हमने आपको बताया था कि कौन कौन से तत्व पर्यावरण की रक्षा में सहायता प्रदान करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरण के ख़राब और तबाह होने का एक कारण, मानव समाज में उपभोगवाद के दृष्टिकोण का प्रसार है और प्राकृतिक रूप से पर्यावरण की सुरक्षा का मुख्य मार्ग उपभोग मानक में सुधार है।

समीक्षाओं से पता चलता है कि औद्योगिक क्रांति से पहले तक अधिकतर समाज में अनावश्यक ख़र्चों विशेषकर सौंदर्य वाली वस्तुओं की ओर रुझहान बुरा समझा जाता रहा है किन्तु बीसवीं शताब्दी के आरंभ से और उत्पादन की शक्ति में वृद्धि होने से समस्त समाजों विशेषकर औद्योगिक देशो में विज्ञापन, क़िस्तों पर बिक्री, माडलवाद और उपभोगवाद के रुझाहान में वृद्धि हुई है। इस प्रकार से कि इस चरण के बाद, इन देशों में स्ट्रटैजिक केन्द्रियता के कारण आवश्यकता ने अपने उत्पादन में भारी वृद्धि की ज़रूरत का आभास किया ताकि बड़ी संख्या में अपने उत्पादन को बेच सकें। कनाडा के अर्थशास्त्री गालब्राइट के अनुसार, उपभोगताओं का दौर अब समाप्त हो गया है क्योंकि यदि इससे अधिक या आर्थिक ज्ञान के आधार पर, यह उपभोक्ता था जो अपनी आय के अनुसार अपने ख़र्चे निर्धारित करता था किन्तु वर्तमान समय में उत्पादन में वृद्धि ने लोगों के लिए आवश्यकताएं पैदा कर दी हैं और वे अनचाहे ढंग से ऐसे उत्पादनों का प्रयोग करते हैं जिनका प्रचार उसके लिए किया जाता है।

इसी प्रक्रिया के अंतर्गत बीसवीं शताब्दी के अंत में दुनिया को पर्यावरण की तबाही की समस्या का सामना हुआ और पर्यावरण के स्रोत समाप्त होते गये, ज़मीन गर्म होती गयी, ग्रीन हाऊस गैसों में विस्तार होने लगा और ओज़ोन की पर्तें लाल होती गयीं। यह समस्याएं केवल बड़े बड़े शहरों तक ही समिति नहीं रहीं बल्कि छोटे शहरों, क़स्बों, जंगलों और समुद्रों में भी इसका क़हर देखने को मिला और प्राकृतिक पर्यावरण विनाश की कगार पर पहुंच गये। उद्योग द्वारा मानवता की सेवा के बावजूद इसमें भारी विस्तार से पर्यावरण को बहुत अधिक नुक़सान उठाना पड़ा है जिसका प्रभाव मनुष्य के अतिरिक्त जानवरों, जंगलों और वनस्तपतियों पर पड़ रहा है।

खेद की बात यह है कि वर्तमान समय में उपभोगवाद की प्रक्रिया जारी है और उपभोग ने अपनी बुरी तस्वीर खो दी है और अब यह एक सुन्दर शब्द में परिवर्तित हो गया है। वर्तमान समय में ख़र्चे और वस्तुओं के प्रकार और ख़र्चे की आदत से मनुष्य की व्यक्तित्व और उसकी हस्ती को पहचाना जाता है। आज के जीवन पर तनिक ध्यान देने से यह पता चल जाता है कि जो चीज़ें लोगों को दूसरों से अलग करती हैं, वह कपड़े पहनने का तरीक़ा, मनोरंजन के प्रकार, मोबाइल के माडल, लेपटाप और दूसरी अन्य वस्तुओं और साज सज्जा की वस्तुएं उसके व्यक्तित्व को बयान करने वाली समझी जाती हैं। यह ऐसी स्थिति में है कि अतीत में लोगों की पहचान का मापदंड उसका आचरण, व्यवहार, काम, परिवार और उसका रहन सहन रहा है। प्रसिद्ध अमरीकी टीकाकार विक्टर लेबू इस बारे में कहते हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था की यह मांग है कि हम अपने ख़र्चे को अपने जीवन के हिसाब से बदल दें, वस्तुओं के क्रिय विक्रय को संस्कार का रूप दे दें, यह मांग करता है कि ख़र्चे में हम अपनी आत्मा का संतोष ध्यान में रखें। हमें इस बात की आवश्यकता है कि वह वस्तुएं प्रयोग करें जल्दी ख़राब हों, जल जाएं या बदलने के योग्य हो जाएं या बहुत तेज़ी से उनकी क़ीमते गिर जाएं।

प्राप्त प्रमाण भी इस विषय की पुष्टि करते हैं कि वर्तमान समय में मनुष्य प्राकृति की क्षमता से अधिक उससे लाभ उठाने का प्रयास कर रहा हे और इसके कारण सृष्टि की व्यवस्था चरमरा गयी है और संतुलन बिगड़ गया है। रिपोर्टों में बताया गया है कि वर्तामन समय में धरती का सीना चीर कर प्राप्त किए जाने का स्तर, प्राकृतिक क्षमता से तीस प्रतिशत अधिक है और यह स्तर इसी तरह जारी रहा तो वर्ष 2030 में यह राशि 100 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी। इसका यह अर्थ है कि उस समय धरती वासियों के उपभोग के लिए इन्हीं विशेषताओं के साथ दूसरी धरती की आवश्यकता पड़ेगी। 45 साल पहले धरती से लाभ उठाने का स्तर दो गुना था समस्त स्रोतों के लिए प्रयोग के संबंध में सीमितताएं लागू हो गयीं किन्तु यह मामला पेयजल के बारे में संकटमयी स्थिति तक पहुंच गया है। आज दुनिया में तीन चौथाई जनसंख्या उन देशों में जीवन व्यतीत कर रही है जिनके निवासियों के प्रयोग का स्तर, धरती के एकोसिस्टम की क्षमता से कहीं अधिक है और इसके परिणाम स्वरूप यदि क्षमता से अधिक या डबल मात्रा में हम प्रयोग की वस्तुएं निकालते हैं तो इससे एकोसिस्टम पर दबाव पड़ता है। धरती के स्रोतों को उपयोग के स्तर को मापने का सबसे महत्वपूर्ण सिस्टम “एकोलोजिकल फ़ुट प्रिंट” है। यह मापदंड यह बताता है कि हर मनुष्य अपनी आवशयकताओं को पूरा करने के लिए किस स्तर तक धरती से लाभ उठा सकता है और इसी प्रकार उसके द्वारा प्रयोग की गयी वस्तुओं के कचरे को किस मात्रा में सहन कर सकती है।

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि उपभोग की वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि दुनिया में हर व्यक्ति को औसतन अपनी आवश्यकता को पूरा करने के लिए 7.2 हेक्टेयर ज़मीन की आवश्यकता है। यह ऐसी स्थिति में है कि दुनिया की प्राकृतिक क्षमता हर व्यक्ति को केवल 1.2 हेक्टर ज़मीन दे सकती है। इस प्रकार कि वर्तमान समय में धरती को इस संबंध में तीस प्रतिशत कमी का सामना है। स्पष्ट रूप से आने वाले वर्षों में जनसंख्या में वृद्धि के कारण यह संख्या भी बढ़ेगी और दुनिया में स्रोतों की आपूर्ती और ख़र्च में कमी के बीच बहुत बड़ी खाई पायी जाती है।

इस आधार पर दुनिया की दिन प्रतिदिन बढ़ती आबादी के दृष्टिगत एसा प्रतीत होता है कि वर्तमान समय में संकट से निकलने का एक मात्र मार्ग, मौजूद उपभोग मानक में पविर्तन और उसको व्यवस्थित करना है। यही कारण है कि आज दुनिया में उपभोग मानक में सुधार के विषय को विशेष ध्यान दिया जा रहा है और इसको प्राप्त करने के लिए कुछ अंतर्राष्ट्रीय समझौते किए गये हैं। इन समझौतों में ख़र्च और उत्पादन में अस्थाई आदर्श समाप्त करने और तार्किक ख़र्चे की प्राप्ति और बेकार के ख़र्चे के बचने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। इसी प्रकार औद्योगिक उत्पादों की प्रक्रिया को सार्थक बनाने के लिए प्राकृतिक स्रोतों से लाभ उठाने पर भी बल दिया गया है ताकि पर्यावरण पर अधिक से अधिक दबाव न पड़े और मनुष्य भी इस दबाव से सुरक्षित रहे।  स्थाई खर्च का अर्थ यह है कि मनुष्य के जीवन के अनुसार उसकी आवश्यकता की वस्तुओं और सेवाओं का प्रयोग करना है।

अलबत्ता उपभोग मानक में सुधार की ज़िम्मेदारी केवल सरकार की नहीं होती बल्कि हर व्यक्ति पर इसकी ज़िम्मेदारी है कि वह इस परिधि में क़दम बढ़ाए। विशेषज्ञों ने उपभोग मानक में सुधार के लिए कुछ परामर्श दिए हैं। वह कहते हैं कि वृक्षों को काटने से रोकने और आक्सीजन की मात्रा में वृद्धि, पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित रखने के लिए काग़ज़ का सदपयोग किया जाए। आवश्यकता न रहने पर बिजली से चलने वाली वस्तुओं को बंद कर दिया जाए, गाड़ियों के प्रयोग के बजाए पैदल चलने को अधिक प्राथमिकता दी जाए, मांस के बजाए साग सब्ज़ियों का प्रयोग करें। प्लास्टिक के बैगस, यूज़ एडं थ्रो वाले बर्तनों का प्रयोग समाप्त कर दिया जाए इससे जानवर और वनस्तपियां सुरक्षित रहती हैं। पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए जल, वायु और सौर्य उर्जा का प्रयोग किया जाए, पानी को अधिक बर्बाद होने से रोका जाए, यह सब विषय उपभोग मानक में सुधार की श्रेणी में आते हैं।

सूखी वस्तुओं, कूड़ों और इस प्रकार की चीज़ों को सुरक्षित रखकर भी पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है। बताया जाता है कि एक टन काग़ज़ बनाने के लिए 15 मोटे मोटे पेड़ों को काटा जाता हे । यदि ख़राब कागज़ को दोबारा प्रयोग योग्य काग़ज़ बनाया तो हमने 90 प्रतिशत पानी और 50 प्रतिशत ऊर्जा की बचत की और पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने में 75 प्रतिशत प्रभावी भूमिका अदा की। 

  

 

Jul ११, २०१७ १३:४५ Asia/Kolkata
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