबुल हसन अली बिन अब्दुस्समद शाफ़ेई का निधन हुआ। वे मिस्र के सख़ा नामक क्षेत्र में जन्में थे। इसी लिए वे सख़ावी के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। उन्होंने उच्चस्तरीय शिक्षा के लिए दमिशक़ की यात्रा की और वहीं रहने लगे। अब्दुस्समद शाफ़ेई ने कठिन परिश्रम के परिणाम में कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं।

 

Feb २१, २०१७ १२:२२ Asia/Kolkata
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