हमने तकफीरी आतंकवादी गुट दाइश द्वारा कुछ ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों व धरोहरों को नष्ट करने के बारे में चर्चा की थी।

धार्मिक स्थलों का नष्ट किया जाना केवल कुछ धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों का नष्ट किया जाना नहीं है। ये स्थल एक राष्ट्र और इस्लाम के अनुयाइयों की पहचान हैं। तकफीरी आतंकवादी गुट दाइश इस्लामी व ऐतिहासिक इमारतों को ध्वस्त करके एक प्रकार से इस्लामी सभ्यता से युद्ध कर रहे हैं। ये आतंकवादी गुट इस प्रकार की कार्यवाही से उस चीज़ को समाप्त कर रहे हैं जो मुसलमान पीढ़ियों को एक दूसरे से जोड़ती हैं। पवित्र कुरआन में भी देखा जा सकता है कि इमारतों और स्थलों का प्रयोग सभ्यता की मज़बूती के लिए किया गया है। ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों को ध्वस्त करने में तकफीरी आतंकवादी गुट दाइश की जो कार्यवाहियां हैं वे पवित्र कुरआन की आयत और अंतिम ईश्वरीय दूत हज़रत मोहम्मद मुस्तफा की शैली के विरुद्ध हैं। सूरे रूम की 42 वीं आयत में महान ईश्वर कहता है” हे पैग़म्बर कह दीजिये कि ज़मीन में चलो- फिरो और देखो कि जो लोग पहले थे उनका अंजाम क्या हुआ उनमें से अधिकांश अनेकेश्वरवादी थे”

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इसी प्रकार सूरे नम्ल की 51वीं और 52वीं आयतों में अतीत के लोगों के बाकी रह गये अवशेषों से पाठ लेने पर बल दिया गया है। महान ईश्वर इन आयतों में कहता है कि देखो उनकी धूर्तता का अंत क्या हुआ। हमने उन्हें और उनकी पूरी क़ौम को बर्बाद कर दिया। तो ये उनके घर हैं जो उस अत्याचार के कारण खाली पड़े हैं जो उन्होंने किये हैं। निश्चित रूप से इसमें उन लोगों के लिए निशानियां व पाठ हैं जो जानते हैं।

महान ईश्वर पवित्र कुरआन में लोगों का आह्वान करता है कि वे अतीत के लोगों के हालात और उनके अंजाम को देखें। पवित्र कुरआन में महान ईश्वर का यह आह्वान आदेश के रूप में आया है और इस प्रकार के आदेश का परिणाम कभी उन लोगों के अंजाम को जानना होता है जिन्होंने ईश्वरीय वास्तविकताओं व निशानियों को झुठलाया। इसी प्रकार पवित्र कुरआन उन लोगों की निंदा करता है जो सोचे- समझे बिना ऐतिहासिक अवशेषों को देखकर गुज़रत जाते हैं।

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पवित्र कुरआन का मानना है कि इंसान अपनी सोच को वहीं तक सीमित न रखे जो कुछ उसके पास -पास हो रहा है और उसकी दिनचर्या की ज़िन्दगी में गुज़र रहा है बल्कि अपनी सोच को विस्तृत करे और चिंतन- मनन और होशियारी के साथ दूसरी जातियों के अंजाम पर ग़ौर करे। इस्लाम के अनुसार इतिहास स्वयं पहचान व ज्ञान का एक स्रोत है। क्योंकि अतीत के लोगों के निशानों को देख कर और उनके जीवन के हालात की समीक्षा और उनका विश्लेषण करके पाठ लिया जा सकता और भविष्य के लिए दिशा- निर्धारित की जा सकती है। पवित्र कुरआन इंसान का आह्वान करता है कि वह ज़मीन पर घूमे- फिरे और अतीत के लोगों के अंजाम पर विचार करे। इसके लिए ज़रूरी है कि अतीत के लोगों की किशानिया बाकी हों और वे इंसान की पहुंच में हों ताकि वह उनसे पाठ ले सके। पवित्र कुरआन के अनुसार अतीत के लोगों की किशानियां की सुरक्षा वर्तमान और भावी पीढ़ी के लिए ज़रूरी है। अतः तकफीरी आतंकवादी गुटों द्वारा अतीत के लोगों के जीवन की किशानियां और प्राचीन इमारतों को ध्वस्त करना इस बात का सूचक है कि वे पवित्र कुरआन की शिक्षाओं से अनभिज्ञ हैं। पवित्र कुरआन के सूरये यूनुस की 90 से 92 तक की आयतों में हज़रत मूसा, फिरऔन और बनी इस्राईल की लड़ाई के अंतिम चरण का उल्लेख किया गया है। इन आयतों में आया है कि फिरऔन और उसके सिपाहियों ने बनी इस्राईल का पीछा किया यहां तक कि वे नील नदी के किनारे तक पहुंच गये। नदी के बीच में रास्ता बन गया है और बनी इस्राईल ने उसके माध्यम से नदी पार कर ली। फिरऔन और उसके सिपाहियों ने भी नदी में बन गये रास्ते से बनी इस्राईल का पीछा किया। अचानक पानी की भयावह मौजों ने इन्हें चारों ओर से घेर लिया और वे सब डूब गये। उसके बाद की घटना पवित्र कुरआन के सूरये यूनुस की आयत नंबर 92 में इस प्रकार आया है” तो आज हम तुम्हारे शरीर को पानी से मुक्ति दिला देते हैं ताकि उन लोगों के लिए पाठ हो जाये जो तुम्हारे बाद आयेंगे। निःसंदेह बहुत से लोग हमारी निशानियों से निश्चेत हैं।“ महान ईश्वर ने फिरऔन के निर्जीव और मृत शरीर को पानी से मुक्ति दिला दी और उसे किशेष लेप कर सुरक्षित रख दिया गया था आज भी वह मिस्री संग्रहालय में मौजूद है और उसकी रक्षा की जा रही है। महान ईश्वर पवित्र कुरआन में कहता है” हम तेरे शरीर को मुक्ति दिला देंगे ताकि तू उन लोगों के लिए पाठ बन सके जो तेरे बाद आयेंगे।“

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इसका मतलब यह हुआ कि उसके शव की रक्षा की जानी चाहिये ताकि आने वाली पीढ़ियां उसे देंखे और तानाशाह व रक्त पिपासु फिरऔन के अंजाम को देखकर पाठ लें। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि अगर तकफीरी आतंकवादी गुटों को फिरऔन का मोमियाइ किया हुआ शव मिल जाये तो वे उसे भी अनेकश्वेरवाद से मुकाबले के नाम पर ध्वस्त कर देंगे जबकि पवित्र कुरआन के अनुसार महान ईश्वर ने उसके शव को पानी से बचाया है ताकि वह आने वालों के लिए पाठ बन सके। तो इस किशानी की सुरक्षा ज़रूरी है।

पैग़म्बरे इस्लाम की जीवन शैली में धार्मिक और ग़ैर धार्मिक ऐतिहासिक इमारतों को ध्वस्त करना दिखाई नहीं पड़ता है। पैग़म्बरे इस्लाम ने यमन के उस स्थान को भी ध्वस्त करने का आदेश नहीं दिया जिसमें मूर्तियां रखी हुई थीं क्योंकि स्थानीय लोगों की दृष्टि में उस स्थान की पवित्रता समाप्त हो गयी थी और अब वहां से मूर्तिपूजा का प्रचार- प्रसार नहीं हो रहा था। तकफीरी आतंकवादी गुटों के व्यवहार पर दृष्टि इस बात की सूचक है कि इन गुटों ने उन स्थलों पर हमला करके उन्हें तबाह कर दिया जिनकी उपासना का पहलु हज़ारों साल पहले समाप्त हो चुका है और उन्हें एक मानवीय धरोहर के रूप में देखा जाता है। पैग़म्बरे इस्लाम ने इस प्रकार के स्थलों को ध्वस्त करने का जो आदेश दिया था वह अपने समय में मूर्तिपूजा के प्रचार- प्रसार के सूचक थे। वर्तमान समय तक समूद जाति के घरों के खंडहर का बाकी रहना इस बात का सूचक है कि पैग़म्बरे इस्लाम अतीत के लोगों के अवशेषों के ध्वस्त करने का इरादा नहीं रखते थे और दूसरी ओर पवित्र कुरआन में लोगों का आह्वान किया गया है कि वे इन अवशेषों को देखें, उनमें विचार करें और उनसे पाठ लें। एक रवायत में पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने साथियों से इस प्रकार के अवशेषों से पाठ लेने की सिफारिश की है। जिस समय पैग़म्बरे इस्लाम नवीं हिजरी कमरी में तबूक नामक युद्ध के लिए जा रहे थे और जब वे हिज्र नामक स्थान पर पहुंचे और वहां पर समूद जाति की किशानी थीं तो पैग़म्बरे इस्लाम ने इस क्षेत्र को देखा और अपने साथियों से फरमाया” जिन लोगों ने अपने ऊपर अत्याचार किया उनके घरों में प्रविष्ट न हो किन्तु यह कि रोते हुए।“

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इस रवायत में कहीं भी यह दिखाई नहीं पड़ता कि पैग़म्बरे इस्लाम ने मूर्तिपूजा के चिन्हों को ध्वस्त करने का आदेश दिया हो।

एक स्थान कब्रिस्तान है जिसे तकफीरी आतंकवादी दाइश और उसके जैसी सोच रखने वाले गुट ध्वस्त करते हैं जबकि सुन्नी मुसलमानों की प्रसिद्ध किताबों में बहुत हदीसें हैं जो इस बात की सूचक हैं कि कब्रों का दर्शन करना सुन्नत व अच्छा कार्य है। दर्शनीय स्थलों पर जाने और महान व एतिहासिक हस्तियों की कब्रों के दर्शन से उनकी याद ताज़ा हो जाती है। इससे इंसान को कल्याण, न्यायप्रेम और आध्यात्मिक परिपूर्णता की ओर चलने के लिए प्रेरणा मिलती है। कब्रों को देखने के बाद इंसान को जीवन के समाप्त होने और परलोक की याद आ जाती है। जैसाकि सुन्नी मुसलमानों की प्रसिद्ध पुस्तक “सुनन इब्ने माजा” में पैग़म्बरे इस्लाम के हवाले से आया है कि कब्रों का दर्शन करो कि वह तुम्हें परलोक की याद दिला देगी।“ इस प्रकार कब्रों के दर्शन से इंसान पर सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं और पैग़म्बरे इस्लाम ने कब्रों के दर्शन के लिए जो सिफारिश की है वह कब्रों के ध्वस्त करने हेतु दाइश जैसे तकफीरी व आतंकवादी गुटों की कार्य शैली के बिल्कुल विरुद्ध है।    

 

 

मई २८, २०१७ १६:३१ Asia/Kolkata
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