जिस प्रकार समाजों की प्रगति और विकास युवा, प्रतिबद्ध और विशेषज्ञ मानव श्रम बल पर निर्भर है, उसी प्रकार देशों के सक्रिय व युवा श्रम बल के पतन व तबाही में निरंकुशता की बड़ी भूमिका है।

जिस प्रकार समाजों की प्रगति और विकास युवा, प्रतिबद्ध और विशेषज्ञ मानव श्रम बल पर निर्भर है, उसी प्रकार देशों के सक्रिय व युवा श्रम बल के पतन व तबाही में निरंकुशता की बड़ी भूमिका है। निरंकुश युवा, शिक्षा व रोज़गार के क्षेत्र में ऐसे अवसरों को हाथ से गंवा देते हैं जिनकी क्षतिपूर्ति नहीं हो सकती। वे देश पर भारी ख़र्चों का बोझ लाद देते हैं, समाज की सुरक्षा को ख़तरे में डाल देते हैं, देश को विशेषज्ञ एवं सक्षम बल से वंचित कर देते हैं और अपनी व्यवस्था की वैधता पर प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं। निरंकुशता ऐसे कामों को कहा जाता है जो क़ानून, सिद्धांत और सामाजिक मूल्यों के विरुद्ध होते हैं। घर से भाग जाना, आवारागर्दी, भीख मांगना, चोरी, दूसरों के अधिकारों का हनन, यौन अपराध और इसी प्रकार की बातें निरंकुशता में शामिल हैं।

 

 

निरंकुशता, ऐसी चीज़ नहीं है जो एक ही दिन में अस्तित्व में आ जाए और बड़ी सरलता से अल्पावधि में तेज़ी से समाप्त हो जाए। निश्चित रूप से निरंकुश युवा, अन्य युवाओं की तुलना में जीवन की समस्याओं में अधिक ग्रस्त रहा है। अधिकांशतः उसका व्यवहार अवसाद, तनाव और उन मानसिक दबावों का परिणाम होता है जिनका उसे बचपन में सामना करना पड़ा था। अधिकतर अवसरों पर इस प्रकार के युवाओं का व्यवहार उनकी अनुभवहीनता, अज्ञान और शिष्टाचार से अनभिज्ञता का परिणाम होता है। इन युवाओं को व्यसकता की आयु में अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए उचित आदर्श या मॉडल नहीं मिल पाता और इसी लिए ये राह से भटक जाते हैं। कभी कभी उनका समाज विरोधी व्यवहार, स्वस्थ सामाजिक शिष्टाचार से उनकी अनभिज्ञता के कारण होता है अर्थात आयु के विकास के दौरान वे सही व्यवहार के लिए उचित शिक्षा, आदर्श और मेल-जोल से वंचित रहे हैं। कुछ लोग जेनेटिक कमियों, मानसिक कमज़ोरियों और शारीरिक विकारों को युवाओं में निरंकुशता का कारण बताते हैं।

 

 

सभ्य व शिष्ट परिवार में उपस्थिति, माता-पिता के साथ किशोरों व युवाओं के मज़बूत संबंध, शैक्षिक सफलताएं, अच्छे मित्रों का अस्तित्व और शैक्षिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां, निरंकुशता को नियंत्रित करने के महत्वपूर्ण साधन हैं। अच्छा घराना, युवाओं को प्रोत्साहित करके, उनके व्यवहार पर दृष्टि रख के और मित्रों के साथ उनके रवैये को संतुलित बना कर उनके सामाजिक विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। परिवार के लोग, युवाओं के व्यवहार में गड़बड़ी देखते ही उचित प्रतिक्रिया दिखा कर और स्नेहपूर्ण पहलुओं को मज़बूत बना कर, समाज में एक सक्रिय सदस्य के रूप में उपस्थित होने में उनकी सहायता करते हैं। समस्या उस समय खड़ी होती है जब परिवार, युवा के विकास के लिए एक अच्छा केंद्र बनने में अक्षम रहता है। बिखरा हुआ परिवार या संकटों से भरा हुआ परिवार युवा के लिए उचित वातावरण उपलब्ध नहीं करा सकता।

 

 

लगभग सभी समाज शास्त्री किसी भी स्वस्थ समाज के आधार के रूप में घराने और परिवार के महत्व और विशेष भूमिका पर बल देते हैं और आज की सामाजिक परिस्थितियों में इस कटु वास्तविकता से इन्कार नहीं किया जा सकता कि विभिन्न समाजों में परिवार की पवित्र इकाई के समक्ष गंभीर ख़तरे हैं। घराने के आधारों को मज़बूत बनाना वस्तुतः उसके अन्य सदस्यों को सुदृढ़ बनाने और उन्हें एक उज्जवल भविष्य की ओर ले जाने के समान है। प्रख्यात समाज शास्त्री ट्रेविस हीरशी सामाजिक विकारों की समीक्षा में युवाओं की निरंकुशता को निंयत्रित करने के चार स्रोतों पर बल देते हैं। माता-पिता, स्कूल, हमजोलियों से उनकी घनिष्ठता और दिनचर्या के एवं सामाजिक कार्यों के लिए उनका शौक़, विशेष कर पढ़ाई और रोज़गार की प्राप्ति। अधिकतर निरंकुश युवा ऐसे परिवारों में जन्म लेते हैं जहां वे माता-पिता के प्रेम व स्नेह से वंचित होते हैं और परिवार के सदस्यों का अधिक समय लड़ाई-झगड़े और विवाद में बीतता है।

 

 

दूसरी ओर नैतिक व आस्था संबंधी सिद्धांतों और मान्यताओं पर परिवार का कटिबद्ध न होना, युवाओं में निरंकुशता फैलने में बहुत प्रभावी है। जो घराने धार्मिक व आस्था संबंधी मान्यताओं का पालन नहीं करते वस्तुतः वे अपने बच्चों को बचपन से ही ग़लत नैतिक शिक्षाओं की ओर बढ़ा देते हैं क्योंकि बच्चे अपने घर-परिवार में ही सही या ग़लत मान्यताएं सीखते हैं। अतः जो परिवार नैतिक व धार्मिक मान्यताओं का पालन नहीं करते उनमें पलने वाले बच्चे सही नैतिक व्यवहार नहीं अपनाते हैं। इसी प्रकार जिन घरों में बच्चों के समक्ष उचित पारिवारिक संबंधों, सही पहनावे या टीवी पर प्रसारित होने वाले ग़लत कार्यक्रमों का ध्यान नहीं रखा जाता उनमें बचपन से ही बच्चों में निरंकुशता के बीज बो दिए जाते हैं। दूसरी ओर स्कूल भी बच्चों के व्यक्तित्व को ढालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और छात्र के भविष्य का एक बड़ा भाग स्कूल से विशेष होता है। संसार की अधिक तर बड़ी हस्तियां, अच्छे व योग्य शिक्षकों की ऋणी हैं और वे अपनी सफलता के अच्छे स्कूलों में प्रशिक्षण को ऋणी मानती हैं। शिक्षकों की अयोग्यता और छात्रों के बीच भेदभाव व अन्याय तथा उनका अनादर उन कारणों में से है जिनके चलते किशोर, शिक्षा केंद्रों से दूर भागते हैं और परिणाम स्वरूप निरंकुशता और विभिन्न प्रकार के अपराध उन्हें अपनी ओर आकृष्ट करने लगते हैं।

 

 

जीवन की मूल बातों में दक्षता की प्राप्ति, युवा के सामाजिक आचरण को मज़बूत बनाती है और जीवन के कठिन पलों में सही निर्णय करने में उसकी सहायता करती है। ज़िम्मेदारी का निर्वाह, सफलता की प्रेरणा, लगन, आत्मविश्वास, मेहनत, एकाग्रता, रचनात्मकता, सामूहिक मान्यताओं पर ध्यान, विवादों को हल करने की शैली और इसी प्रकार की सकारात्मक बातें युवाओं को बेहतर ढंग से सोचने और व्यवहार करने की शक्ति प्रदान करती हैं।

 

आर्थिक कारक भी निरंकुश युवाओं के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन युवाओं पर आर्थिक कारकों के प्रभावों के बारे में समाज शास्त्रियों ने विभिन्न विचार पेश किए हैं। कुछ लोग संपत्ति के अन्यायपूर्ण वितरण और ग़रीब व अमीर के अंतर को, कुछ लोग दरिद्रता को तो कुछ लोग बेरोज़गार रहते हुए धनवान बनने की चाहत को इस संबंध में प्रभावी बताते हैं। कुल मिला कर ग़रीबी, किशोरों और युवाओं में अपराधों की ओर बढ़ने का एक प्रमुख कारण है। अलबत्ता इस बीच निरंकुशता से बचने में व्यक्तिगत संकल्प की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए क्योंकि अत्यंत बुरी आर्थिक स्थिति में ग्रस्त व्यक्ति भी अपने संकल्प और ईश्वर पर भरोसे के माध्यम से स्वयं को इसके दुष्परिणामों से बचा सकता है और हमेशा अपने लिए सही मार्ग का चयन कर सकता है।

 

 

रेडियो, टीवी और पत्र-पत्रिका जैसे सामूहिक संचार माध्यम भी उन कारकों में से हैं जो अपने संबोधकों की सामूहिक समझ-बूझ का स्तर ऊंचा उठाने और उनका मार्गदर्शन करने में प्रभावी भूमिका निभाते हैं और अगर वे समाज की भलाई व हित के विपरीत काम करें तो निरंकुशता, बुराई और पथभ्रष्टता फैला सकते हैं। इस संबंध में फ़िल्में और टेलीविजन अपनी अधिक रोचकता के कारण अधिक प्रभावी हैं। फ़िल्में, एक प्रकार से सामूहिक संपर्क का माध्यम हैं। जब कोई व्यक्ति किताब पढ़ता है तो इस बात की संभावना रहती है कि वह कभी भी किताब को अलग रख कर उसके बारे में सोचने लगे किंतु जब वह फ़िल्म देखता है तो पूर्ण रूप से उसमें तल्लीन हो जाता है, इस प्रकार से कि कुछ समय के लिए उससे सोचने-समझने की क्षमता छिन जाती है और कभी कभी तो वह स्वयं को फ़िल्म का चरित्र भी समझने लगता है। यह प्रभाव किशोरों, युवाओं और कम पढ़े-लिखे लोगों पर अधिक होता है। इस आधार पर सामूहिक संचार माध्यमों के गहरे प्रभाव के दृष्टिगत अगर ये माध्यम, धार्मिक व सांस्कृतिक मान्यताओं से समन्वित न होंगे तो अपने संबोधकों में निरंकुशता को बढ़ावा देंगे।

 

 

कुल मिला कर कहा जा सकता है कि माता-पिता अपने बच्चों के लिए जो सबसे मूल्यवान विरासत छोड़ते हैं वह आत्मसम्मान है। अगर माता-पिता अपने बच्चों में आत्मसम्मान को मज़बूत बनाएं तो युवाओं में निरंकुशता बहुत कम हो जाएगी। हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि जिसने अपने आप को पहचान लिया उसने अपने पालनहार को पहचान लिया। बच्चों और युवाओं में आत्मसम्मान, अध्यात्म और मान्यताओं के सम्मान जैसी भावनाओं को सुदृढ़ बना कर उन्हें ग़लत मार्ग पर चलने से रोका जा सकता है किंतु इसके लिए सबसे पहले माता-पिता को अपने भीतर यह विशेषताएं पैदा करनी होंगी।

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Nov ०४, २०१५ १६:३४ Asia/Kolkata
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