9 मार्च सन 1454 ईसवी को इतालवी नाविक और खोजकर्ता अमेरिगो वेसपसी का जन्म हुआ।

  • 9 मार्च सन 1916 को जर्मनी ने पुर्तगाल के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा की।
  • 9 मार्च सन 1934 को रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) के पायलट और कॉस्‍मोनॉट यूरी गैगरिन का जन्‍म हुआ
  • 9 मार्च सन 1959 को दुनिया में अत्यधिक पसंद की जाने वाली बार्बी डॉल ने न्‍यूयार्क के अमेरिकन टॉय फ़ेयर में अपना जीवन शुरू किया।
  • 9 मार्च सन 1968 को भारत के प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, लेखक, व्यंग्यकार और पत्रकार हरिशंकर शर्मा का निधन हुआ।
  • 9 मार्च सन 1973 को उत्तरी आयरलैंड में हुए एक जनमत संग्रह में जनता ने ब्रिटेन के साथ रहने के पक्ष में वोट डाला।

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9 मार्च सन 1454 ईसवी को इतालवी नाविक और खोजकर्ता अमेरिगो वेसपसी का जन्म हुआ। युवाकाल से समुद्री यात्राओं से गहरी रूचि के कारण उन्होंने समुद्री जहाज़ पर काम करना आरंभ कर दिया और उन्नति करते करते वह कप्तान बन गए। वेसपसी ने चार बार एक अज्ञात धरती  की यात्रा की जिसका उस समय तक कोई नाम नहीं था और बाद में उन्हीं के नाम पर इस धरती का नाम अमेरिका रखा गया। यही कारण है कि कुछ विशेषज्ञ अमेरिगो वेसपसी को अमरीका का खोजकर्ता मानते हैं। वर्ष 1512में उनका निधन हो गया। वर्ष 1507 ईसवी में जर्मन भूशास्त्री मूलेर ने अमेरिगो वेसपसी के यात्रा वृतांत प्रकाशित किए। उन्होंने अपनी पुस्तक में यह प्रस्ताव रखा कि नए खोजे गए क्षेत्र का नाम अमेरिगो वेसपसी के नाम पर अमेरिका रखा जाए।

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9 मार्च वर्ष 1564 को इटली के प्रसिद्ध शायर, मूर्तिकार और वास्तुविद माइकल एंजलो का 89 वर्ष की आयु में निधन हुआ। इटली के यह प्रसिद्ध शायर वर्ष 1475 में जन्मे थे। माइकल एंजलो ने अपने पिता के विरोध के बावजूद चित्रकारी, मूर्तिकारी में रूचि लेना आरंभ कर दिया और इन दोनों कलाओं में बहुत जल्दी ही ख्याति प्राप्त कर ली। यह इतालवी कलाकार वास्तुकला में भी निपुण हो गया। हज़रत मूसा और हज़रत ईसा अलैहिमस्सलाम की मूर्ति, सेंट पीटर के चर्च के शिलालेख और प्रलय के दिन नामक पेंटिंग माइकल एंजतों लों की प्रसिद्ध कलाओं के नमूने हैं।

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9 मार्च वर्ष 1915 को जीव विज्ञान के विशेष जानी हेनीफ़ेबर का निधन हुआ। उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी करके शोध आरंभ किया। जान फ़ेबर ही वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने यह दृष्टिकोण पेश किया कि ज़मीन के कीड़े मकोड़े और जानवर अपनी रक्षा के लिए अपनी प्रवृत्ति में पायी जाने वाली व्यवस्था से लाभ उठाते हैं।

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9 मार्च सन 1992 ईसवी को इस्राईल और लिकूड पार्टी के संस्थापकों में से एक मनाख़िम बेगिन की मृत्यु हुई। बेगीन का जन्म वर्ष 1913 में बेलारूस में हुआ। उसका पिता एक चरमपंथी ज़ायोनी था जिसका बेगीन के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा। बेगीन ने 12 वर्ष की आयु में ज़ायोनी युवा गारद का गठन किया और फ़िलिस्तीन पलायन करने के दो वर्ष बाद वर्ष 1942 में चरमपंथी आतंकवादी संगठन एयरगन का मुखिया बन गया। यह भयानक कट्टरपंथी ज़ायोनी संगठन था जिसने फ़िलिस्तीनियों के जनसंहार और बलपूर्वक निर्वासन में प्रभावी भूमिका निभाई। आतंकवादी कार्यवाहियों का संचालना बेगीन इतनी क्रूरता से करता था कि ज़ायोनी शासन के संस्थापकों में गिने जाने वाले डेविड बिन गोरियन ने वेगीन को हिटलर की उपाधि दी। इस्राईली मंत्रीमंडल में उसे बारी बारी कई पद मिले और वर्ष 1977 में उसे लिकूड पार्टी का पहला ज़ायोनी प्रधानमंत्री चुना गया। वर्ष 1982 में बेगीन के आदेश पर लेबनान स्थित शबरा व शतीला शरणार्थी शिविरों में  फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों का बड़ी निर्दयता से जनसंहार किया गया जिसके बाद बेगीन को विवश होकर प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद बेगीन की मालीख़ूलिया रोग  से ग्रस्त होकर 1992 में मौत हो गई। 

18 इस्फ़ंद वर्ष 1275 हिजरी शम्सी को मुसलमानों के धार्मिक नेता सैयद जमालुद्दीन असदाबादी का देहान्त हुआ। सैयद जमालुद्दीन दर्शनशास्त्र, खगोलशास्त्र, और इतिहास में बहुत निपुण थे। इसी प्रकार वे अरबी, फ़ारसी और तुर्की भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी और रूसी भाषा में भी दक्ष थे। सैयद जमालुद्दीन को मुसलमानों के मध्य एकता और इस्लामी देशों में साम्राज्य विरोधी जनांदोलनों के संस्थापकों में गिना जाता है। उन्होंने युवा काल से ही इस्लामी देशों की यात्राएं आरंभ की और सदैव इस्लामी राष्ट्रों को एकजुट करने में लगे रहे। उन्होंने उरवतुल वुस्क़ा को पेरिस में और लंदन में ज़ियाउल ख़ाफ़ेक़ैन समाचार पत्र को प्रकाशित करके मुसलमानों को जागरूक करने का प्रयास किया जिसके कारण साम्राज्य उनका मुखर विरोधी हो गया। सैयद जमालुद्दीन की कामना, संसार के समस्त मुसलमानों की एकता और समस्त इस्लामी देशों की वास्तविक स्वतंत्रता थी।

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18 इस्फ़ंद वर्ष 1360 हिजरी शम्सी को प्रसिद्ध ईरानी धर्मशास्त्री, संघर्षकर्ता व धर्मगुरू आयतुल्लाह रब्बानी शीराज़ी का स्वर्गवास हुआ। वह वर्ष सन 1301 हिजरी शम्सी में शीराज़ में जन्मे थे। उन्होंने सन 1342 हिजरी शम्सी से शाह की तानाशाही सरकार के विरुद्ध भरपूर संघर्ष आरंभ किया। इस संबंध में कई बार आपको गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया। इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद वह शीराज़ से सांसद चुने गए। आयतुल्लाह रब्बानी ने अपनी समस्त आयु इस्लाम और मुसलमानों की सेवा करने में गुज़ारी।  

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20 जमाद्धिउस्सानी हिजरत से आठ वर्ष पूर्व पैग़म्बरे इसलाम (स) की चहेती पुत्री और हज़रत अली(अ) की पत्नी और इमाम हसन और हुसैन (अ) की माता हजरते फ़ातेमा जहरा स का जन्म हुआ। उनका पालन पोषण पैग़म्बरे इसलाम (स) ने स्वयं किया। जिससे वे परिपूर्णताओं की चरम सीमा पर पहुंच गयी। विवाह के पश्चात हज़रत फातेमा ज़हरा ने एक पत्नी और फिर एक मॉ की आदर्श भूमिका निभाई। साथ ही उन्होंने सामाजिक दायित्व भी निभाये। पैग़मबरे इस्लाम (स) के स्वर्गवास के बाद वर्ष 11 हिजरी क़मरी में हज़रते फातेमा जहरा की भी शहादत हो गयी। हज़रत फातेमा ज़हरा के जन्मदिन को ईरान में महिला दिवस के रुप में  मनाया जाता है।

20 जमादिस्सानी सन 1320 हिजरी क़मरी ईरान में इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी का ख़ुमैन नगर में जन्म हुआ। उनका पूरा नाम रूहुल्लाह मूसवी ख़ुमैनी था। इमाम ख़ुमैनी ने पहले अपने ही नगर में फिर क़ुम नगर जाकर धार्मिक शिक्षा ग्रहण की। वे शीघ्र ही वरिष्ठ धर्मगुरूओ में गिने जाने लगे। उन्हें दर्शनशासत्र का भी व्यापक ज्ञान था। साथ ही वे एक अच्छे कवि भी थे। युवाकाल से इमाम खुमैनी ने अपनी राजनैतिक गतिविधियां आरंभ कीं किंतु अत्याचारी शाही शासन के विरूद्ध उनका असली संघर्ष 1342 हिजरी शम्सी को बहुत तेज़ हो गया। जिसके कारण उन्हें देशनिकाला देकर तुर्की और फिर इराक भेजा गया। देशनिकाले की 14 वर्ष की अवधि में इमाम ख़ुमैनी अत्यचारी शाही शासन के भ्रष्टाचारों और अपराधों का पर्दाफाश करते रहे। जिसके कारण जनता ने शाह के विरुद्ध संघर्ष आरंभ कर दिया। अंतत: शाह को ईरान छोडकर भागना पड़ा और इस्लामी क्रान्ति सफल हो गयी। जिसके बाद अत्यंत संवदेनशील परिस्थितियों में दस वर्ष तक इमाम ख़ुमैनी ने देश का नेतृत्व किया। और नयी इस्लामी शासन व्यवस्था के आधारों को मज़बूत बनाया।

 

Feb २६, २०१७ १२:१० Asia/Kolkata
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