हमने आतंकवादी गुट दाइश के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में महिलाओं को दासी बनाने के संबन्ध में चर्चा की थी।

हमने आपको यह भी बताया था कि दाइश का यह काम इस्लामी शिक्षाओं और पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों से खुला विरोधाभास रखता है। यह बात सही है कि जिस समय इस्लाम का उदय हुआ उस समय अरब जगत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में दास प्रथा प्रचलित थी। दास प्रथा को समाप्त करने के लिए इस्लाम की योजना यह थी कि इस कुप्रथा को धीरे-धीरे सदा के लिए समाप्त कर दिया जाए। पहले चरण में दास प्रथा की बुराई बताकर उसे रोका जाए और बाद वाले चरण में इसे सदा के लिए प्रतिबंधित कर दिया जाए। यही कारण है कि विश्व के अन्य क्षेत्रों की तुलना में इस्लामी देशों में दास प्रथा बहुत जल्दी समाप्त हो गई। इस प्रकार यह बात पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है कि दाइश के द्वारा इस्लाम के नाम पर महिलाओं को दासी बनाना, पूर्ण रूप से इस्लाम विरोधी है। पवित्र क़ुरआन दास प्रथा का प्रबल विरोधी है और इसकी कड़े शब्दों में निंदा करता है।

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लोगों को दास बनाने जैसे काम का इस्लाम द्वारा खुलकर विरोध करने के बावजूद तकफ़ीरी विचारधारा, इस्लाम के नाम पर महिलाओं को दासी बना रही है। तकफ़ीरी विचारधारा के अनुयायी दाइश के आतंकवादी, महिलाओं को आतंकवादी कार्यवाहियों और आत्मघाती हमलों के लिए प्रयोग करते हैं। आतंकवादी गुट दाइश महिलाओं को उनके सामाजिक अधिकारों से वंचित रखता है, वह महिलाओं के लिए किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता का पक्षधर नहीं है और वह उनका दुरूपयोग करता है। बंदी बनाई गई महिलाओं के साथ बलात्कार को दाइश के आतंकवादी सामान्य सी बात मानते हैं। दाइश महिला को केवल भोग की वस्तु ही समझता है। वास्तविकता यह है कि तकफ़ीरी विचारधारा के स्वामी आतंकवादी, महिलाओं के बारे में वहीं दृष्टिकोण रखते हैं जो इस्लाम के उदय के समय अज्ञानता के काल में अरब लोग रखते थे। उस काल के अरब जगत में महिलाओं का कोई महत्व नहीं था। महिलाओं के बारे में तकफ़ीरी विचारधारा वाले मुफ़्तियों के फ़तवों से महिलाओं के संबन्ध में उनकी संकीर्ण विचारधारा का पता चलता है। वहाबी मुफ़्तियों के अनुसार महिला शैतान है, वह बुराई की जड़ है, वह शैतान का हथियार है, महिलाओं को सदैव घर में बंद रखा जाए, पुरूषों के लिए वह बहुत नुक़सानदेह है, बच्चों के पास महिलाओं से अधिक बुद्धि होती है, महिलाओं कत ड्राइविंग का अधिकार नहीं मिलना चाहिए और महिलाएं इंटरनेट का प्रयोग नहीं कर सकतीं व ग़ैरह।

वहाबी मुफ़्ती कहते हैं कि जिस समय महिला को बनाया गया उस समय शैतान बहुत प्रसन्न हुआ था, वहाबी मुफ़्ती कहते हैं कि किसी बाप को अपनी बेटी के साथ एकांत में नहीं सोना चाहिए क्योंकि यह हराम है। इन्हीं वहाबी मुफ़्तियों ने सीरिया संकट आरंभ होते समय आतंकवादियों को आकर्षित करने के उद्देश्य से जेहाद निकाह फ़त्वा दिया था। जेहादे निकाह फ़त्वे के अन्तर्गत जेहादी जिससे चाहे उससे निकाह कर सकता है और इसमें कोई रुकावट नहीं है।

जेहादे हिकाह के माध्यम से दाइश के बतंकवादियों ने बहुत से युवकों और युवतियों को अपनी ओर आकृष्ट किया जिन्होंने आपस में अवैध संबन्ध स्थापित किये। इन अवैध संबन्धों को वहाबी मुफ़्ती निकाह का नाम दे रहे थे। जिन महिलाओं ने दाइश के आतंकवादियों के साथ शारीरिक संबन्ध स्थापित करने से इन्कार किया उनके गले काट दिये गए। इस प्रकार बहुत सी महिलाओं की हत्या कर दी गई जिनसे मुसलमान महिलाएं भी थीं और ग़ैर मुसलमान भी।

महिलाओं के बारे में दाइश के दृष्टिकोण के विपरीत इलाम का दृष्टिकोण बिल्कुल अलग है। ऐसे काल में जब महिला को इन्सान नहीं पश समझा जाता था और लड़कियों को ज़िंदा दफ़्न कर दिया जाता था इस्लाम ने महिला को विशेष महत्व दिया है। इस्लाम के अनुसार महिला और पुरूष एक समान हैं। इस संबन्ध में सूरे निसा में ईश्वर कहता है कि हे लोगो! अपने पालनहार का अनुसरण करो जिसने तुमको पैदा किय। इस आयत के अनुसार सृष्टिकर्ता ने महिला और पुरूष को पैदा किया है इसलिए उनमें से कोई भी दूसरे पर वरीयता नहीं रखता।

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पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्ललाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने अपने काल में महिलाओं के संबन्ध में भ्रष्ट विचारों का डटकर मुक़ाबला किया। यही कारण है कि पैग़म्बरे इस्लाम अपनी सुपुत्री हज़रत फ़ातेमा ज़हरा, पूरे विश्व के लिए महान आदर्श थीं, हैं और रहेंगी। सहीह बुख़ारी में इस बारे में मिलता है कि पैग़म्बरे इस्लाम अपनी सुपुत्री के बारे में कहा करते थे कि फ़ातेमा मेरा टुकड़ा हैं। जो भी उसको क्रोधित करेगा वह निश्चित रूस से मुझको क्रोधित करेगा। इस प्रकार वे लोगों को यह संदेश देना चाहते थे कि महिला सम्मानीय है निंदनीय नहीं। इस तरह से वे अज्ञानता के काल में महिलाओं के बारे में भ्रष्ट विचारधारा का मुक़ाबला करते थे।

इस्लाम हमेशा से महिला का सम्मान करता आया है। महिलाओं के बारे में हज़रत अली अलैहिस्सलाम का कहना है कि महिला, कतमल पुष्प की भांति है। वे कहते हैं कि महिला ख़राब है न कि नौकरानी हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि महिला की इस विशेषता के दृष्टिगत महिलाओं के साथ विनम्रता से पेश आना चाहिए। महिलाओं के हवाले ऐसे भारी काम नहीं करने चाहिए जो उनके सामथर्य से अधिक हों।

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जिस काल में महिला को बहुत ही गिरी नज़र से देखा जाता था उस काल में पैग़म्बरे इस्लाम का कहना था कि तुम्हारी बेहतरीन औलाद लड़कियॉं हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम लोगों से कहा करते थे कि वे महिलाओं के साथ विनम्रता से पेश आएं और उनका अनादर न करें। पैग़म्बरे इस्लाम का कहना है कि महान लोग ही महिलाओं का सम्मान करते हैं, नीच लोग महिलाओं का सम्मान नहीं करते। पैग़म्बरे इस्लाम के इस कथन के दूसरे भाग में कहा गया है कि नीच लोग ही महिलाओं का सम्मान नहीं करते । अब आप देख सकते हैं कि महिलाओं के बारे में दाइश का व्यवहार कैसा है?

 

 

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Aug २३, २०१७ १०:३६ Asia/Kolkata
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