अधिकांश सुन्नी धर्मगुरुओं का यह मानना है कि तकफ़ीरी गुटों और वहाबियत के विचार इस्लाम की शांति व न्याय प्रेमी शिक्षाओं से विरोधाभास रखते हैं।

ट्यूनीशिया के अन्नहज़ा आंदोलन के नेता राशिद अलग़नूशी क्षेत्र में दाइश के अपराधों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, “यह गुट इराक़ में अमरीका सहित पश्चिम के सैन्य हस्तक्षेप के कारण प्रकट हुआ।” वह इस गुट की कार्यवाहियों के धार्मिक शिक्षाओं से किसी भी प्रकार के संबंध को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, “दाइश की कार्यवाहियों ने दया और न्याय सहित इस्लाम की मूल्यवान शिक्षाओं पर सवालिया निशान लगा दिया है। इस गुट ने अपने संकीर्ण दृष्टिकोण से सिर्फ़ अराजकता व हिंसा को बढ़ावा दिया है।” दाइश की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि यह गुट वार्ता व संवाद को स्वीकार नहीं करता। तकफ़ीरी विचारधारा के संस्थापकों में से एक अब्दुल्लाह एज़ाम का कहना है, “सिर्फ़ जेहाद और बंदूक़, न वार्ता, न कॉन्फ़्रेंस और न ही बातचीत।” वहाबी व तकफ़ीरी गुटों की विचाराधारा इतनी बेबुनियाद है कि किसी भी प्रकार की वार्ता व डिबेट को स्वीकार नहीं करती। वे सिर्फ़ तलवार से बात करना चाहते हैं और जो भी उनके विचार को नहीं मानता उसे धर्म विरोधी और मौत का हक़दार कहते हैं। यही कारण है कि तकफ़ीरी जिस शहर या गांव का अतिग्रहण करते हैं वहां अपने विरोधियों को यातना हेते और उनकी गर्दन मार देते हैं और बाक़ी लोगों को डरा धमका कर अपने अनुसरण पर मजबूर करते हैं।

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पवित्र क़ुरआन के नहल सूरे की आयत नंबर 125 में ईश्वर पैग़म्बर को संबोधित करते हुए अच्छे ढंग से उपदेश व तर्क के ज़रिए दूसरों को ईश्वर के मार्ग पर बुलाने के लिए कह रहा है न कि युद्ध, जनसंहार और रक्तपात के ज़रिए। नहल सूरे की आयत नंबर 125 का अनुवाद है, “अच्छे प्रवचन और बुद्धिमत्ता से लोगों को ईश्वर के मार्ग पर बुलाइये और उनसे अच्छे ढंग से शास्त्रार्थ कीजिए। आपका पालनहार सबसे ज़्यादा जानता है कि कौन उसके मार्ग से दूर है और वह मार्गदर्शन पाने वालों के बारे में भी सबसे ज़्यादा जानता है।” पवित्र क़ुरआन की लोगों को बातचीत और शास्त्रार्थ के ज़रिए इस्लाम की ओर बुलाने के बारे में स्पष्ट आयत के बावजूद तकफ़ीरी गुट दूसरों के साथ बातचीत की ज़बान को नहीं मानते। उनका मानना है कि इन सभी प्रचारकि संभावनाओं के होते हुए भी अगर कोई मौजूदा दौर में मुसलमान नहीं है तो उसे मार दिया जाए। सांस्कृतिक प्रयास, बातचीत और दूसरों के साथ समझौते का वक़्त ख़त्म हो चुका है। उनके ख़्याल में उनका हिंसक व्यवहार का क़ुरआनी व धार्मिक औचित्य है। इसी प्रकार उनका मानना है कि उनके और विरोधियों के बीच सिर्फ़ हथियार फ़ैसला करेगा। इसलिए वे अंधाधुंध जनसंहार कर रहे हैं। इराक़ और सीरिया सहित दुनिया के अन्य क्षेत्रों में हिंसा व जनसंहार दाइश व तकफ़ीरी गुटों की स्ट्रैटिजी का हिस्सा है। वे भय व आतंक की रणनीति के तहत मुसलमान, धार्मिक अल्पसंख्यकों व विरोधियों का हिंसा के ज़रिए दमन करते हैं। तकफ़ीरी विचारधारा अपने लक्ष्य साधने के लिए जब वे आगे बढ़ रहे या पीछे हट रहे या हार रहे होते हैं तो व्यापक स्तर पर जनसंहार करते हैं। वे अपने बर्बरतापूर्ण जनसंहार की क्लिप साइबर स्पेस पर प्रसारित करते हैं।

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प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी में पश्चिम एशिया मामलों के शिक्षक कोल बन्ज़ल का कहना है कि इराक़ और सीरिया में दाइश के हाथों शियों के जनसंहार के पीछे अलक़ाएदा के नेता अबू मुस्अब ज़रक़ावी का दृष्टिकोण ज़िम्मेदार है। ज़रक़ावी ने फ़रवरी 2004 में अलक़ाएदा के नेता को एक ख़त में शियों को अमरीकियों और सलीबियों के ख़तरे से ज़्यादा बड़ा ख़तरा कहा है। इस ख़त में ज़रक़ावी ने कहा है कि सिर्फ़ जनसंहार व जंग के ज़रिए इस ख़तरे को ख़त्म किया जा सकता है।     

तकफ़ीरी गुट ऐसी हालत में जनसंहार कर रहे हैं कि मुसलमान या ग़ैर मुसलमान सहित किसी एक व्यक्ति की हत्या की पवित्र क़ुरआन में भर्त्सना की गयी है। मायदा सूरे की आयत नंबर 32 में आया है, अगर कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति का इस हालत में क़त्ल करे कि न तो उससे ख़ून का बदला ख़ून लेने का अधिकार था और न ही न ही उसने कोई भ्रष्टाचार किया था, तो यह सारे इंसान के क़त्म के समान है और जिसने एक इंसान को ज़िन्दगी दी उसने सारे इंसान को ज़िन्दगी दी। इसी प्रकार मुसलमानों के जनसंहार की भर्त्सना के बारे में पवित्र क़ुरआन के निसा नामक सूरे की आयत नंबर 93 में ईश्वर कह रहा है, “अगर कोई व्यक्ति किसी मोमिन बंदे को जान बूझ कर क़त्ल करे तो उसकी सज़ा नरक है जिसमें वह हमेशा रहेगा और ईश्वर उसपर धिक्कार करता है और उसके लिए बहुत भयंकर दंड तय्यार किया गया है।” इस आयत के अनुसार, ईश्वर ने उसके लिए बहुत कड़ा दंड तय्यार किया है जो किसी मुसलमान का जान बूझ कर क़त्ल करे। इस आयत का अंदाज़ उस व्यक्ति के संबंध में ईश्वर के क्रोध को दर्शा रहा है जो किसी मुसलमान का क़त्ल करता है। ये दंड बहुत भयंकर है और यह कह सकते हैं कि किसी दूसरे पाप के संबंध में इतना कठोर दंड का पवित्र क़ुरआन में उल्लेख नहीं है।

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इस्लामी इतिहास में आया है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने ख़ैबर नामक जंग से लौटने के बाद ओसामा बिन ज़ैद को कुछ लोगों के साथ एक क्षेत्र की ओर भेजा ताकि वहां के यहूदियों को इस्लाम का निमंत्रण दें। उनमें से एक यहूदी मुसलमान हो गया था। वह मुसलमानों के स्वागत में आया। उसामा को लगा कि वह यहूदी जान-माल के डर से इस्लाम प्रकट कर रहा है इसलिए उसे मार डाला और उसका माल अपने क़ब्ज़े में ले लिया। जब यह ख़बर पैग़म्बरे इस्लाम तक पहुंची तो आप बहुत नाराज़ हुए और फ़रमाया, “तुमने एक मुसलमान को मार डाला।” ओसामा ने कहा कि वह डर के ईमान लाया था। पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, “तुम्हें कैसे पता चला? तुम उसके दिल की बात जानते थे, शायद वह सच में मुसलमान हुआ हो।” उसी समय निसा नामक सूरे की आयत नंबर 94 पैग़म्बर पर उतरी। इस आयत में मुसलमानों से कहा गया है कि वे उस व्यक्ति की बात को रद्द न करे जो इस्लाम स्वीकार करने की बात करता हो। उसे खुले मन से स्वीकार करें और दूसरों पर भौतिक भावनाओं के साथ नास्तिक न ठहराएं। कहीं ऐसा न हो कि दुनिया की अस्थाई अनुकंपाओं के चक्कर में लोगों के इस्लाम को स्वीकार न करें और उन्हें क़त्ल करके उनका माल ग़नीमत के तौर पर ले लें। ग़नीमत उस माल को कहते हैं जो जंग में सामने वाले पक्ष की हार के नतीजे में रणक्षेत्र में हासिल होता है। हालांकि ईश्वर के निकट बहुत बड़ा पारितोषिक है। पवित्र क़ुरआन के निसा नामक सूरे की आयत नंबर 93 और 94 में बहुत ही अहम बिन्दु का उल्लेख है। एक आयत में एक मुसलमान के क़त्ल की भर्त्सना की गयी है और बाद की आयत में मुसलमान को नास्तिक ठहराने से मना किया है ताकि कोई व्यक्ति मुसलमानों को नास्तिक कह कर उनके ख़िलाफ़ तलवार न उठाए। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने बहुत से अवसर पर मुसलमानों की हत्या से रोकते हुए मुसलमानों की हत्या को नास्तिकता के समतुल्य बताया है। पैग़म्बरे इस्लाम का एक कथन है, “मेरे बाद नास्तिक न हो जाना कि तुम आपस में एक दूसरे की गर्दन मारने लगो।”

 

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मई ०१, २०१७ १५:४८ Asia/Kolkata
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